चर्चा-ए-आमस्लाइडर

मतदाता पुन:निरीक्षण से बिहार में बढ़ेगा तनाव

  • दो माह में कैसे होगी 8 करोड़ मतों की जांच
  • बिहार के 70 फीसदी गांव डूबे हैं बाढ़ में
  • चुनाव आयोग के इस फैसले से पूरा विपक्ष नाराज

कमल सेखरी

बिहार चुनाव को आरंभ होने में अभी चार महीने का समय बाकी है। लेकिन अभी से कई तरह के राजनीतिक दांवपेंच खेले जाने के साथ-साथ आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है। इसी बीच में जो सबसे अधिक गंभीर राजनीतिक मुददा बनने जा रहा है वो है बिहार के मतदाताओं का चुनाव से पहले पुन: निरीक्षण के काम का किया जाना। बताया जाता है कि बिहार के मौजूदा आठ करोड़ मतदाताओं का पुन: निरीक्षण का कार्य महज 55 दिन में ही पूरा कराने की बात कही जा रही है। बिहार में यह प्रक्रिया 2023 में भी की गई थी लेकिन उस समय यह प्रक्रिया आरंभ होने और लोकसभा का चुनाव होने के बीच एकसाल का समय था और विधानसभा चुनाव उस समय की पुन: निरीक्षण प्रक्रिया के दो साल बाद होने थे। लिहाजा काफी समय था इस काम को निपटाने के लिए और उस समय बिहार के मतदाताओं की कुल संख्या भी 4.39 करोड़ थी, अब यह संख्या बढ़कर लगभग आठ करोड़ हो गई है और पुन: निरीक्षण कार्य को पूरा किए जाने का समय भी केवल 55 दिन ही निर्धारित किया गया है। हालांकि पिछले 5 महीनों में बिहार के मतदाताओं की संख्या में अलग से लगभग 45 लाख मतों का इजाफा हुआ है जो निसंदेह सत्ता बल को अधिक लाभ पहुंचाने जा रहा है। इंडिया एलायंस के लगभग सभी दलों ने चुनाव आयोग के इस फैसले का विरोध किया है और वो जल्द ही इसके खिलाफ एक बड़ा आंदोलन भी बिहार में खड़ा करने जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि आठ करोड़ मतदाताआें के पुन: निरीक्षण कार्य को 55 दिनों में पूरा किया जाना संभव ही नहीं है। इसी के साथ वो भी ऐसे दिनों में जहां बिहार के 70 फीसदी गांव बाढ़ की चपेट में हैं और उन्हें इस विकराल समस्या से बाहार निकलने में कम से कम दो माह का समय लग ही जाएगा। चुनाव आयोग ने पुन: निरीक्षण प्रक्रिया के जो नियम निर्धारित किए हैं वो भी विपक्षी दलों के अनुसार बड़ी संख्या में उन लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर करने का षडयंत्र है जो अब तक भाजपा को वोट नहीं देते आए हैं। इस नई प्रक्रिया के अनुसार जिन मतदाताओं का जन्म वर्ष 1987 से पहले हुआ है उन्हें अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ-साथ अपने माता-पिता में से किसी एक का जन्म प्रमाण पत्र भी साथ में प्रस्तुत करना होगा। जिन मतदाताओं का जन्म 1987 से लेकर 2004 के बीच हुआ है उन्हें अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ-साथ अपने हाईस्कूल के प्रमाण पत्र या फिर अपने माता-पिता में से किसी एक का जन्म का प्रमाण पत्र देना होगा। जिन मतदाताओं का जन्म 2004 के बाद हुआ है उन्हें अपना हाईस्कूल का प्रमाण पत्र, अपना जन्म प्रमाण पत्र और अपने माता-पिता दोनों का जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा। जिन लोगों के पास आधार कार्ड या वोटर आईडी कार्ड है और जिन्होंने पिछले लोकसभा व विधानसभा चुनावों में अपना वोट भी दिया है तो भी उनके आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड पुन: निरीक्षण में स्वीकार नहीं किए जाएंगे। इससे यह प्रमाणित होता है कि जिन मतदाताओं ने 2024 के लोकसभा चुनाव में और 2020 के विधानसभा चुनाव में जो भी मतदान किया है और वो अगर वर्तमान प्रक्रिया में अनिवार्यता की पूर्ति नहीं कर पा रहा तो फिर उसने जो वोट पिछले लोकसभा और पिछली विधानसभा में दिया वो स्वत: ही अवैध माना जाना चाहिए और ऐसे वोट अगर अधिक संख्या में पाए जाते हैं तो फिर 2024 का लोकसभा और 2020 का विधानसभा चुनाव अवैध घोषित करके रदद कर दिए जाने चाहिए। विपक्षी दलों का कहना है कि बिहार के 70 फीसदी मतदाता जो बाढ़ से त्रस्त हैं वो पुन: निरीक्षण की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए प्रमाण पत्र कहां से लाएंगे। पहले वो अपने घर बचाएंगे या फिर प्रमाण पत्र ढूंढकर अपनी वोट बचाएंगे। विपक्षी नेता इस पुन: निरीक्षण कार्य को चुनाव आयोग का अवैध कार्य बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि यह कार्य सिर्फ भाजपा को लाभ पहुंचाने की नजर से ही किया जा रहा है। अब ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन यह तय है कि बिहार का अगला चुनाव गहमा-गहमी और गहरे तनाव के बीच ही पूरा होता नजर आएगा।

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