उत्तर प्रदेशगाजियाबाद

‘कथा संवाद’ में तीन पीढ़ियों ने मंच से पढ़ी रचनाएं

  • ‘कथा संवाद’ जैसी कार्यशालाएं ही कहानी के भविष्य का निर्धारण करती हैं: ‘देवेश’
  • जड़ता को तोड़कर ही नयापन लाया जा सकता है: डॉ. साधना अग्रवाल
    गाजियाबाद। ‘कथा रंग’ की कार्यशाला ‘कथा संवाद’ में प्रख्यात साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी के उप सचिव देवेंद्र कुमार ‘देवेश’ ने कहानियों पर चर्चा करते हुए कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं ही कहानी के भविष्य का निर्धारण करती हैं। उन्होंने कहा कि नए लेखकों को गढ़ने के लिए ऐसी कार्यशालाएं हर शहर में आयोजित होनी चाहिए। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि एवं आलोचक डॉ. साधना अग्रवाल ने कहा कि ‘कथा रंग’ कहानी की ऐसी पहली पाठशाला है जहां लेखक काफी कुछ सीखकर अपनी कहन को आगे ले जा सकता है।
    शंभूदयाल इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम की मुख्य विशेषता यह रही कि तीन पीढ़ियों ने एक ही मंच से अपनी रचना का पाठ किया। श्री ‘देवेश’ ने कहा कि लेखक को अपनी रचना का पहला पाठक स्वयं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामान्यत: मनुष्य एक जीवन जीता है, लेकिन यदि वह कहानी, उपन्यास पढ़ता है तो वह एक साथ कई जीवन जीता है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि आज का पाठक समय से बहुत आगे है। लिहाजा नए लेखकों को अपने इर्द-गिर्द घट रही घटनाओं पर पैनी दृष्टि रखनी होगी। उन्होंने कहा कि जड़ता को तोड़ कर ही नयापन लाया जा सकता है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं ‘कथा रंग’ के संरक्षक डॉ. अशोक मैत्रेय ने कहा कि रचना प्रक्रिया पाठक के साथ तारतम्यता की यात्रा है। जो जितनी सहज होगी पाठक को उतना ही आनंद देगी। क्योंकि किसी भी रचना की अंतिम कसौटी पाठक ही होता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चंदर ने कहा कि लेखक नकारात्मक परिवेश को सकारात्मक परिवेश में ढालने का काम करता है और ‘कथा रंग’ की कोशिश है कि युवाओं से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक पहुंच गए लोगों को कल्पनाशीलता का एक साझा मंच प्रदान किया जाए। जहां दो अलग पीढ़ियां अपने अनुभवों को मूर्त रूप प्रदान कर सकें। ‘कथा रंग’ के संयोजक आलोक यात्री ने कहा कि यह संयोग है कि आज के कार्यक्रम में तीन पीढ़ियां एक साथ रचनापाठ में शामिल हैं। कार्यक्रम का संचालन रिंकल शर्मा ने किया। आयोजन में रवि पाराशर की ‘कुत्ते और कमीने’, देवेन्द्र देव की ‘क्षतिपूर्ति’, सुधा गोयल की ‘चिट्ठियां’, दीपक श्रीवास्तव ‘नीलपद्म’ की ‘एक हैसियत’, मनीषा गुप्ता की ‘बुआ’, बबीता नागर की ‘एक कठिन सफर का खूबसूरत हमसफर’, अर्पिता सिंघल की ‘दो कप चाय’ और प्रखर नागपाल की ‘टर्मिनल वन’ रचना पर विमर्श में योगेन्द्र दत्त शर्मा, अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’, पंडित सत्य नारायण शर्मा, जगदीश पंकज, विपिन जैन, डॉ. अंजली त्यागी, अनिमेष शर्मा, प्रदीप भट्ट, ओंकार त्रिपाठी, अवधेश श्रीवास्तव, सिनीवाली, राधारमण, विनय विक्रम सिंह ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर डॉ. आर. पी. सारस्वत, रजनीकांत शुक्ल, डॉ. बीना शर्मा, प्रताप सिंह, विश्वेंद्र गोयल, विजय लक्ष्मी, शशिकांत भारद्वाज, राजीव सिंघल, तिलक राज अरोड़ा, बी. एल. बत्तरा, शकील अहमद सैफ, अनीता पंडित, अविनाश शर्मा, राकेश सेठ, के. के. जायसवाल, तुलिका सेठ एवं उत्कर्ष गर्ग सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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