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साक्षात्कार: मुस्लिम और संघ के बीच संवाद व सहमति अति आवश्यक: ख़्वाजा इफ़्तिखार अहमद

ख्वाजा इफ़्तिखार अहमद की पुस्तक, द मीटिंग ऑफ मिण्ड्स: अ ब्रिजिंग इनिशिएटिव (वैचारिक समन्वय: एक व्यावहारिक पहल) समकालीन भारतीय राजनीतिक और गतिशीलता में प्रतिमान बदलाव के पीछे की सच्चाई को जानने के लिए वैचारिक मंथन द्वारा उपजा ऐसा ईमानदार प्रयास है जो उचित समय और उचित परिस्थितियों में किया गया हौ। कई दशकों से संघ और मुस्लिमों में समन्वय व समरसता का यत्न कर रहे लेखक ने फिरोज बख़्त अहमद के साथ एक बातचीत दर्शायी है कि अब मुस्लिमों को राजनीतिक क्षितिज पर उभर रही और सफल होती भगवा विचारधारा को समझ उनके साथ मिलकर भारत को अग्रिम राष्ट्र बनाने में अपने योगदान की तलाश और उसको सुनिश्चित करना है। इसी के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं ।

प्रश्न: आपके मस्तिष्क में क्या था कि आपने यह पुस्तक लिख डाली?

जवाब: एक लंबे समय से मुस्लिमों और संघ परिवार के बीच में संवाद न होने के कारण वैमनस्य देखने में आता रहा है जिससे देश, संघ और मुस्लिमों, सभी की हानि है, जो बिल्कुल ठीक नहीं है। मेरा यत्न शुरू से ही यह रहा है कि ये दीवारें गिरें और इन दोनों में पुल बनें। इसी में सब की बल्कि पूर्ण राष्ट्र की भलाई है। यही कारण है कि इस पुस्तक को अंग्रेजी, हिन्दी और उर्दू भाषाओं में प्रकाशित किया गया है।

सवाल: इस पुस्तक के मुख्य तत्व क्या हैं?

जवाब: इस पुस्तक में राजनीति, धर्म और समाज को लेकर 1920 से 2020 तक सभी मुख्य बिन्दुओं पर विचार व्यक्त किया गया है जिनमें खिलाफत तहरीक, हिन्दू महासभा, आरएसएस, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग, वामपंथ सोच और भारतीय स्वाधीनता संग्राम, जो कि गांधीजी की विचारधारा से जुड़ा था, आदि सभी मौजूद हैं। देखिए हो क्या रहा है कि हमारी अनेक समस्याएं स्वयं हमारी अपनी दूरदर्शिता के अभाव का भी परिणाम हैं। इस में मुस्लिम संप्रदाय से प्रश्न किया गया है कि क्या आज भी देश के राजनीतिक क्षितिज पर वह एक नई वैचारिक व सैद्धान्तिक सच्चाई, अर्थात भगवा रंग/हिन्दुत्व के उभार से अंजान हैं या जान बूझ कर मुंह मोड़ रहे हैं? अब जबकि देश का सत्तारूढ़ दल और उसके विचारक आरएसएस हमारे साथ बातचीत के लिए मुक्त हृदय से बाहें फैला रहे हैं तो अपने देश और समुदाय के विस्तृत हितों को सोचते और समझते हुए हम उन अनुकूल परिस्थितियों के पथ पर पांव बढ़ाने में क्यों झिझक रहे हैं?

सवाल: आरएसएस के प्रति आपके क्या विचार हैं?

