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भाजपा- टीएमसी का भविष्य दाव पर

कमल सेखरी

इस बार पश्चिम बंगाल में हुआ विधानसभा चुनाव केंद्र में शासित भाजपा पार्टी और बंगाल की सत्ताधारी पार्टियों टीएमसी के बीच न केवल प्रतिष्ठा का एक बड़ा प्रश्न बना रहा बल्कि दोनों दलों के लिए राजनीतिक अस्तित्व का एक बड़ा मुद्दा भी बन गया। भाजपा की केंद्र सरकार और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने मिलकर इस बार के बंगाल विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसा माहौल बना दिया कि पहले चरण में हुए 152 सीटों में मतदान और दूसरे चरण में हुए 142 सीटों के मतदान में न तो कोई अप्रिय घटना घटित हुई न ही कोई बड़ी हिंसा नजर आई और न ही कहीं खून-खराबे की कोई खबर मिली। इन दोनों चरणों के मतदान के दौरान और उससे कुछ दिन पहले भी पूरे पश्चिम बंगाल को एक छावनी में परिवर्तित कर दिया गया। 25 बटालियन केंद्रीय सुरक्षा बल जिसमें लगभग 3 लाख सुरक्षा कर्मी शामिल थे, उन्हें वहां तैनात किया गया और बंगाल के 90 फीसदी IAS और IPS अधिकारियों का इस दौरान तबादला भी कर दिया गया। इतना ही नहीं देश में यह पहली बार आज़ादी के बाद से देखने को मिला कि किसी राज्य के चुनाव में ऐसा हुआ कि 93 फीसदी से अधिक लोगों ने मतदान में भाग लिया।हालांकि मतदान से पूर्व कई कारणों के चलते 27 लाख से अधिक मतदाता अंतिम वोटर सूची में शामिल नहीं हो पाए और अपने मताधिकार से वंचित रह गए। परन्तु फिर भी पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के उत्साह में कोई फर्क नहीं आया। इस विशाल मतदान के परिणाम भाजपा या टीएमसी किसके पक्ष में आएंगे यह तो आगामी चार मई को ही पता चलेगा।लेकिन चुनाव परिणामों का पूर्वानुमान लगाने वाली कई पेशेवर एजेंसियों ने अटकलें लगानी शुरू कर दी हैं। अब तक आए साथ पूर्वानुमानों में से पाँच भाजपा को जीतता बता रहे हैं और केवल दो ही टीएमसी की जीत सुनिश्चित कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के सभी टीवी चैनल और स्थानीय समाचार पत्र सभी इस चुनाव में टीएमसी की जीत बता रहे हैं। पूर्वानुमान लगाने वाली सभी पेशेवर एजेंसियां और पश्चिम बंगाल का समस्त मीडिया अपने-अपने अनुमानों के अलग-अलग आधार जनता के बीच परोस रहे हैं। अब परिणाम जो भी रहें लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव भाजपा और टीएमसी के बीच न केवल कड़ी टक्कर है बल्कि भविष्य में इन दोनों दलों के लिये राजनीतिक अस्तित्व का सवाल भी है। टीएमसी अगर यह चुनाव हारती है तो यह उसके राजनीतिक भविष्य का यही अंत माना जायेगा। और अगर भाजपा पश्चिम बंगाल का यह चुनाव हार जाती है तो तेजी से दौड़ रहे उसके विजय रथ पर न केवल विराम लगेगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की व्यक्तिगत प्रतिष्ठाओं को भी गहरी चोट पहुंचेगी। इतना ही नहीं ऐसा होने पर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव जो कि कुछ महीनों बाद होने हैं उस पर भी बुरा असर पड़ेगा।

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