चर्चा-ए-आमस्लाइडर

पल पल बदल रही हैं देश की राजनीतिक परिस्थितियां

कमल सेखरी
हमारे देश में पल पल बदलते राजनीतिक समीकरण कितनी तेजी से करवटें बदल रहे हैं कि लोगों का ध्यान कहीं एक विषय पर केन्द्रित होता है तो वहीं कुछ देर बाद वो मुददा ही बदल जाता है और ध्यान दूसरी ओर चला जाता है। कल देरशाम देश के उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति जगदीश धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से और राज्यसभा के सभापति पद से अचानक इस्तीफा देना उन सभी विषयों पर चादर डाल गया जिन पर लग रहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में जमकर हंगामा होगा और देश को पहलगाम के नरसंहार और आपरेशन सिंदूर को लेकर कई नई जानकारियां मिलेंगी। इसी के साथ-साथ यह भी लग रहा था कि इस बार दोनों सदनों में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर भी जबरदस्त गहमा गहमी होगी और उससे चुनाव आयोग कुछ बदलता सा नजर आएगा और अपनी प्रक्रिया में सामान्य मतदाता के हित में कुछ नए फैसले लेगा। लेकिन जगदीश धनखड़ के यकायक इस्तीफा देने पर सभी राजनीतिक दल भौचक्के से रह गए और आपरेशन सिंदूर एवं मतदाता पुनरीक्षण के मुददे से अलग हटकर श्री धनखड़ के इस्तीफे के कारणों के बारे में सोचने में लग गए। अब दोनों सदनों के सामने एक नहीं तीन-तीन बड़े मुददे आकर खड़े हो गए तो अब विपक्षी दल इस मुददे को लेकर सत्ता दल को कब और कैसे घेरे यह उसके लिए एक अलग परेशानी का कारण बन गया। श्री धनखड़ के मुददे को लेकर सत्ता दल के कुछ नेताओं और विपक्षी दल के नेताओं में अब यह चर्चा शुरू हो गई है कि श्री धनखड़ के इस्तीफे के पीछे कोई बड़ा राज जरूर है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल 5 दिन के विदेशी दौरों पर जा रहे हैं तो लिहाजा इन पांच दिनों में इन ऐसे बड़े मुददों पर बात हो कि जवाब प्रधानमंत्री को देना पड़े। क्योंकि महागठबंधन के सभी दल आपरेशन सिंदूर पर संविधान की धारा 267 के अंतर्गत बहस चाहते हैं ताकि विपक्षी दलों के सभी सवालों का जवाब प्रधानमंत्री को ही देना पड़े। अभी तक तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में उनके सभापति इस बहस को धारा 267 में कराने को तैयार नहीं है। दूसरा नियम यह भी है कि अगर लोकसभा में विपक्ष के नेता कोई प्रश्न रखते हैं और प्रधानमंत्री से उसका जवाब देने का तकाजा करते हैं तो प्रधानमंत्री को नैतिकता के आधार पर भी जवाब खुद से देना चाहिए लेकिन अब प्रधानमंत्री 5 दिन की विदेश यात्रा पर निकल रहे हैं और 29 जुलाई को ही सदन में उपस्थित हो सकते हैं वो भी तब अगर वो सदन में आना चाहें तो। कुल मिलाकर इन बड़े मुददों से अलग हटकर भी छुटपुट राजनीतिक ऐसे कई मामले और जुड़ रहे हैं जो देश की राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं। आम आदमी पार्टी का अचानक इंडिया महागठबंधन से नाता तोड़ लेना और महाराष्ट्र में उधव ठाकरे की शिवसेना का अंदरखाने भाजपा के साथ फिर से गठबंधन में जाना और महाविकास अघाड़ी के नेता पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को एनडीए गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाने की जो तैयारियां चल रही हैं उससे भी इंडिया महागठबंधन को एक झटका लगेगा और राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे।
कभी किसी ने ऐसी कल्पना नहीं की थी कि देश की राजनीतिक परिस्थितियों में सभी मापदंडों को ताक पर रखकर इस तरह इतनी तेजी से गठबंधन टूटेंगे और सदन में राजनीतिक समीकरण निरंतरता से तेजी के साथ कुछ ऐसे बदलेंगे जिनमें रह रहकर पक्षपात की बू आने लगे और हर परिवर्तन किसी गहरे षडयंत्र से जुड़ा महसूस होने लगे।

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