पुतिन की यात्रा से विपक्षी दलों को क्यों दूर रखा !

कमल सेखरी
हमारे देश में सत्ता दल और विपक्ष के नेताओं के बीच आपसी तालमेल और सौहार्द कभी बने भी तो कैसे बने। जबकि ये नेतागण ना तो राजनीतिक आचरणों को मान रहे हैं और ना ही सियासी मापदंडों की कोई परवाह करते हैं। प्रारंभ से ही यह परंपरा चली आ रही है कि जब भी देश में किसी दूसरे मुल्क का प्रधानमंत्री या राष्टÑपति हमारी मेहमाननवाजी में आता है तो सरकार उसका स्वागत करती ही करती है साथ ही प्रमुख दलों के बड़े नेता और खासतौर पर नेता विपक्षी दल भी उस राजनीतिक व्यक्तित्व का स्वागत भी करते हैं और साथ ही उस विदेशी मेहमान के लिए आयोजित किए जा रहे सभी कार्यक्रमों में भागेदारी करते हैं। यह परंपरा विश्व के अधिकांश देशों में निभाई जा रही है और खासतौर पर वो मुल्क जिसे हम लोकतांत्रिक देश कहते हैं वहां तो इस तरह की प्रक्रिया को प्राथमिकता पर निभाया जाता है। अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 दिसंबर को अपनी दो दिवसीय यात्रा पर भारत पहुंच गए हैं। पहले दिन उनके सम्मान में प्रधानमंत्री आवास पर रात्री भोज आयोजित किया जा रहा है। इसमें सत्ता दल के तो सभी नेता उपस्थित रहेंगे ही साथ ही कुछ प्रमुख लोग भी मौजूद रहेंगे लेकिन विपक्ष के किसी एक नेता को भी इस भोज में आमंत्रित नहीं किया गया है। यहां तक कि कैबिनेट रैंक प्राप्त विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी इस भोज का न्यौता नहीं दिया गया है। 5 दिसंबर की सुबह से लेकर शाम तक बड़ी ही व्यस्त व्यवस्था के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति श्री पुतिन के बीच कई बैठकें होंगी जिनमें सुरक्षा से संबंधित 25 समझौतों के अलावा शिक्षा, चिकित्सा और मीडिया क्षेत्र के कई मुद्दों पर मसौदे तय होंगे। 5 दिसंबर की रात श्री पुतिन के वापस लौटने से पहले राष्ट्रपति भवन में भी रूस के राष्ट्रपति के स्वागत में एक भव्य भोज आयोजित किया जा रहा है, इस भोज में भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ किसी भी विपक्षी दल के किसी नेता को आमंत्रित नहीं किया गया है। अगर गंभीरता से सोचें तो राष्ट्रपति तो सभी का साझी हैं और भारत का राष्ट्रपति भवन सत्ता दल और विपक्ष के सभी नेताओं के लिए बराबरी से ही खुला रहना चाहिए। राष्ट्रपति भवन के किसी भी आयोजन में कोई सियासी बू नहीं आनी चाहिए। अगर राष्ट्रपति पुतिन नेता प्रतिपक्ष सहित विपक्षी दलों से अलग से मिल भी लेते तो उनकी भारत यात्रा का जो उददेश्य निश्चित है वो तो खंडित नहीं हो सकता। इसी तरह सत्ता दल और विपक्षी दलों के बीच अनावश्यक ही दरारें पड़ती हैं और गहराती चली जाती हैं। अब श्री पुतिन जो 25 सुरक्षा समझौतों को तय करने जा रहे हैं वो निसंदेह पहले से ही तय हैं अब तो केवल कागजों पर हस्ताक्षर होना ही शेष है। ऐसे में विपक्षी दल इधर उधर से खोजकर इन 25 समझौतों में कई खामियां, अनियमितताएं और अवैधताएं खोजने में लग जाएगा और सफल भी होगा। अगर विपक्ष से श्री पुतिन की बैठक हो जाती तो विपक्षी दलों की सहमति भी इन समझौतों के साथ जुड़ जाती। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत छोड़ने के बाद उनकी भारत यात्रा और उनके साथ हुए समझौतों पर सड़क से लेकर सदन तक हंगामा बरपेगा यह तय है।

