संविधान से क्यों हटायें ‘सोशलिज्म-सेक्युलीरिज्म’ शब्दों को

- समाजवाद ना रहा तो पूंजीवाद आएगा
- धार्मिक समानता ही भारत की पहचान है
- बड़ी देर कर दी सनम आते-आते
कमल सेखरी
एक लंबे समय से कोई दिन ऐसा नहीं बीत रहा जिस दिन हमारे सामने कोई ना कोई राजनीतिक विवाद सामने आकर खड़ा ना हो जाता हो। हमारे अधिकांश टीवी चैनल जो पिछले कई सालों से दूरदर्शन टीवी बनकर अपने-अपने चैनलों पर इन विवादित राजनीतिक मुददों को सुबह से रात तक दिखाने का काम कर रहे हैं। लगता ही नहीं देश में कहीं सकारात्मक कोई ऐसा बड़ा कार्य हो रहा हो जिससे देश की जनता को रूबरू कराया जा सके। कला, संस्कृति, खेलकूद और विकास आदि के समाचार तो देखे हुए लोगों को कई-कई महीने बीत जाते हैं। अब इन दिनों एक नया राजनीतिक विवाद आरएसएस और भाजपा के नेताओं ने मिलकर खड़ा कर दिया । उनका कहना है कि आपातकालीन दिनों के दौरान कांग्रेस ने संविधान के मुख्य पृष्ठ पर अंकित मूल उदेदश्य के संदेश में दो शब्दों को जोड़ दिया है। ये शब्द समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े बताए जा रहे हैं। इसमें दोराय नहीं कि जो कहा जा रहा है वो गलत है ऐसा हुआ भी है। लेकिन अगर ऐसा हुआ भी है तो इन दो शब्दों के जोड़ने से देश में कौन सा ऐसा संदेश जा रहा है जो आम नागरिक की भावनाओं और अधिकारों के विरुद्ध हो। भारत के संविधान की धारा 25 से लेकर 30 तक इन्हीं दो शब्दों के ऊपर विस्तार से लिखा गया है। देश की जनता के बीच समान अधिकार हों और उनके साथ समान व्यवहार किया जाए यही समाजवाद की संविधान में व्याख्या है। देश में सभी धर्मों को समानता से माना जाए और उनमें कोई भेदभाव या असमानता ना बरती जाए यही साधारण भाषा में धर्म निरपेक्षता का अर्थ है और ऐसा ही संविधान में लिखा भी गया है। अब हम शोर मचा रहे हैं कि संविधान के मुख्य संदेश पृष्ठ पर जोड़े गए शब्द समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को हटाया जाए। इनके रहने से क्या हानि है यह सही मायने में कोई बता नहीं पा रहा है लेकिन इनके हटने से संविधान की मूल भावना ही समाप्त हो जाएगी ऐसा विपक्षी दल कह रहे हैं और शायद वो ठीक भी कह रहे हैं। क्योंकि पिछले कुछ सालों में आर्थिक असमानता का विकराल रूप हमको देखने को मिला है। देश के एक प्रतिशत आबादी वाले अमीर लोगों पर देश की कुल पूंजी का 10 प्र्रतिशत जो हिस्सा अब तक था वो बढ़कर 12.5 प्रतिशत हो गया है। देश के 10 प्रतिशत अधिक पैसे वाले लोगों के पास अब से पहले देश की पूंजी का 34 प्रतिशत हिस्सा उनके कब्जे में था अब वो बढ़कर 57.6 प्रतिशत हो गया है। देश के शेष बचे 89 प्रतिशत लोगों के पास देश की पूंजी का मात्र 30 प्रतिशत हिस्सा ही बकाया शेष रह गया है। तो देश में समाजवाद रह कहां गया। देश तो पूंजीवाद के हाथों में चला गया। देश की इस आर्थिक असमानता को किसी तरह से समान स्थिति के बराबर लाने के प्रयास को ही हम समाजवाद की संज्ञा दे सकते हैं। इस पर किसी को ऐतराज कैसे हो सकता है और होना भी क्यों चाहिए। इसी तरह धर्मनिरपेक्षता में पिछले कुछ सालों से हमारी व्यवस्था धार्मिक असमानता को आगे रखकर चल रही है जिसके उदाहरण हमें रोज देखने को मिल रहे हैं। देश हिन्दू-मुसलमान और अगड़े-पिछड़ों में बंटता नजर आ रहा है। जो संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत है। अब जो लोग शोर मचा रहे हैं कि संविधान के मुख्य संदेश पृष्ठ से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे इन दो शब्दों को हटा देना चाहिए वो निसंदेह देश में धार्मिक और सामाजिक असमानता को आगे बढ़ाने की नजर से ऐसा कह रहे हैं। जो लोग अब ऐसा करने के हिमायती नजर आ रहे हैं उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर के इस संविधान का प्रारंभ में भी विरोध किया और संविधान की प्रतियां जलाने के साथ-साथ डाक्टर बाबा साहेब अंबेडकर के पुतले भी जलाए। उस समय में भी ये लोग भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के पक्षधर थे लेकिन क्योंकि उस समय राजनीतिक ताकत में नहीं थे इसलिए अपनी मंशा पूरी नहीं करा पाए। अब वो राजनीतिक ताकत के साथ हैं इसलिए अपनी इस पुरानी इच्छा को पूरा करने के लिए पुरजोरता से लगे हैं और बयान बदल बदलकर देश में ऐसा माहौल बना रहे हैं कि देश में धार्मिक सौहार्द को चोट पहुंचे और किसी तरह हिन्दू राष्ट्र बनाने की उनकी मंशा पूरी भी हो सके लेकिन अब ऐसा कुछ करने के लिए बहुत देरी हो गई, आज भारत की पहचान एक सोशलिस्ट और सेक्यूलर राष्ट्र के नाम से बन गई है जिसे अब तोड़ा जाना संभव नहीं है। ऐसा अगर करना था तो देश के विभाजन के समय ही कर लेना चाहिए था अब ऐसा मुमकिन नहीं है। धर्म आधारित मुल्क का हाल वही होगा जो पाकिस्तान का हुआ है, हमें इस वास्तविकता को समझकर इससे सबक लेना चाहिए।


