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महफिल ए बारादरी में बही गीत, शेर दोहा की रसधार

-‘तुम सो जाओ नींद चैन की,क्योंकि जाग रहा हूं मैं’

  • कविता के जरिए ही संवरता है समाज : डॉ. प्रभा ठाकुर
    गाजियाबाद। शहर में हिन्दी साहित्य को बढ़ावा देने और उसके पुराने स्वरूप में लाने के लिए महफिल ए बारादरी अहम भूमिका निभा रहा है। प्रत्येक सप्ताह कोई न कोई आयोजन कर शहर में साहित्यकारों की आमद कराकर उनके विचारों से ऊर्जा का संचार किया जा रहा है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं राज्यसभा की पूर्व सदस्य डॉ. प्रभा ठाकुर ने कहा कि समाज में लोग भले ही विभिन्न पेशे से आते हैं, लेकिन कविता उन्हें एक धरातल पर जोड़ लेती है। महफिल ए बारादरी की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि कविता का मकसद इंसानियत को जिंदा रखना है। उन्होंने कहा कि कविता के जरिए बहुत सी चीजों को संवारा जा सकता है। जिसमें समाज, विचार और इंसान सभी शामिल हैं। उन्होंने अपनी कविता दिशाहीन होने दो नपे तुले कदमों से, लगे बंधे रास्तों पर चलना, अब दुष्कर है, कल के या परसों के अनुबंधों को तोड़ो, अंतर की घाटी से आता अब यह स्वर है, प्राणों को अंतर्मन के अधीन रहने दो, दिशाहीन होने दो। आतंकित शंखनाद, बहरे गूंगे विवाद, कुंठा, लिप्सा का वाद, देव देव का प्रसाद, धर्मवाद, धन्यवाद, इन सब से पा निजात, भारहीन होने दो, दिशाहीन होने दो… के माध्यम से समाज को एक नई दिशा देने की कोशिश की। नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित महफिल ए बारादरी में बतौर मुख्य अतिथि पधारे सुप्रसिद्ध शायर व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आदेश त्यागी ने अपनी बात कुछ यूं शुरू की “क्या है जिसने मेरे दिल में इतनी हिम्मत भर दी है, मुझ में है कानून की ताकत तन पर खाकी वर्दी है। तुम्हें बचाने अपराधी के पीछे भाग रहा हूं मैं, तुम सो जाओ नींद चैन की क्योंकि जाग रहा हूं मैं” से शुरू की। उन्होंने अपने शेरों पर जमकर वाहवाही बटोरी। उनकी पंक्ति “पढ़ते कैसे तुम मुझे कैसे मुश्किल थे हालात, तुमको आदत लफ्ज की मैं खाली जज्बात” भी खूब सराही गई। संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने फरमाया “इसलिए रहता नहीं कोई नया डर मुझमें, आईना जागता रहता है बराबर मुझमें।” “मेरी नजरों ने बरसात में छू लिया उसका गीला बदन, उससे नजरें मिली और फिर शर्मसारी रही उम्र भर।” बारादरी की संस्थापिका डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने अपने अशआर “तुम बसे थे मेरे फसानों में, किसकी आहट है फिर ये कानों में। हर जबां में हो एक जैसे ही, पढ़ लिया तुमको सब जबानों में” पर खूब दाद बटोरी।
    कार्यक्रम की शुरूआत डॉ. तारा गुप्ता की सरस्वती वंदना से हुई। कार्यक्रम का संचालन भी उन्होंने ही किया। प्रतिभा प्रीत ने फरमाया इश्क में मुझको सभी से मुख्तलिफ किस्मत मिली, दिल हुआ जब पारा पारा तब जरा राहत मिली। हम तो समझे थे कि खुशियां कर रहे हैं हम जमा, फोड़ी पर जब दिल की गुल्लक दर्द की राहत मिली। गुंजन अग्रवाल “अनहद” ने कहा अरे छोड़ो भी जाने दो मुहब्बत, आप रहने दो। बुरी कहते हैं इसको लोग, ये लत आप रहने दो। मनीषा जोशी ‘मनी’ ने कहा “चुरा कर आंख सबसे जिस तरह तुम देखते हो, मिरे महबूब होने का इशारा जा रहा है। बुलंदी हौसलों की कौन रोकेगा यहां पर, किसी सहरा में दरिया को उतारा जा रहा है। वागीश शर्मा ने कहा गीत वादों के हम गुनगुनाते रहे, जख्म दिल के यूं ही छुपाते रहे। कितने आए सनम कितने छूटे मगर,लब हमारे यूं ही मुस्कुराते रहे।” ओमपाल सिंह ‘खलिश’ ने कहा “सफर कुछ और हमसे चाहता है, गजल हम गुनगुनाना चाहते हैं। अनिमेष शर्मा ने फरमाया खुद-सरी के रंग, रंग ए आतिशी के सामने, तीरगी कैसे ठहरती रोशनी के सामने। इसके अलावा सुभाष चंदर, राजेश श्रीवास्तव, कृष्ण कुमार ‘नाज’, आलोक यात्री, मनु लक्ष्मी मिश्रा, डॉ. अमर पंकज, राजीव सिंघल, प्रेम किशोर शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, अनिल शर्मा, देवेंद्र देव, जे. पी. रावत, सौरभ कुमार और सिमरन की रचनाएं भी सराही गई। इस अवसर पर आभा बंसल, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, कुलदीप, भूपेंद्र राघव, अजय कश्यप, आशीष मित्तल, प्रभा मित्तल, मोदिता काला, सत्यनारायण शर्मा, रंजन शर्मा, रवि शंकर पाण्डेय, अंजलि, हेमंत कुमार, संजय भदौरिया, वीरेंद्र सिंह राठौर, दीपा गर्ग, पी. के. शर्मा, पी. एस. पंवार, तिलक राज अरोड़ा समेत बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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