चर्चा-ए-आमस्लाइडर

देश के देवता देश को खा गए !

कमल सेखरी

हमारा देश इन दिनों दो बड़े संकटों से गुजर रहा है। एक संकट तो उस प्राकृतिक आपदा का है जो पिछले कई दिनों से जल प्रलय का प्रकोप बनकर देश के साठ फीसदी भाग को अपनी चपेट में ले चुका है। दूसरा बड़ा संकट उस सियासी महासंग्राम से बना हुआ है जिसने पिछले कई दिनों से समूचे देश में एक सियासी कोहराम मचा रखा है। जल प्रलय के प्राकृतिक आपदा में कई हजार मकान और अन्य संपत्तियां बाढ़ के पानी के साथ बहकर नष्ट हो गई हैं और इस आपदा की चपेट में कई हजार लोग पानी के तेज वेग में अपनी जानें गंवा चुके हैं। अभी भी सैकड़ों लोगों का कोई अता-पता नहीं चल पाया है कि वो जिंदा हैं या मर चुके। देश के पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी और मध्य भारत के कई राज्य नदियों में आए ऊफान से जो बाढ़ बनकर उमड़ी है उसकी चपेट में आकर भारी नुकसान झेल रहे हैं। महाराष्ट्र , बंगाल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, बिहार, नार्थ ईस्ट के लगभग सभी राज्यों के अलावा मध्यप्रदेश के कई जिलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से के कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं और लग रहा है जैसे देश का साठ फीसदी आबादी वाला हिस्सा इस जल प्रलय के प्रकोप से त्रस्त हो गया है। हमारे सियासी नेता संसद से लेकर सड़कों तक अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, किसी एक नेता को भी यह चिंता नहीं है कि जो आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान बाढ़ की चपेट में फंसा पड़ा है और जिसमें हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं उनकी तरफ एक नजर देख भी लें। सत्ता दल से जुड़े शीर्ष के नेता भी अभी तक इन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का कोई दौरा नहीं कर पाए हैं और हर रोज अपनी सियासी जंग में इस तरह शुमार हो गए हैं मानों उन्हें देश की कोई चिंता ही ना हो। अब से एक दशक से पहले जब कभी भी देश में बाढ़ की कोई ऐसी स्थिति बनती थी तो देश के प्रधानमंत्री या गृहमंत्री और विभिन्न बाढ़ प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करते थे। इस साल बाढ़ का प्रकोप पूर्व के सभी वर्षों की अपेक्षा कहीं अधिक भयावाह स्थिति में है। लेकिन सत्ता के किसी भी राजनेता को लेशमात्र भी चिंता नहीं है कि वो हवाई सर्वेक्षण से उन बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों को एक नजर देख भी लें। पूरे देश में इन सियासी नेताओं ने सड़कों पर कोहराम मचा रखा है। इनके बीच चल रही आपसी प्रतिद्वंदता ने ऐसी स्थिति बना दी है कि संसद पूरे मानसून सत्र में एक दिन भी सुगमता से नहीं चल पाई। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता दल देश के चुनाव आयोग के साथ मिलकर मतदान में चोरियां कर रहा है और पिछले संसदीय चुनाव के बाद जितने भी प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हुए हैं वो सत्ता दल वोट चोरी करके ही चुनाव जीता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक प्रेस कान्फ्रेंस कर महादेवपुरा विधानसभा सीट में फर्जी मतदान का आरोप लगाते हुए कई आंकड़े मीडिया के सामने रखे यह बताने के लिए कि कैसे वोट चोरी करके भाजपा सरकारें बना रही है। वोट चोरी के इस मामले में पिछले कई दिनों से सियासी महासंग्राम छिड़ा हुआ है और पक्ष विपक्ष के सभी नेता इस महासंग्राम में एकसाथ कूद पड़े हैं। इस सियासी जंग में सत्ता दल और विपक्ष के नेता जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं उससे शायद पूरा देश आहत है और दुखी भी है। इन सियासी नेताओं के ऐसी प्राक़ृतिक आपदा के बीच बरता जा रहा यह आचरण निसंदेह पूरे देश को पीड़ा पहुंचा रहा है। ये सियासी नेता इन दिनों जो आचरण अपनाए हुए हैं उसे देखकर राष्ट्र कवि स्वर्गीय अश्क जी की यह पंक्तियां स्मृति में उभर आती हैं:-

घन पतन के वतन पर सघन छा गए।
हम कहां थे वहां से कहां आ गए।।
आम जनता रही राम के आसरे।
देश के देवता देश को खा गए।।

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