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बिखरा विपक्ष कैसे लाएगा परिवर्तन !

देश की राजधानी दिल्ली में लगभग 25 विपक्षी दलों ने मिलकर एक साल बाद अपने पुराने महागठबंधन के बैनर तले सम्मलेन बुलाया और सभी दलों ने मिलकर एक 5सूत्रीय कार्यक्रम तैयार कर भाजपा के खिलाफ एक बार फिर से मज़बूती के साथ खड़े होने पर अपनी सहमति जताई l दर्शायी गई एक मत से बनी सहमति में जो 5सूत्र तैयार किये उनमें पहला सूत्र यह था कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को एक सयुंक्त पत्र लिख कर मुख्य चुनाव आयोग द्वारा “एसआईआर” में बरती गयी अनियमिताओं पर कार्यवाही करने की मांग की जाए l दूसरा सूत्र यह था कि “नीट” अथवा अन्य प्रवेश परीक्षाओं में पर्चों के बार-बार लीक होने पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया जाए l तीसरा देश में निरन्तर बढ़ती महंगाई पर रोक लगाने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाये और बढ़ती महंगाई पर सरकार रोक लगाएl अन्य दो सूत्रों में युवाओं की बेरोजगारी को गंभीरता से लेते हुए सरकार समाधान ढूंढे l महिलाओं का राजनीति में आरक्षण पारित सविंधान के अनुसार तुरंत लागू किया जाय और उसके बाद विभिन्न राज्यों में नए राजनीतिक परिसीमन तय किये जाए l इस महा गठबंधन की अगली बैठक अगामी 8 अगस्त को हैदराबाद में आयोजित होगी यह भी घोषणा की गयीl लेकिन इस 5सूत्रीय कार्यक्रम का जो फैसला लिया गया उसमें कहीं भी इस बात पर विचार नहीं हुआ की ये 5 सूत्रीय कार्यक्रम अमल में कैसे लाया जायेगा और यदि केंद्र सरकार या सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के इन प्रस्तावित विचारो पर कोई ध्यान नहीं दिया तो फिर उन्हें लागू कराये जाने के लिए महा गठबंधन क्या कर्यवाही करेगा l ऐसा सन्देश इंडिया अलाइंस की इस बैठक से देश को मिला है कि मनो विपक्षी दल मिलकर अभी भी मज़बूत विपक्ष की भूमिका निभाने से किनारा कर रहें हैं l मौजूदा विपक्षी दलों के इस गठबंधन की जगह अगर भाजपा विपक्ष में होती तो शायद देश की वर्तमान परिस्थियों को देखते हुए वो सड़को पर ऐसा आंदोलन करती कि किसी भी सत्ता दल को हिला कर रख देती l विपक्षी दलों के इस महा गठबंधन से जुडी जो भी क्षेत्रीय पार्टियाँ है उनकी यह विडंबना है की वो कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी मानते हुए मज़बूरी में उसका नेतृत्व तो स्वीकार कर रही हैं लेकिन अपने-अपने राज्यों की क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस को आज भी अपना घोर विरोधी मानती हैं l क्योंकि यह वास्तविकता है की अधिकांश क्षेत्रीय दल कांग्रेस की ज़मीन खिसका कर ही अपना स्थान और पहचान बना पाए है और उन्हें आज भी यह डर है कि अगर कांग्रेस उनके राज्य में फिर से मज़बूत हो गयी तो वो उनसे अपनी वो पुरानी ज़मीन वापिस भी छिन्न सकती है l इसलिए आने वाले दिनों में पंजाब विधान सभा चुनाव को देखते हुए आम आदमी पार्टी अभी तक इस महा गठबंधन से किनारा किये बैठी है l पिछले दिनों हुए हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों का मतभेद पुरे देश ने स्पष्ट रूप से देखा है l उत्तर प्रदेश में भी हालांकि समाज वादी पार्टी कांग्रेस के साथ है लेकिन यहाँ होने वाले अगले विधान सभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच मतभेद उभर कर भी आ सकते हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता l इसलिए अधूरे दिलों-दिमाग से हुए इस गठबंधन ने समय रहते कभी भी एकता वाली मज़बूती नहीं पकड़ी l दूसरा यह भी है कि अधिकांश क्षेत्रीय दलों के बड़े नेताओं की गर्दने उनके अपने कई कर्मों के कारण इतनी कमजोर पड़ी हुई हैं कि सत्ता दल थोड़ा सा बल लगा कर ही उन्हें मरोड़ सकता हैl सड़को पर बड़ा आंदोलन किये बिना सत्ता में बैठी किसी भी मजबूत सरकार को गद्दी से हटाना मुमकिन ही नहीं हैl बिखरे टूटे पंखों वाले विपक्ष में अब इतनी हिम्मत ही नहीं बची है कि वो मिलकर सड़को पर आ सके और देश के आवाम को साथ जोड़ कर कोई बड़ा जन आंदोलन कर सके l

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