सत्ता को विनम्र व लचीला होना चाहिए

विश्व में जहां-जहां भी लोकतन्त्र है वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो सरकार भी सत्ता में है उसे अपने देश के नागरिकों के प्रति विनम्र और लचीला तो होना चाहिए। कठोर फैसले लेने के लिए शब्दों का कठोर होना जरूरी नहीं है, नरम शब्दों में भी कठोर फैसले लिये जा सकते हैं। यह हमारे देश भारत का दुर्भाग्य ही है कि यहां सत्ता पर आसीन व्यवस्था देश की जनता के लिए ना तो विनम्र व्यवहार रखती हैं और न ही उसमें नागरिकों के लिए लचीलापन है और बोलने भी हमारे नेतागण ऐसे कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो ना तो सुनने में अच्छे लगते हैं और ना ही राजनीतिक आचरण के अनुकूल होते है। हमारे देश की मौजूदा सत्ता व्यवस्था अपने अब तक के कार्यकाल में दो बार विकट संकट में घिरी है। पांच साल पहले देश के किसानों ने आन्दोलित होकर भाजपा सरकार को घेरा था और अब देश के जवानों ने यानि युवा पीढ़ी ने दूसरी बार मौजूदा केन्द्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया है। पिछले दिनों राजधानी के जंतर-मंतर पर आन्दोलन पर बैठे देश के युवा छात्रों ने बार-बार हो रहे पर्चा लीक के विरूध्द आवाज उठाई। यह आन्दोलन जब केन्द्र सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया तो आन्दोलन के बीसवें दिन छात्रों का आक्रोश रौद्र रूप धारण कर महासंग्राम में बदल गया। और हिंसा के चलते इस आन्दोलन में क्या क्या घटित हुआ वो पूरे देश ने देखा भी और पीड़ित भी हुआ। लाठी-डन्डों के साथ-साथ कील लगी लाठियां भी छात्रों पर भांजी गयी। अश्रु गैस के अनगिनत गोले छात्रों पर पर दागे गये। युवा छात्राओं के साथ मारपीट में भौतिक अश्लीलता बरती गयी, इतना ही नहीं युवा छात्रों पर पैलेट गन से गोलियां दागी गयी। यह आन्दोलन देश भर के अन्य राज्यों में भी सड़कों पर देखा गया जहां युवा छात्रों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ आन्दोलन कर अपने गुस्से का इजहार किया। बिहार के पटना तो आन्दोलित छात्रों पर एके-47, से भी गोलियां दागी गयीं। बड़ी संख्या में युवा छात्र तो घायल हुए ही कई पुलिस वाले भी हिंसा में बदल गये इस आन्दोलन में घायल हुए। सोशल मीडिया और देश के प्रमुख कई टीवी चैनलों पर यह भी दर्शाया गया कि सादे कपड़ों मे कई लोग पुलिस के साथ मिलकर छात्रों पर लाठियां चला रहंे थे। अब ये लोग कौन थे, ग्यारह दिन बीत जाने के बावजूद भी पुलिस इन्हंे नही पहचान पायी हैं। इस आन्दोलन को लेकर लोकसभा और राज्यसभा के वर्षाकालीन सत्र में पिछले कई दिनों से लगातार विपक्षी दल के सांसद इस पूरे प्रकरण की जांच की मांग कर रहे हैं और गृह मंत्री से इस्तीफा भी मांग रहे है। हालांकि आन्दोलित छात्रों की मांग पर देश के शक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा तो हो गया है लेकिन छात्रों की दो और मांगें कि सभी गिरफतार छात्रों के मुकदमेे वापस हों और पर्चा लीक के कारण आत्महत्या करने वाले 22 छात्रो के परिवार को मुआवजा दिया जाये । यह मामला आन्दोलन के दिनों में जितना सुर्खियां पकड़ रहा था, उससे ज्यादा गर्मी 20 जुलाई के बाद अब तक इस प्रकरण में उफान मार रही है और एक बड़ा राजनीतिक मुददा बन गयी है । हालांकि आन्दोलन आरंभ होने के दिन से लेकर आज तक इस मामलें में कई उतार चढ़ाव आये हैं लेकिन सत्ता दल का शीर्ष नेतृत्व घुटने टेकने के बाद भी अपनी गर्दन में लेश मात्र मरोड नहीं ला पा रहा है। क्या फर्क पड़ता है यदि देश के प्रधानमंत्री या गृहमंत्री इन आन्दोलनकारी बच्चों को अपने घर के बच्चे मानकर थोड़ा विनम्र स्वभाव अपनाते हुए अपने मान सम्मान को भी कायम रखते हुए दो शब्द यह कहते हुए बोल दें कि इतना जो कुछ हुआ है वो नहीं होना चाहिए था और अगर देश की युवा पीढ़ी को हमारे किसी निर्णय से पीड़ा पहुची है तो हम देश हित में युवाओं को देश का भावी भविष्य मानते हुए उनकी पीड़ा के साथ खड़ें हैं और यदि दुर्भाग्यवश कुछ गलत हुआ है तो हम खेद प्रकट करते है। सत्ता के शीर्ष नेताओे के ऐसे दो शब्द बोलने पर सारा मामला खुद ही शांत हो जायेगा और विपक्ष को जो राजनीतिक मुददा मिला है वो भी समाप्त हो जायेगा। क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता है कोई भी बड़ा अगर दो शब्द लचीला और विनम्र भाव रखते हुए क्षमा याचना के बोल देता है तो उसका कद और बड़ा हो जाता है। कहते हैं जब बुलन्दी पर पहुंचिए तब घटा बन जइये। भाजपा इस समय सत्ता की बुलन्दी पर है तब उसे घटा बनकर पूरे देश को ठंडी छाया देने का काम करना चाहिए।



