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कोरोना काल में बैंड-बाजे वालों का बज गया बैंड, औने-पौने दामों में बेच रहे घोड़ियां

गााजियाबाद। कोरोना का कहर जहां जान पर कहर ढा रहा है वहीं उन लोगों को भी जीते जी मार रहा है जो बेरोजगार हो गए हैं। कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए यूपी के अलावा देश के अधिकांश राज्यों में लॉकडाउन लगा हुआ है। लॉकडाउन में सीजनल कार्य भी बंद हो गए हैं। सीजनल कार्य में लोग अपने सालभर की मजदूरी कमा लेते थे लेकिन दो साल से सबकुछ बंद पड़ा है। जी हां हम बात कर रहे हैं बैंड बाजा और बारात की। लॉकडाउन में न बैंड है, न बाजा है और न ही बारात। दो साल पहले तक अक्षय तृतीय पर इतनी शादियां होती थीं कि गाजियाबाद क्या समूचे एनसीआर में जाम लगने की खबरें इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में प्रमुखता से आती थीं लेकिन अखबारों, टीवी चैनलों में अब जाम लगने की खबरें कहीं दिखाई नहीं पड़ती हैं। बहुत लोगों ने शादियां टाल दी हैं। जो कर रहे हैं, उनके लिए नियम बहुत हैं। इसका सबसे बड़ा असर शादी समारोहों से जुड़े लोगों पर हो रहा है। बैंड बाजा कारोबार का तो बैंड ही बज चुका है। ऐसे में अब बैंडबाजा बजाने वाले कारीगरों के पास कोई काम नहीं बचा है। स्थिति यह है कि घर चलाने के लिए किसी ने घोड़ी बेच दी तो किसी ने बैंडबाजा। पिछले साल के अंत और इस साल की शुरूआत में कोरोना के मामले कम होने पर से मई माह में काफी शादियां बुक थीं। मामले दोबारा बढ़ने पर लॉकडाउन लगा और कई शादियां टल गईं। बैंडबाजे वालों और घोड़ी वालों का कारोबार ठप हो गया है। काम धंधा न होने से घोड़ी-बग्गी वाले आहत हैं। वे कहते हैं कि हालात बहुत खराब चल रहे हैं। घर का खर्चा चलाने के लिए मजबूरी में वे अपनी घोड़ी आधे रेट में बेच रहे हैं। घोड़ियों का भी वे खर्च नहीं उठा पा रहे हैं। घाड़ी-बग्गी वाले बताते हैं कि शादियों का काम बंद होने से घोड़ियों के खाने का खर्चा नहीं उठा पा रहे हैं। मजबूरी में घोड़ियों को खुली जगह में छोड़ देते हैं कि ताकि वे कुछ खाकर पेट भर सकें।

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