सड़कों पर सियासी कलह-देश में जल प्रलय

कमल सेखरी
देश में सड़कों पर सियासी जंग चल रही है और दूसरी तरफ पूरे देश में जल प्रलय चल रही है। देश का दो तिहाई से अधिक हिस्सा आज पानी में डूबा नजर आ रहा है। हमारे सभी पहाड़ी क्षेत्र के पहाड़ भर भराकर गिर रहे हैं, ऐसा लग रहा है कि मानो कच्ची मिटटी के पहाड़ हों और झमझमा बरस रहे पानी का प्रहार सह ना पा रहे हों। पहाड़ों की ऐसी हालत बनाने के जिम्मेवार भी हम ही हैं। हर पहाड़ी क्षेत्र में वहां की सत्ता ने लकड़ी के तस्करों से मिलकर जंगल के जंगल कटवा दिए हैं। पहाड़ों पर से बेशुमार पेड़ों का काटा जाना और इसके साथ निरंतर अवैध खनन का होना इन कारणों ने पहाड़ को खोखला बना दिया है। देश का शायद ही कोई अखबार ऐसा होगा जो प्रतिदिन पहाड़ों के गिरने, नदियों के उफान मारने और सावन के बाद आधा भादो आने तक भी लगातार मूसलाधार बारिश के चलते हर शहर गांव और कस्बे में बाढ़ की स्थिति बन जाने की खबरें ना छाप रहा हो। ऐसे ही देश के अधिकांश टीवी चैनल अपने प्रसारण का आधा समय जल प्रलय की इन्हीं खबरों को दिखा रहे हैं। अब तक कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों पर 40 से अधिक बार बादल फटने की खबर हम सुन चुके हैं। हर बार जो बादल फटता है वो ऐसी तबाही मचाता है कि उससे गिरने वाले पानी के साथ बड़ी मात्रा में पहाड़ों का मलबा बहकर नीचे आता है और रास्ते में आने वाले सभी गांव और रिहायशी इलाकों को तबाह कर देता है। अब तक इस तरह की बादल फटने की घटनाओं में कई हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, हजारों रिहायशी मकान, होटल की इमारतें और अन्य व्यवसायिक भवन जल के इस प्रवाह के साथ बहकर नष्ट हो गए, अब तक जल प्रलय की इस तबाही में कई हजार करोड़ रुपयों की आर्थिक हानि हो चुकी है। इसी के साथ-साथ निरंतर बरस रही मूसलाधार बारिश से भी देश की सभी नदियां खतरे के निशान से ऊपर जाकर उफान मार रही हैं और अपने किनारे तोड़कर कई गांवों, कस्बों और शहरी इलाकों की इंसानी बस्तियों में बाढ़ बनकर अपना प्रकोप दिखा रही हैं। इसी के साथ-साथ हमारे नाले और नालियां वो भी लबालब भरकर अपने आसपास के क्षेत्रों में जल भराव का संकट पैदा कर रहे हैं। इस समय अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो हमारा देश भारत जल प्रलय के एक भारी संकट से गुजर रहा है। दो तिहाई से अधिक देश के हिस्से में जीवन अस्तव्यस्त हो चुका है। देश में जल प्रलय की इस स्थिति में भी हमारे सियासी नेता लेशमात्र भी इस जलसंकट को लेकर चिंतित नजर नहीं आ रहे हैं। उनका अधिक समय सियासी नोकझोंक और ऊठापटक में लगा हुआ है। आने वाले दिनों में बिहार का चुनाव कैसे जीता जाए और उसके बाद बंगाल के विधानसभा चुनाव की रणनीति क्या बनाई जाए, इसी सोच में सियासी नेताओं का पूरा समय जा रहा है। हमारे सत्ता से जुड़े शीर्ष के नेता भी जल संकट के इन दिनों में कई देशों की विदेश यात्रा कर चुके हैं लेकिन उन्होंने एक बार यह भी नहीं सोचा कि उन्हें जल प्रलय से प्रभावित देश के इस बड़े हिस्से का हवाई सर्वेक्षण करना चाहिए। पहले राजनीतिक आचरण का यह हिस्सा होता था कि अगर देश के किसी छोटे हिस्से में भी इस तरह का जल संकट पैदा होता था तो शीर्ष का नेतृÞत्व हवाई सर्वेक्षण करके उस क्षेत्र के लिए सहायता सामग्री और अन्य सहयोग देने की योजना बनाता था। आज दो तिहाई भारत पानी में डूबा है लेकिन हमारे किसी बड़े नेता ने कोई हवाई दौरा करके इस संकट को देखने की जहमत अभी तक नहीं उठाई है। क्या आज के दौर का यह जल संकट और इसको नजर अंदाज करता यह सियासी आचरण आने वाले इतिहास में अंकित नहीं होगा। हम आने वाले इतिहास की लेशमात्र भी चिंता किए बिना सत्ता की कुर्सी पर कैसे बैठे रह सकते हैं उस पर कैसे फिर से आ सकते हैं, उसे कैसे बचा सकते हैं और ऐसे में विपक्ष इसी होड़ में लगा है कि हम सत्ता परिवर्तन करके कैसे सत्ता की कुर्सी हासिल कर सकते हैं। देश के किसी सियासी नेता को देश की चिंता नहीं है।

