चर्चा-ए-आमस्लाइडर

हमें अंग्रेजी आक्रांताओं से इतनी मोहब्बत क्यों है?

Why do we love the English invaders so much?

कमल सेखरी

हमारे देश भारत को अलग-अलग समय में कई विदेशी आक्रांताओं ने हमले कर करके लूटा है। 400 साल पहले हमारे देश में कई मुगल शासकों ने बड़ी क्रूरता अपनाते हुए बेरहमी का दुर्व्यवहार करके हमारा दशकों तक शोषण किया। इनमें से कुछ शासक तो निसंदेह काफी क्रूर थे और उन्होंने हमें गुलाम बनाकर बड़ी निर्ममता से लूटा। हमारे कई हिन्दू राजाओं और उस समय के धर्म गुरुओं की हत्या बड़ी निर्ममता से की गई जिनमें सबसे ऊपर नाम औरंगजेब का लिया जाता है जिसे लेकर आज पूरे भारत में हिन्दू-मुसलमान के नाम से राजनीति की जा रही है जिसके फलस्वरूप बीते दिन नागपुर में हिंसा भी भड़की है। 400 वर्ष पहले भारत में आए मुगल आक्रांताओं को आज हम अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाकर पूरे देश में आंदोलन चलाए हुए हैं। लेकिन अभी आठ दशक पहले तक हमारे देश पर जुल्म और क्रूरता बरतने वाले अंग्रेजी आक्रांताओं का ना तो कहीं हम नाम ले रहे हैं और ना ही देश की राजनीति में वोट पाने का आधार मानकर उन्हें कोई स्थान दे रहे हैं। अगर हम गहराई से 400 साल पहले के मुगल आक्रांताओं के जुल्मों की तुलना अंग्रेजी आक्रांताओं के साथ करें तो हम पाएंगे कि अंग्रेजी आक्रांताओं की क्रूरता और जुल्म शायद मुगलकाल से कहीं अधिक थे। अंग्रेजों ने भारत आते ही हमारे गरीब किसानों की जमीनों पर कब्जा किया,उनकी फसलों पर भारी लगान लगा दिया और उनकी निजी संपत्तियों पर भी सरकारी लगान वसूलना शुरू कर दिया। लगान की रकम अदा ना करने पर किसानों की जमीन और फसलों पर अंग्रेजी हुकूमत कब्जा कर लेती थी और निजी संपत्तियों को भी लगान ना देने पर सरकारी कब्जे में ले लिया जाता था। सरकारी देय का भुगतान ना करने वालों पर कोड़े भी बरसाए जाते थे। अंग्रेजों ने बर्बरता बरतते हुए छोटी-छोटी गलतियों पर ही हजारों हिन्दुस्तानियों को फांसी पर चढ़ा दिया। गाजियाबाद के निकट दादरी कस्बे के लुहारली गांव में बड़ के एक पेड़ पर 18 ग्रामवासियों को लटका कर फांसी दे दी गई। पंजाब के जलियांवाला बाग में लगे एक मेले में उपस्थित हजारों भारतीयों को मेला मैदान की चार दीवारी के बीच बंद करके हजारों की संख्या में लोगों को गोलियों से भून डाला। अंग्रेजी आक्रांताओं के शासन के सौ वर्षों में भारत ने जो जुल्म क्रूरता और निमर्मता का अंग्रेजी व्यवहार झेला वो इतिहास के पृष्ठों में बर्बरता का सबसे क्रूर काल बनकर अंकित हुआ है। उन्हीं क्रूर अंग्रेजी शासकों के नाम पर आज भी हमारे देश के कई बड़े शहरों में सड़कों के नाम अंकित हैं। अंग्रेजों की याद में कई बड़े स्मारक आज भी देश में देखे जा सकते हैं। सन 1857 में अंग्रेजों के साथ हुई क्रांति की पहली जंग जो गाजियाबाद की हिंडन नदी के किनारे लड़ी गई और उसमें जो हिन्दुस्तानी शहीद हुए उनका तो कहीं जिक्र नहीं है लेकिन जो अंग्रेज आक्रांताओं के सिपाही मरे उनकी कब्रें आज भी गाजियाबाद की हिंडन नदी के किनारे बड़ी संख्या में देखी जा सकती हैं। इतिहास के पृष्ठों के मुताबिक सौ साल के शासन के बाद जब अंग्रेजी आक्रांता भारत से वापस लौटे तो वो अपने साथ 3790 लाख करोड़ का खजाना लूटकर ले गए जबकि मुगलकाल में मुगलों की यह लूट 617 हजार करोड़ थी। इतना सबकुछ होने के बावजूद भी अंग्रेजी आंक्रांताओं के प्रति हमारी मोहब्बत आज कहीं कम नहीं हो रही। हम अपने बच्चों को ब्रिटेन भेजकर शिक्षा दिलाने में गर्व महसूस करते हैं, कामन वेल्थ गेम्स में भारत की प्रतिभागिता पर हमें नाज होता है। पर्यटन के लिए ब्रिटेन जाना हमारी प्राथमिकता बनी हुई है। हम पर सौ साल तक जिन आंक्रांताओं ने हम पर जुल्म ढहाया हम उनके खिलाफ दो शब्द भी बोलने को तैयार नहीं हैं। जबकि देश की राजनीति को हम 400 साल पुराने मुगल शासकों के नाम से जोड़कर हिन्दू-मुस्लिम का आधार मानकर देश का हर चुनाव लड़ रहे हैं। हम शायद ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि देश के पांचवें हिस्से की मुस्लिम आबादी हमें अपना वोट नहीं देती और इस नुकसान को पूरा करने के लिए हमें हिन्दू संगठित करकर रखने पड़ रहे हैं। इसलिए हिन्दू-मुस्लिम का राजनीतिक कार्ड खेलना हमारी मजबूरी है। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी आंक्रांतिाओं के हर जुल्म को हम इसलिए भी बर्दाश्त कर रहे हैं क्योंकि देश में अंग्रेजों से प्रभावित हमारा इसाई समाज मात्र एक प्रतिशत आबादी में हिस्सेदारी रखता है। जबकि यह एक प्रतिशत इसाई मतदाता भी भाजपा को कभी अपनी वोट नहीं देते लेकिन क्योंकि उनकी संख्या इतनी कम है कि हम इन्हें आसानी से नजर अंदाज कर सकते हैं। अगर हमें भारत पर हमला करने वाले बाहरी आक्रांताओं को लेकर राजनीति का मुददा बनाना ही है तो अंग्रेज आक्रांता हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए। अब अंग्रेज आक्रांताओं से हमारी अतीत का क्या गठजोड़ है उनके साथ पूर्व में हमारे कैसे संबंध रहे हैं इसी को लेकर आज यह मूल्यांकन किया जा सकता है कि हमें अंग्रेजी आक्रांताओं से इतनी मुहब्बत क्यों है। क्यों नहीं हम इन्हें मुगलों की तरह अपनी राजनीति की नफरत का आधार नहीं बनाते।

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