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पोषण को लेकर जागरूक व व्यवहार परिवर्तन के लिए चौथी पोषण पाठशाला का आयोजन

  • आंगनबाड़ी कार्यकतार्ओं के साथ गर्भवती और धात्री माताएं हुईं पाठशाला में शामिल
  • ऊपरी आहार रोचक और पोषक तत्वों से युक्त होना जरूरी : डा. पियाली भट्टाचार्य
    हापुड़।
    छह माह की आयु पूरी कर चुके शिशुओं के शारीरिक और बौद्धिक विकास के लिए कैसा और कितना ऊपरी आहार जरूरी है, शुक्रवार को आयोजित चौथी आनलाइन पोषण पाठशाला में यह बात विस्तार से बताई गई। वेब लिंक के जरिए पोषण पाठशाला का सीधा प्रसारण जिला स्तर पर एनआईसी केंद्रों में देखा और सुना गया। इसके साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी अंतिम त्रैमास की गर्भवती व धात्री माताओं ने स्मार्ट फोन के जरिए लाइव वेबकास्ट का लाभ उठाया। पोषण पाठशाला का संचालन राज्य पोषण मिशन के निदेशक कपिल सिंह ने और अध्यक्षता राज्य पोषण मिशन की सचिव अनामिका सिंह ने की। हापुड़ जनपद में भी एनआईसी के साथ – साथ आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण पाठशाला का लाइव वेबकॉस्ट देखा गया। एनआईसी सभागार में इस मौके पर जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) ज्ञानप्रकाश तिवारी के साथ आरबीएसके प्रभारी डा. मयंक चौधरी और बाल विकास परियोजना अधिकारी मौजूद रहे। डीपीओ ने बताया – काफी संख्या में गर्भवती व धात्री माताओं ने पोषण पाठशाला का लाभ उठाया। पोषण पाठशाला में राज्य पोषण मिशन की सचिव अनामिका सिंह ने बताया आईसीडीएस के प्रयासों से कुपोषण के कारण होने वाली स्टेंटिंग में गिरावट दर्ज हुई है। यह बात राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे-पांच में सामने आई है, लेकिन सर्वे में यह बताया गया है कि 100 में से केवल छह बच्चों को ऊपरी आहार की पूरी खुराक मिल पाती है। ऊपरी आहार को लेकर व्यवहार परिवर्तन हेतु दूसरी पोषण पाठशाला आयोजित की गई है। इससे पहले 25 अगस्त को सही समय पर ऊपरी आहार विषय पर पोषण पाठशाला का आयोजन किया गया था। डीपीओ ने बताया कि विशेषज्ञ पैनल में केजीएमयू लखनऊ की बाल रोग विशेषज्ञ डा. पियाली भट्टाचार्य ने शिशु की बढ़ती आयु में पोषण तत्वों के महत्व और जंक फूड के नुकसान पर प्रकाश डाला। उन्होंने शरीर की विशेष क्रियाओं में सहयोग करने वाले प्रकार-एक के सूक्ष्म पोषक तत्वों के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी शिशु एकदम से दुबला पतला नहीं हो जाता है। दरअसल प्रकार-एक के सूक्ष्म पोषक तत्व (आयरन, कैलिशयम, आयोडीन, विटामिन, मिनरल्स) कोशिकाओं में जमा रहते हैं और पोषण में यह तत्व न मिलने पर खर्च होते रहते हैं। उसके बाद इनकी कमी के लक्षण सामने आते हैं। विटामिन-ए की कमी से रतौंधी (रात में देखने में परेशानी) होती है। आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन- बी12 और बी6 एवं जिंक की कमी से एनीमिया होता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए हरी सब्जियां, फल, दालें और अंडा आदि नियमित रूप से दें। आईआईटी मुंबई में सहायक एसोसिएट प्रोफेसर और बाल रोग विशेषज्ञ रूपल दलाल ने प्रकार-दो के सूक्ष्म पोषण तत्व (जिन्हें विकास तत्व भी कहा जाता है) के बारे में बताया। उन्होंने कहा प्रकार- दो (प्रोटीन, बसा,काबोर्हाइड्रेट, जिंक, मैग्नीशियम, पोटाशियम और सल्फर) के सूक्ष्म पोषक तत्वों का काम कार्य शारीरिक क्रियाओं के साथ ग्रोथ करना है। हमारे शरीर को 40 तत्वों की जरूरत होती है, यह तत्व शरीर में स्टोर नहीं होते, यानी यह तत्व रोज लेने होते हैं। केवल दाल, चावल और रोटी से इनकी पूर्ति संभव नहीं है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रोटीन। हड्डियां 50 फीसदी प्रोटीन से बनती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए प्रोटीन जरूरी है। प्रोटीन के कमी से शारीरिक विकास अच्छी तरह से नहीं होता और भविष्य में रक्तचाप व मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है। प्रोटीन के लिए ऊपरी आहार में दूध, दही, पनीर, अंकुरित सोयाबीन, अंकुरित दालें शामिल करें। अंडे और दूध-दही से संपूर्ण पोटीन प्राप्त होता है। बसा बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है। मलाई, मक्खन और घी के अलावा अलसी और सरसों के बीच का पाऊडर बनाकर शिशु के आहार पर छिड़क सकते हैं। पोषण विशेषज्ञ दीपाली फर्गडे ने ऊपरी आहार को रोचक बनाने के लिए साथ बताया कि किस आयु तक कितने और कैसे ऊपरी आहार की जरूरत होती है। रेस्पांसिंव फीडिंग पर प्रवीण दुबे और आईएम ओझा ने बताया कि शिशु को आहार दें तो मां और शिशु के बीच कोई अवरोध न हो और मां पूरे मनोयोग से और प्रसन्न भाव से शिशु को आहार दे, साथ ही उसकी इच्छा को भी समझे। डीपीओ मानना है कि पोषण पाठशाला से लाभार्थियों के अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सेविकाओं को भी बहुत कुछ सीखने का मिला है।

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