गाजियाबाद
‘बारादरी’ की महफिल को गीतकार और शायरों ने अपनी रचनाओं से यादगार बना दिया

- ‘बारादरी’ बन गई है देश की सांस्कृतिक पहचान: मोईन शादाब
- एक तो फूल ही कागज के उठा लाया है, उसपे ये जिद है इन फूलों से खुश्बू आए: खालिद
- गीत, गजल और हाइकु से यादगार बन गई बारादरी की महफिल
गाजियाबाद। ‘बारादरी’ की महफिल को गीतकार और शायरों ने अपनी रचनाओं से यादगार बना दिया। मशहूर शायर और कार्यक्रम अध्यक्ष मोईन शादाब ने कहा कि गंगा जमुनी तहजीब की महफिल ‘बारादरी’ आज देश की सांस्कृतिक पहचान बन गई है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि खालिद अखलाक ने कहा कि इस मंच से पढ़ना इसलिए गर्व की बात है क्योंकि यह अदब की महफिल है। शायर जय प्रकाश ‘जय’ ने कहा कि बारादरी अदब और तहजीब के तीर्थ के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. तारा गुप्ता को जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान प्रदान किया गया। इस अवसर पर डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ की पुस्तक ‘पंच तत्व’ का लोकार्पण भी किया गया।
सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित बारादरी का शुभारंभ आशीष मित्तल की सरस्वती वंदना से हुआ। मोईन शादाब ने अपने अशआर ‘ये किन चिरागों का अहसास ले रहे है हम, धुंआ इनमें कुछ ज्यादा है रौशनी कम है। किसी के साथ गुजारा हुआ वो एक लम्हा, अगर मैं सोचने बैठूं तो जिंदगी कम है’ भरपूर सराही गईं। शायर खालिद अखलाक के शेर ‘एक तो फूल ही कागज के उठा लाया है, उसपे ये जिद है इन फूलों से खुश्बू आए। तू कहां था तुझे ढूंढने, कभी भंवरे, कभी तितली, कभी जुगनू आए। सम्मान ग्रहण करते हुए कवयित्री डॉ. तारा गुप्ता ने फरमाया ‘आपसे मान सम्मान इतना मिला, यूं लगा मेरी तो सदगति हो गई, प्रेम का सिलसिला यूं ही चलता रहे, अपनी नजरों में मैं फिर कीमती हो गई।
बारादरी की संस्थापिका और सुप्रसिद्ध शायरा डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अपने भावों को ‘मेघों से झरता पानी, पर्वत पर जमता पानी, सूरज की गर्मी पाकर, पिघला बर्फ़ीला पानी, पानी की सुनो कहानी, खुद अपनी राह बनाता, झरनों का निर्झर पानी, नदियों में मीठा बहता, खेतों को सींचे पानी, पानी की सुनो कहानी’ इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया। इसके अलावा उनके शेर ‘हमने मुश्किलों के वक्त में अक्सर, नाम जितने पुकारे तेरे हैं। इस दफा फिर से रुसवा होना है, इस दफा भी इशारे तेरे हैं।’ जय प्रकाश ‘जय’ ने अपने शेर ‘बहुत हंसे तो कहीं जा के एक बूंद गिरी, हमारी आंख पे रक्खा था भार पानी का। फिराक काट रहा हूं मैं ठीक वैसे ही, किसान जैसे करें इंतिजार पानी का’ पर दाद बटोरी।
शायर सुरेन्द्र सिंघल को पंक्ति ‘इन दबी सिसकियों से क्या होगा, लोग बहरे हैं चीखना होगा’ भी सराही गई। नेहा वैद के गीत की पंक्तियां ‘बिना सूचना दिए कौन अब, किसके घर आता-जाता है’ पूरे सुदन द्वारा सराही गई। सुप्रसिद्ध शायरा तरुणा मिश्रा ने महफिल का खूबसूरत संचालन करने के साथ साथ अपने अशआर ‘किरदार मेरा, मेरी कहानी न मार दे, मुझको ये बेहिसी, ये उदासी न मार दे। इक बोलता हुआ जो तअल्लुक है आपसे, मुझको ये डर है उसको खामोशी न मार दे’ पर भरपूर दाद बटोरी।
ईश्वर सिंह तेवतिया हमेशा की अपने गीत ‘खाली घर की व्यथा’ की पंक्तियों ‘मैंने वे दिन भी देखे हैं, जब मैं मुश्किल से सोता था, चहल-पहल इतनी रहती थी, हर दिन उत्सव सा होता था, मेरा दामन भर जाता था, सब अपनों के अपनेपन से, मुझे संवारा करते थे सब, मिल कर तन से, मन से, धन से,अब तन्हा वीरान पड़ा हूं, मेरे दिल में दु:ख अपार है, मेरा द्वार बंद है इसको, फिर खुलने का इंतजार है’ से पूरे सदन को ही भावुक कर दिया। मासूम गाजियाबादी ने पुलवामा और पहलगाम को लक्षित कर कहा ‘सहर के मुंतजिर थे जो परिंदे उनका क्या होता, जो होती जंग तो वक्त एक सहरी सांझ हो जाती। चलो अच्छा हुआ जंग रुक गई, वर्ना जहां होती वहां तो कोख धरती की बांझ हो जाती।’ इसके अलावा योगेन्द्र दत्त शर्मा, जगदीश पंकज, अनिमेष शर्मा आतिश, इंद्रजीत सुकुमार, संजीव शर्मा के गीत, डॉ. वीना मित्तल के हाइकु, सरवर हसन सरवर, रवि पाराशर, विपिन जैन, डॉ. सुधीर त्यागी, अनिल शर्मा, सुप्रिया सिंह वीणा की गजल, प्रदीप भट्ट, देवेन्द्र देव, सुरेन्द्र शर्मा, कल्पना कौशिक, दीपक श्रीवास्तव ‘नीलपदम’, डॉ. नरेंद्र शर्मा व आशा शर्मा की रचनाएं भी भरपूर सराही गईं।
इस अवसर पर आलोक यात्री, सुभाष चंदर, पंडित सत्य नारायण शर्मा, वागीश शर्मा, अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव, शकील अहमद सैफ, राधा रमण, मनोज शाश्वत, संजीव नादान, शुभ्रा पालीवाल, नरेंद्र नागर, डॉ. सुमन गोयल, ओंकार सिंह, प्रमोद शिशोदिया, डी. डी. पचौरी, मोनिश रहमान, निरंजन शर्मा, सुरेश शर्मा अखिल, अशहर इब्राहिम, उत्कर्ष गर्ग, डॉ. भरत शर्मा, शशिकांत भारद्वाज, राकेश मिश्रा, पराग कौशिक, तेजवीर सिंह, वीरेन्द्र सिंह राठौड़, संजय भदौरिया, डॉ. प्रीति कौशिक, श्रीचंद्र सारस्वत व मसरूर हसन खान सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।



