बीएलओ पीड़ित रहे तो कैसे होगी एसआईआर

कमल सेखरी
देश के 12 राज्यों में एसआईआर कराने के जो आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ने दिये उसे लेकर कई प्रश्नचिन्ह तो उठ ही रहे हैं साथ ही कई राज्यों में विपक्षी नेताओं के कई तरह के आरोप लगाने से भी सियासी माहौल गरमाया हुआ है। मुख्य चुनाव आयोग ने इन सभी 12 राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया एक महीने में पूरा करने के निर्देश दिए जिसके पूरा होने में अब केवल सात दिन का समय रह गया है। 4 दिसंबर 2025 तक इन सभी राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया अंतिम रूप से पूरी हो जानी चाहिए ऐसे आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सभी राज्यों के प्रशासनिक प्रमुखों को दिये हैं। माना पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव 4 महीने बाद होने हैं इसलिए वहां एसआईआर को जल्दी कराने की बात वाजिब मानी जा सकती है लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में अभी एक साल से अधिक का वक्त है ऐसे में यहां आनन फानन में एक माह की अवधि में ही यह प्रक्रिया पूरी कराने का क्या औचित्य है। इसी तरह मध्यप्रदेश में और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने में दो साल से अधिक का समय बाकी है तो फिर वहां उन्हीं तीस दिनों में एसआईआर प्रक्रिया पूरा कराने का औचित्य क्या है। हम इतनी जल्दबाजी में ऐसा सबकुछ क्यों कराना चाह रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर रोज पुरजोरता से शोर मचा रही हैं कि उनके प्रदेश में तीस दिन के अंदर यह प्रक्रिया पूरी कराना संभव ही नहीं है। वो चुनाव आयुक्त पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाते हुए इस प्रक्रिया को भाजपा के साथ उसके एक बड़े षडयंत्र का होना बता रही हैं। बंगाल की दीदी का यह भी आरोप है कि उनकी सरकार ने बीएलओ का कार्य करने के लिए जो राज्य सरकार कर्मचारियों की सूची दी है चुनाव आयुक्त उसे स्वीकार ना करके किसी प्राइवेट एजेंसी से बीएलओ का कार्य करवा रहा है। ममता बनर्जी सड़कों पर उतर आई हैं और कह रही हैं कि हम अपने सूबे में बिहार की तरह बेईमानी और चोरी नहीं होने देंगे। हालांकि अभी तक वोट बनाने के फार्म पूरी तरह जमा भी नहीं हुए हैं कि चुनाव आयोग ने पश्चिमी बंगाल में बीस लाख वोट काटे जाने के संकेत दे दिये हैं, इसी तरह उत्तर प्रदेश में सपा के मुखिया अखिलेश यादव हर रोज एक बयान जारी कर यह आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयुक्त भाजपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में भी बड़ी संख्या में विपक्षी दलों के समर्थकों के वोट काटने जा रहा है उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में कुछ समय और दिया जाना चाहिए ताकि विपक्षी दल भी जान सकें कि क्या गलत और क्या सही हो रहा है। एक माह में पूरी किए जाने वाली इस एसआईआर की प्रक्रिया में जो बीएलओ काम कर रहे हैं उन्हें ना तो ठीक से प्रशिक्षण दिया गया है और ना ही उनकी पर्याप्त संख्या है। मीडिया के विभिन्न माध्यमों और विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा जो आरोप लगाए जा रहे हैं उनसे यह निकलकर आ रहा है कि निर्धारित किए गए सभी राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया ठीक से नहीं चल पा रही। विपक्षी दलों का आरोप है कि बीएलओ की संख्या अपेक्षित संख्या से एक चौथाई भी नहीं है जो इतने बड़े कार्य को एक माह में पूरा कर सके। कई राज्यों से ऐसी खबरें भी मिल रही हैं कि कार्य के दबाव में कई बीएलओ की मृत्यु हो चुकी है जिनमें कइयों को दिल का दौरा पड़ गया है और कइयों ने खुदकुशी कर ली है। उत्तर प्रदेश के जिला गौतमबुद्धनगर में जिला प्रशासन ने लगभग छह सौ बीएलओ के खिलाफ कार्य ना करने के कारण नोटिस दिये हैं। इनमें से लगभग 60 के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है और साढ़े तीन सौ से अधिक कर्मचारियों को कार्य ठीक ना करने की वजह से निलंबित भी किया जा चुका है, गाजियाबाद जिले में भी इसी तरह से थाना सिहानी गेट में नायब तहसीलदार ने 21 बीएलओ के खिलाफ एफआईआर कराई है जिनमें नौ महिला राज्य कर्मचारी हैं। आगरा में 18 और फतहपुर में 62 सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जा चुकी है। जहां-जहां डबल इंजन की सरकार है उन प्रदेशों में बीएलओ के खिलाफ अधिक सख्त कार्रवाइयां की जा रही हैं जिससे वहां के बीएलओ या तो उत्पीड़न झेल रहे हैं या फिर नौकरियों से इस्तीफा भी दे रहे हैं। सभी 12 राज्यों में मिलाकर इस तरह की हजारों की संख्या में कार्रवाई किए जाने की खबरें मिली हैं।
अब अगर एसआईआर की प्रक्रिया को कई राज्यों में मात्र एक माह के अंदर पूरा करने के निर्देश दिये जाएंगे तो उन्हें पूरा करने के लिए राज्य सरकारों के कर्मचारी कहां से लाए जाएंगे क्योंकि इस प्रक्रिया में जुड़े राज्यकर्मचारी, शिक्षक, आशा व आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को अपने मूल नियमित कार्यों के साथ यह अतिरिक्त कार्य भी करना पड़ रहा है जो किसी भी सूरत में भौतिक रूप से संभव नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ऐसा क्यों कर रहे हैं वो तो वही बेहतर जानें लेकिन यह निश्चित है कि इस प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारी बेहद परेशान हैं और चाहते हुए भी इस कार्य को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं। विभिन्न विपक्षी दलों के नेता जो आरोप लगा रहे हैं वो भी जांच का विषय है। लोकतंत्र में विपक्षी दलों के आरोपों को तरजीह देते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस तरह के गंभीर कार्यों में जोड़े जा रहे सरकारी कर्मचारी भी इंसान हैं कोई मशीन नहीं। अब तक जितने बीएलओ ने आत्महत्या की है उसकी गहन जांच होनी चाहिए, उनके पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने के साथ-साथ ऐसी स्थिति बनाने के जो उत्तरदाई हैं उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।


