चर्चा-ए-आम

देश में धर्म पर हर रोज लड़ाई क्यों ?

कमल सेखरी

राजस्थान के जयपुर जिले के चौमू कस्बे में एक मस्जिद के बाहर पड़े पत्थरों को हटाने पर छिड़े विवाद ने एक बड़े हंगामे का रूप ले लिया और यह हंगामा कुछ ही देर में सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया। वहां भारी पुलिस बल तैनात किया गया और दोनों ही तरफों से एक दूसरे पर पथराव करने के साथ-साथ धार्मिक उन्माद के नारे भी पुरजोरता से लगाए गए। इन दो पक्षों के बीच चले भारी पथराव में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए और दोनों ओर से हिंसा पर उतारु भीड़ में शामिल कुछ लोग भी घायल हो गए। पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए हलका बल प्रयोग करते हुए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले भी छोड़े। साथ ही हिंसा में शामिल 20 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। अब मामला यह नहीं है कि जयपुर के कस्बे चौमू की मस्जिद के बाहर क्या हुआ मामला यह है कि शायद ही कोई दिन ऐसा बीत रहा हो जब हमें देश के किसी ना किसी हिस्से से सांप्रदायिक हिंसा भड़कने की खबर सुनाई ना देती हो। हम सभी जानते हैं कि क्रिसमस-डे को लेकर पूरे देश में किस तरह का सांप्रदायिक हंगामा बरपाया गया। केन्द्र की सत्ता से जुड़े उसके सहयोगी दल जो अपने आपको हिन्दूवादी और सनातनी बताते हुए देश में हिन्दुओं के रक्षक बने होने का ढोल पीटते हैं उन्होंने देशभर के चर्चों के बाहर और ईसाई समुदाय के धार्मिक आयोजनों में कैसा नंगा नाच किया और हिंसा पर उतारु होकर मारपीट भी की। ईसाई समुदाय देश में मात्र आबादी का एक प्रतिशत ही संख्या में है और स्वभाव से हमेशा शांति के साथ रहता है और बड़ी ही सुगमता से किसी भी दबाव में आ जाता है। हमने हिन्दुओं के नाम पर उन भोले कबूतरों का हिंसक शिकार किया जो आने वाला समय हमें माफ नहीं करेगा। एक लंबे समय से हमारे सियासी नेता लोकसभा से लेकर पिछले सभी विधानसभा चुनावों में सार्वजनिक स्थल से अश्लील भाषा बोलते हुए एक दूसरे पर भद्दे आरोप लगाते रहे हैं। देश के मुखिया हमारे प्रधानमंत्री भी अपने चुनावी भाषण में मुसलमानों पर यह कहकर गंभीर आरोप लगाते रहे कि वो हिन्दू महिलाओं का मंगलसूत्र छीनकर ले जाएंगे और बहन बेटियों का जीना हराम कर देंगे। ये तो महज कुछ मिसाल हैं वरना पिछले एक दशक का इतिहास उठाकर देख लें तो वो इस तरह की राजनीतिक अश्लीलता और आचरण की गिरावट से भरा पड़ा है। हम ऐसा क्यों कर रहे हैं। हमारे सियासी नेताओं को अपने चुनावी भाषणों में या अन्य सियासी संबोधनों में यहां तक कि लोकसभा और राज्यसभा के सदनों में भी हमने हमेशा धार्मिक उन्माद फैलाने या जातीय मतभेद उभारने से अलग हटकर जनहित या जनकल्याण में कुछ कहते सुना ही नहीं हमारे ये सियासी नेता देश के अलग-अलग चुनावों में आम आदमी की समस्याओं या जनकल्याण की बातों को मुददा बनाकर चुनाव क्यों नहीं लड़ते। घर, रोटी, रोजगार, शिक्षा, सेहत, युवा कल्याण, आन्तरिक सुरक्षा या फिर अन्य विकास निर्माण की बातों को आगे रखकर जनता से वोट क्यों नहीं मांगते। हमारे ये नेता देश को आज किस दिशा में ले जा रहे हैं उसके परिणाम बड़े ही खतरनाक जल्द ही सामने आ सकते हैं। इतिहास साक्षी है विश्व का कोई भी मुल्क जिसने सियासत में बने रहने के लिए धर्म को अपना आधार बनाया है उसका अंत दुर्गति के साथ हुआ है। हमें ऐसी किसी भी संभावना से देश को बचाना चाहिए।

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