बिहार के उपचुनाव ने दिये कई नये संकेत

बीते दिन देश के तीन राज्यों में हुए उपचुनावों के जो परिणाम सामने आये उन्हांेने देश के समक्ष बदलते राजनैतिक समीकरणों को बड़ी मजबूती से सामने रखा। इन तीनों उपचुनावों में कौन जीता, कौन हारा इसकी बात हम बाद में करेंगें, लेकिन बिहार की राजधानी पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के आये परिणाम ने सभी को सकते में डाल दिया और यह सन्देश भी साथ दिया कि देश चल रहे मौजूदा राजनीतिक माहौल से ना केवल नाराज है बल्कि वैकल्पिक परिवर्तन भी ढंूढने में लग गया है। बांकीपुर की विधानसभा सीट 1995 से लेकर अभी छः महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव तक भाजपा का एक ऐसा मजबूत किला बनी हुई थी जिसे भेद पाना संभव नजर नहीं आ रहा था। छः महिने पहले जो बिहार में विधान सभा के चुनाव हुए उसमें इसी बांकीपुर सीट पर चुनाव लड़कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने पचास हजार मतों से जीत हासिल की थी। इस सीट पर नितिन नबीन 4 बार लगातार विधायकी का चुनाव जीते और हर बार यह जीत चालिस से छियासी हजार मतों के बीच ही रही। बीते दिनोे आये उपचुनावों के परिणामों ने सबको चौंका दिया जब परिणाम पहली बार यहां से चुनाव लड़े प्रशांत किशोर के पक्ष में आ गये। प्रशांत किशोर की यह जीत भी 19 हजार वोटों से अधिक की रही। पहला चुनाव लड़े एक नये चेहरे नेे भाजपा के चालिस साल पुराने सबसे मजबूत किले को धराशायी कर दिया। जबकि भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने खुद चार दिन लगातार अपनी इस पैतृक सीट पर चुनाव लड़ रहे भाजपा के प्रत्याशी के समर्थन में पुरजोर अभियान चलाया। भाजपा के कई वरिष्ठ केन्द्र और राज्य के मंत्री इस सीट पर लगातार चुुनाव प्रचार में लगे रहे और डबल इंजन की सरकार के होते हुए भी भाजपा यह उपचुनाव हार गयी। हालांकि मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस जीती और गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा प्रत्याशी ने जीत हासिल की। मध्यप्रदेश और गुजरात में हुई भाजपा की हारजीत को सामान्य हारजीत के रूप में ही आंका जा रहा है, लेकिन बिहार की बांकीपुर सीट पर भाजपा के गढ़ में उसे मिली एक तगड़ी हार पर राजनैतिक विशेषज्ञ तरह-तरह के विश्लेषण कर रहे हैं। इन विभिन्न विश्लेषण के बीच एक मजबूत आधार यह भी निकल कर आ रहा है कि अभी हाल में युवकों का जो देशव्यापी आन्दोलन चला और उसमें कई स्तरों पर और कई तरह के सत्तादल का जो व्यवहार युवा छात्रांे के प्रति रहा वो भी यहां भाजपा की हार का एक बड़ा कारण बना। बांकीपुर सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या तीन करोड़ बयासी लाख है, जिसमें से एक करोड़ चौबीस लाख ऐसे युवा मतदाता हैं जिन्हें हम जेन जी कहकर सम्बोधित करतें है। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि अभी छः महिने पहले हुए विधानसभा चुनाव में ये युवा मतदाता भाजपा की जीत को मुख्य आधार बनते रहे हैं, लेकिन अब ये जेन जी वोटर ना केवल भाजपा से नाराज है, बल्कि विमुख भी हो रहे है। इस उपचुनाव नें यह भी संकेत दिया है कि भाजपा से नाराज इन युवा मतदाताओं ने विकल्प के तौर पर किसी अन्य राजनैतिक दल को नहीं चुना है, बल्कि एक नये चेहरे की ओर आकर्षित हुए हैं जो अपेक्षाकृत अन्य नेताओं से अधिक ईमानदार, शिक्षित और बेदाग चेहरा है। यह नये संकेत भाजपा के लिए तो चिन्ता का विषय है ही साथ ही अन्य राजनैतिक दलों के लिए भी एक सबक है कि समय रहते सुधर जायें, नही तो अगले सभी चुनावों में उनका भी ऐसा हाल हो सकता है। बांकीपुर के उपचुनाव ने नया संदेश भी दिया है और नया संकेत भी कि सत्ता किसी भी दल की धरोहर नहीं है। लोकतन्त्र में आवाम और खास तौर पर युवा मतदाता इन तानाशाहों को कभी भी कुर्सी से गिरा कर धरती पर पटक सकती है।