जवाब: मैं समझता हूँ कि आरएसएस भारत का सबसे बड़ा सामाजिक व सांस्कृतिक हिंदुवादी संगठन है जो लंबे समय से अपनी घोषित राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ अपने कार्य में तल्लीन है। आरएसएस ने सदा से ही मुस्लिम वर्ग को साथ में जोड़ने और मिल कर राष्ट्र निर्माण में सहभागिता का आवाहन दिया है। जिस प्रकार से एक मुस्लिम अपनी शांतिप्रिय विचारधारा के साथ भारत को एक महान राष्ट्र बनाने कि ओर अग्रसर है, उसी प्रकार से आरएसएस भी सभी संप्रदायों के मध्य समन्वय, समानता व समरसता के मार्ग को प्रशस्त करने में प्रयत्नशील है। यही कारण है कि आज आरएसएस का वर्चस्व है और मुस्लिमों के प्रति सदा ही आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व का नजरिया रहा है कि वे उन्हें भी सबके साथ लेकर चले ताकि उनके विकास, साथ और विश्वास द्वारा देश भी प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हो।

सवाल: आखिर मुस्लिमों और संघ के बीच वैमनस्य का मुख्य कारण क्या है?

जवाब: देखिए मुस्लिम वर्ग समाज के अन्यवर्गों के साथ सदा से ही राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता रहा है। हाँ कुछ तत्व ऐसे हो सकते हैं, जो कि हर समुदाय में होते हैं, जो अपने निजी स्वार्थ हेतु एक आम नागरिक की भोली भाली मानसिकता को भटकाने में सफल हो जाते हैं, जिससे वातवर्ण दूषित हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम समुदाय, सरकार, आरएसएस और भाजपा के साथ टकराव की भूमिका में है। ऐसा इस लिए भी प्रेतीत होता है क्योंकि मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के लिए कुछ स्वयंभू और तथा कथित लोग खड़े हो जाते हैं जिनके कारण मुस्लिम वर्ग की छवि पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

सवाल: समाज में कुछ तथा कथित धर्म निरपेक्षतावादी लोगों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

जवाब: यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि ऐसे तत्वों के कारण ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था को बट्टा लगता है और संविधान में निर्धारित आजादी को बजाय ठीक ढंग से अपनाने के, वे उल्टी गंगा ही बहाने लगते हैं। उधर पिछले 5-6 दशकों में जिस प्रकार से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम वर्ग को अपनी सत्ता हथियाने के लिए प्रयुक्त किया है, और उनके प्रति दिखाई गई वफादारी का बदला सच्चर कमेटी रिपोर्ट के तौर पर थमा दिया है, उससे मुस्लिम वर्ग में अनिश्चितता की स्थिति है जिसका नतीजा यह देखने में आया है कि इस विचारधारा पर सावरकर, हेड्गेवार और हिन्दुत्व की विचारधारा हावी हुई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि, यही खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले अब नर्म हिंदुत्व के पीछे चल पड़े हैं जिससे इनका दोगलापन खुल कर सामने आ गया है।

सवाल: इस पुस्तक के विमोचन के बाद आप किस प्रकार के बदलाव की हवा मुस्लिम समाज में प्रतीत करते हैं?

जवाब: इस पुस्तक के आने के बाद यह बात तो जग जाहिर हो गई है कि जो त्रुटियाँ मुस्लिम समाज को लेकर कांग्रेस, मुस्लिम व मुस्लिम संप्रदाय के स्वयंभू नेताओं के द्वारा घटित हैं, उन पर विचार विमर्श होगा। इस पुस्तक की एक विशेषता यह है कि इसको भारतीय समाज के सभी वर्ग के दिग्गजों का समर्थन प्राप्त है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस का विमोचन सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत द्वारा किया जाना अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा करता हूँ की उनका संबोधन राष्ट्र व समाज को एक नई दिशा देगा।

सवाल: क्या आपको ऐसा लगता है कि इस पुस्तक के प्रचार व प्रसार के बाद कुछ लोग आपसे नाराज हो जाएंगे?
जवाब: मुझे ऐसा कुछ नहीं लगता क्योंकि राजनीति की दुनिया में में ने बहुत कुछ सीखा है और यही कारण है कि मेरे बहुत अच्छे संबंध रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयीजी से। दोनों के साथ न केवल मेरे बढ़िया संबंध रहे हैं बल्कि मुस्लिम संप्रदाय के बारे में भी मैं अपने सद्भावनापूर्ण विचार उनको देता चला आया हूँ।  मुझे आशा है की इस पुस्तक को पढ़ने के बाद होने वाली राष्ट्रव्यापी चर्चा और विश्लेषण का दौर प्रारम्भ होगा। 

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