लेटेस्टशहर

स्वामी विवेकानंद के निर्वाण दिवस पर पावन चिंतनधारा आश्रम में रक्तदान शिविर आयोजित

  • सौ से अधिक लोगों ने किया रक्तदान, युवाओं में था जबरदस्त उत्साह
    गाजियाबाद।
    4 जुलाई यानि वो एतिहासिक दिवस जिस दिन सदी के महान संत स्वामी विवेकानंद ने अपने शरीर को छोड़ा। भारतीय संस्कृति और चिंतन का परचम पूरे विश्व में लहराने वाले स्वामी विवेकानंद 31 बीमारियों के साथ इस दिन अपने देह को छोड़कर परमधाम में लीन हो गए थे। इस दिन को पावन चिंतन धारा आश्रम ने निर्वाण दिवस के रूप में बहुत ही सार्थक कार्य के साथ मनाया। इस विशेष दिवस पर आश्रम द्वारा डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ की प्रेरणा व मार्गदर्शन से व वरदान मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के सहयोग से रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया, जहां 100 से भी अधिक संख्या में लोग रक्तदान करने के लिए पहुंचे और हर्ष का विषय यह था कि युवाओं में रक्तदान करने को लेकर अत्यधिक उत्साह था। साथ ही सायं संध्या पूजा से पूर्व नारायण मंदिर में स्वामी जी का तिलकवन्दन भी किया गया।
    आश्रम पिछले कई वर्षों से इस दिन को सेवाकार्य के साथ ही प्रभु चरणों में समर्पित करता है। डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ कहते हैं कि नरसेवा ही नारायण सेवा है। अत: आश्रम प्रत्येक महत्वपूर्ण दिवस में सेवा के माध्यम से मानव जीवन को सदा ही सार्थकता प्रदान करता है।
    इस अवसर पर अपने गुरुदेव के प्रति अपने भाव प्रकट करते हुए डॉ. पवन सिन्हा गुरूजी ने ट्वीट के माध्यम से कहा कि स्वामी विवेकानंद ने जीवन पर्यन्त भारतीयों को गुलामी और विशेषकर मानसिक गुलामी से मुक्त कराने का प्रयास किया, पर सब बेकार… भारत में आज भी स्वामी जी की पहचान शिकागो भाषण ही है क्योंकि इस घटना का सम्बन्ध विदेश से है। स्वामी जी के वेदान्त, गीता ज्ञान, धर्मों का अध्ययन, अमेरिका के अन्य नगरों में दिए गए व्याख्यान, इंग्लैंड में उनके प्रखर कार्य, स्वतंत्रता आन्दोलन, शिक्षा चिंतन, युवाओं में चेतना और प्रखरता भरना, उनमें आत्मविश्वास भरना, सुभाष, तिलक, गांधी जैसे कितने लोगों को स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा देना, राष्ट्र भक्ति, आदि कार्य इस देश के बच्चों को कभी बताये नहीं जाते। बताएगा कौन…बड़े?..उन्हें खुद नहीं पता। स्वामी जी को पता था कि उन्हें कब लम्बे आराम के लिए जाना है। वो अनेक वर्षों से कहते आ रहे थे कि वे 40 वर्ष से पूर्व शरीर छोड़ देंगे। मार्च 1900 को उन्होंने भगिनी निवेदिता से पत्र के माध्यम से कहा भी था, “I don’t want to work. I want to be quiet, and rest. I know the time and the place; but the fate, or Karma, I think, drives me on – work, work.”
    स्वामी_विवेकानन्द बस लेट गया था, कि थक गया था सबने कहा मैं मर गया जिसे तुमने मृत्यु कहा, वो मेरी रात है जिसे जन्म कहते हो वो मेरी सुबह रात को आराम करता हूँ कि सुबह कार्य कर सकूं नये शरीर, नये रूप में, नये लक्ष्य, नये चिंतन में फिर रात आती है, मैं फिर सो जाऊंगा।
    साथ ही इस दिन आश्रम सदस्यों द्वारा मुंबई, वड़ोदरा, कानपुर आदि शहरों में भी रक्तदान, अक्षम परिवार के बच्चों को छाता, नोटबुक वितरण, वृद्धाश्रम में दैनिक जीवनोपयोगी सामग्री वितरण एवं अन्य सेवाकार्य किये गए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button