चर्चा-ए-आमविशेष

अब उत्तर प्रदेश में भी घुस आए घुसपैठिये!

कमल सेखरी

बांग्लादेशी घुसपैठियों से अब उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं रहा। सियासी गलियारों में अब यह चर्चाएं होनी शुरू हो गई हैं कि उत्तर प्रदेश में भी बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिये घुस आए हैं। सूबे के मुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी 78 जिलों के जिलाधिकारियों और हर जिले के पुलिस कप्तान एवं पुलिस कमिश्नरों को सूचित कर निर्देश दिए हैं कि वे अविलंब गहन जांच करके प्रदेश में संदिग्ध व्यक्तियों की खोज करें खास तौर पर अगर वो बांग्लादेश से आए हैं तो उनके खिलाफ विधिवत कार्रवाई सुनिश्चत करें। मुख्यमंत्री के इन निर्देशों के बाद विपक्षी दलों में खलबली सी मच गई है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक प्रेस कान्फ्रेंस करके यह आरोप लगाया है कि प्रदेश में किए जा रहे एसआईआर एक बड़ा षड़यंत्र है जिसके चलते विपक्षी दलों के वोट बैंक पर घातक हमला किया जा रहा है। श्री यादव ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले चुनाव में जहां-जहां उनकी पार्टी जीती थी उन क्षेत्रों में 50 हजार वोट प्रति क्षेत्र काटे जाने की योजना भाजपा सरकार ने बनाई है। उन्होंने एसआईआर की अंतिम तिथि आगे बढ़ाए जाने की भी मांग की है।
बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर जो अब तक चर्चाएं हुई हैं और आंकड़े भी सामने आए हैं वो एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। भाजपा से पूर्व सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के केन्द्रीय गृहमंत्री श्रीपाल जायसवाल ने लोकसभा सदन में एक बयान देकर यह बताया था कि भारत में एक करोड़ 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिये आ चुके हैं और हमारी सरकार उन्हें जल्द ही वापस भेजने की योजना बना रहे हैं। 2004 से लेकर 2011 तक यानी 7 वर्षों में कांग्रेस की सरकार ने 90 हजार से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत से वापस बांग्लादेश भेजा था। वर्तमान भाजपा सरकार के केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री किरिन रिजिजू ने वर्ष 2016 में लोकसभा सदन में सरकारी बयान देते हुए यह घोषणा की थी कि भारत में बांग्लादेश से जो घुसपैठिये प्रवेश कर गए हैं उनकी संख्या 2 करोड़ नौ लाख है। श्री रिजिजू ने सदन को आश्वासन दिलाया कि उनकी भाजपा सरकार युद्ध स्तर पर कार्रवाई करके इन सभी बांग्लादेशियों को वापस भेजने के लिए दृढ़ संकल्प है। लेकिन अगर वास्तविकता देखी जाए तो केन्द्र सरकार ने पिछले दस वर्षों में मात्र 4036 बांग्लादेशी ही भारत से वापस लौटाए हैं। पिछले तीन वर्षों में तो यह संख्या ना के बराबर ही रही है। पिछले साल केवल 151 बांग्लादेशी ही भारत से निकालकर वापस भेजे गए। इस संबंध में एक ओर रोचक आंकड़ा आसाम का है। जहां छह साल पहले एनआरसी लागू करके लगभग 19 लाख बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान चिन्हित किए गए जिनमें 7 लाख मुस्लिम और लगभग 12 लाख हिन्दुओं की संख्या थी। इनमें से अभी तक किसी एक को भी आसाम से निकाला नहीं दिया गया। अभी हाल ही में हुए बिहार चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का शोर बड़ी पुरजोरता से उठता रहा लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी हम अभी तक बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या नहीं बता पा रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि बिहार चुनाव में की गई एसआईआर में मात्र 317 विदेशी नागरिक ही चिन्हित किए गए हैं जिनमें से केवल 73 मुस्लिम हैं। इसी तरह दिल्ली और हरियाणा के चुनाव में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाले जाने का दावा बड़ी पुरजोरता से किया जाता रहा लेकिन चुनाव समाप्त होने के एक वर्ष बाद भी अभी तक किसी एक बांग्लादेशी घुसपैठिये को वापस नहीं भेजा गया है। देश की राजधानी दिल्ली में शरणार्थियों के नाम से रोहिंग्या मुसलमानों को शेल्टर होम में बड़ी संख्या में रखा जा रहा है और उन्हें हर तरह की सुविधा और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था सरकारी कोष से की जा रही है लेकिन उन्हें वापस भेजने की कोई नीति या संधि की प्रक्रिया अभी तक नहीं बनाई जा सकी है। इसी तरह आसाम में भी लाखों लाख विदेशी नागरिक शरणार्थियों के नाम पर शेल्टर होम में रखे जा रहे हैं उनके खान पान की समस्त व्यवस्था सरकारी कोष से हो रही है लेकिन उन्हें वापस भेजने की कोई ठोस योजना अभी तक नहीं बनाई जा सकी है। लिहाजा बांग्लादेशी घुसपैठिये क्या सही मायनों में हमारे देश की कोई समस्या है या फिर यह केवल एक चुनावी शगूफा है जो हर चुनाव से पहले पुरजोर बिगुल बजाकर चुनावी मुददा बना दिया जाता है।

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