चर्चा-ए-आमराष्ट्रीय

बंगाल चुनाव में हिंसक खेला होये !

कमल सेखरी

खेला होये-खेला होये-खेला होये, पश्विम बंगाल के पिछले कुछ चुनावों में ये शब्द पूरे देश को सुनने को मिलते रहे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी खेला फिर होगा लेकिन ये बड़ा खेला होगा और हो सकता है हिंसक खेला होये। हमारे संविधान की धारा 326 कहती है कि किसी भी आम चुनाव में चाहे वो किसी स्तर का चुनाव हो कोई भी मतदाता अपने वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं रहना चाहिए। इस अधीनियम के अनुसार यदि किसी भी आम चुनाव में एक मतदाता भी वोट देने से रह जाता है तो वो चुनाव अवैध करार दिया जा सकता है और उसे अलोकतांत्रिक माना जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में इस बार होने जा रहे विधानसभा चुनाव में जो पहली सूची चुनावी घोषणा होने के बाद जारी की गई उसमें लगभग 92 लाख मतदाता ऐसे थे जिन्होंने पूर्व के चुनावों में अपना मत दिया था लेकिन इस बार की विधानसभा चुनाव की सूची में उनके नाम शामिल नहीं थे। इस बात को लेकर टीएमसी सहित अन्य विपक्षी दलों ने काफी शोर मचाया तो मुख्य चुनाव आयोग ने यह फैसला लिया कि एक और सूची जल्द ही छह अप्रैल तक जारी कर दी जाएगी जिसमें जो मतदाता भूलवश रह गए हैं उन्हें शामिल कर लिया जाएगा इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के जरिये यह काम पूरा कराने के आदेश मुख्य चुनाव आयोग को दिये। काफी ही हुज्जत करके और सुबह-शाम कतारों में खड़े होकर लोगों ने न्यायाधीशों की बनाई गई उन विभिन्न पीठों के समक्ष अपने दावे पेश किए और छह अप्रैल तक सभी कांट छांट करके दो किश्तों में मतदाता सूची तैयार हुई, पहली सूची में 58 लाख मतदाता हटाए गए और छह अप्रैल को जारी अंतिम सूची में 27 लाख 960 मतदाता फिर भी ऐसे रह गए जिनकी ना तो कोई पुष्टि हो पाई और ना ही जिनके जायज-नाजायज होने की कोई जानकारी प्राप्त हो पाई। 7 अप्रैल को नामांकन का अंतिम दिन रहा और तब तक ये लगभग 28 लाख मतदाता अधर में ही लटके नजर आए। अब मुख्य चुनाव आयोग यह कह रहा है कि 22 अप्रैल तक इन 27 लाख 960 मतदाताओं की सूची भी फाइनल कर ली जाएगी और वो चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाल दी जाएगी। लेकिन यह कैसे संभव होगा जबकि चुनाव आयोग ने बंगाल की मतदाता सूची पूरी तरह से फ्रीज कर दी है। ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी प्रदेश के विधानसभा चुनाव की सूची पूरी तरह तैयार नहीं हो और वहां मतदान की घोषणा चुनाव आयोग कर दे। यहां तक कि नामांकन की तारीख तक भी कई लाख वोटर अभी भी अधर में लटके हुए हैं। टीएमसी का आरोप है कि जिन वोटरों को लिस्ट से बाहर किया गया है वो सब जायज वोटर हैं और पिछले कई चुनावों से वो और उनके पूर्वज लगातार वोट देते आ रहे हैं। बंगाल के इस चुनाव में एक और बड़ी बात भी सामने आई है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण करने वाले टीएमसी से हटाए गए नेता हिमांयु कबीर की पार्टी और असदुददीन औवेसी की पार्टी के बीच जो गठबंधन हुआ था वो औवेसी ने तोड़ दिया है। बताया जा रहा है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एक दिन पहले ही हिमांयु कबीर का गुप्त कैमरों से किया गया स्टिंग आपरेशन सोशल मीडिया और नेशनल टीवी पर प्रसारित हो गया जिसमें यह सुनाई और दिखाई दिया कि हिमांयु कबीर ने भाजपा से एक हजार करोड़ रुपए लिये हैं जो बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं को टीएमसी से अलग करने के लिए दिये गये हैं। दो मिनट की इस छोटी कवरेज में दिखाया गया है कि हिमांयु कबीर खुद अपने आदमी से कह रहे हैं कि बाबरी मस्जिद बने ना बने लेकिन हमने भोले-भाले मुसलमानों के वोट बिखेरने के लिए चार सौ करोड़ रुपए उन विधानसभा क्षेत्रों के लिये लिए हैं जहां मुस्लिम मतदाता अधिक संख्या में हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी आरोप लगाया है कि उनकी खुद की विधानसभा सीट भवानीपुर में 40 फीसदी मतदाताओं के नाम काट दिये गये हैं जिन्होंने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में टीएमसी को वोट दिया था। कुल मिलाकर ऐसी और कई परिस्थितियां वहां हर रोज बनती नजर आ रही हैं जो चुनाव होने तक बड़ा विकराल रूप लेकर हिंसक भी हो सकती हैं। यह भी अनुमान है कि बंगाल के अब तक के चुनावों में जो भी हिंसा देश को देखने को मिली इस बार वो उससे कहीं अधिक हो सकती है। हालांकि चुनाव आयोग ने इस नजर से भी सभी व्यवस्थाएं मजबूत कर ली हैं और सुरक्षा की दृष्टि से प्रदेश के मुख्य सचिव, गृह सचिव तथा पुलिस महानिदेशक सहित राज्य के 80 फीसदी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले कर दिये हैं। इसी के साथ अभी से राज्य में बड़ी संख्या में केन्द्रीय सुरक्षा बल की तैनाती भी करा दी गई है। लेकिन फिर भी बंगाल का चुनाव बिना हिंसा के निकल जाए यह सबके लिए एक आश्चर्य की ही बात होगी और इस बार तो अगर हिंसा हुई तो बड़े स्तर की होने की संभावना है।

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