किसने मार दिया युवराज !

कमल सेखरी
साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर
अफसोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते।
ये डूबने वाला 27 साल का साफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता अपने घर का इकलौता चिराग था। गुरुग्राम से अपने घर नोएडा लौट रहा था कि घने कोहरे के बीच उसकी कार सड़क के किनारे पानी भरे एक गहरे गड्ढे में उतर गई। मौत की खाई बना ये गहरा गड्ढा एक बिल्डर ने अपना मॉल बनाने की नजर से ढाई साल पहले खोदा था और तभी से ये यूं ही पड़ा था और इसमें चारों तरफ से आया पानी गिरकर इकट्ठा हो गया था। कार गिरने के बाद युवराज ने गिरी कार की छत पर खड़े होकर इमदाद के लिए आवाजें लगाई, कुछ लोग आवाजें सुनकर रुके और उन्होंने स्थानीय पुलिस को मोबाइल पर सूचना दी। पुलिस आ गई और उसने साथ ही फायर ब्रिगेड की यूनिट को भी बुलवा लिया। तब तक उस गढ्ढे के चारों ओर स्थानीय पुलिस और फायर ब्रिगेडकर्मियों के अलावा लगभग सौ से अधिक लोग भी एकत्र हो गए लेकिन किसी ने धीरे-धीरे गहरे पानी की ओर बढ़ती युवराज की कार और उसके ऊपर खड़े शोर मचाते युवराज की कोई मदद नहीं की। वहां उपस्थित पुलिसकर्मी और फायर ब्रिगेड वाले एकत्र पानी की ठंडक और गहराई नापने में लगे रहे लेकिन किसी ने यह कोशिश नहीं की कि किसी तरह युवराज तक पहुंचकर उसकी जान बचाई जाए। युवराज डेढ़ घंटे से भी अधिक समय तक मदद के लिए चिल्लाता रहा और वहां एकत्र भीड़ के साथ-साथ पुलिसकर्मी और फायर ब्रिगेड के लोगों ने उसकी मदद करने की कोई कोशिश नहीं की। अंतत: युवराज की गाड़ी तो नीचे गिरकर डूब ही गई और साथ ही युवराज भी मौत के आगोश में समा गया। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के बाद सभी साधनों के रहते हुए वो लोग भी युवराज की जान बचाने की ओर एक कदम भी नहीं बढ़े जिनका दायित्व हर सूरत में उस नौजवान की जान बचाना था। इस घटना ने जहां एक ओर समूची शासकीय और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई बड़े प्रश्नचिन्ह तो खड़े कर ही दिये हैं साथ ही बड़ी संख्या में वहां उपस्थित उन लोगों की संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं जो साहिल के तमाशाइयों की तरह डूबने वाले युवराज की मदद के लिए चिल्लाते तो रहे लेकिन इमदाद की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ाया। ये हमारी सोच को क्या हो गया, क्या इस देश में अब हम हिन्दू-मुस्लिम की बनाई गई सियासी सोच से अलग हटकर आपसी भाईचारे की कोई सोच बना ही नहीं पा रहे हैं। क्या हम देश के नागरिकों की इसी सोच और व्यवस्था के ऐसे निष्क्रिय व्यवहार को लेकर ही विश्व गुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ने की कल्पना कर रहे हैं। इस घटना के संदर्भ को लेकर मेरे जहन में आस्ट्रेलिया के मेलबर्न स्टेट में घटी एक घटना रह रहकर उभर आती है जिसका मैं प्रत्यक्षदर्शी बना। यह बात 1988 की है जब एक सात साल का मानसिक विक्षिप्त बच्चा अचानक अपने घर से निकला और कहीं लापता हो गया। तीन दिन तक उस बच्चे के ना मिलने पर गुमशुदगी का यह मामला राष्टÑीय स्तर का मुद्दा बन गया। आस्ट्रेलिया के मीडिया ने राजधानी केनबरा में गृहमंत्री को घेरकर तीन दिन से लापता इस बच्चे के बारे में जानकारी लेनी चाही और प्रश्नों की बौछार कर दी। गहमा गहमी के इस माहौल के बीच एक दो मीडियाकर्मियों ने गृहमंत्री राबर्ट रे से पूछा कि आप बच्चा कब तक खोज लेंगे। गृहमंत्री ने कहा तीन दिन में। मीडिया ने प्रश्न दाग दिया कि अगर तीन दिन में बच्चा नहीं मिला तो क्या आप इस्तीफा देंगे। उसी प्रेस मीट में गृहमंत्री ने जवाब में कह दिया कि अगर हम तीन दिन तक बच्चा खोज नहीं पाए तो मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा। यह होती है सरकार की संवेदनशीलता। तीन दिन में बच्चा खोज निकाला हालांकि उस बच्चे को वो जीवित नहीं खोज पाए लेकिन सरकार का आश्वासन उन्होंने पूरा किया। बच्चे की खोज में एक घने जंगल में तलाश करते हुए बड़ी संख्या में सैनिक बलों को लगाया और दर्जनों हेलीकाप्टरों से सर्च अभियान चलाया गया। हम देश की राजधानी दिल्ली से बिल्कुल सटे उत्तर प्रदेश के बड़े महानगर नोएडा जहां जिलाधिकारी के अलावा पुलिस कमिश्नर, सत्तारुढ़ के पार्टी सांसद, विधायक और भी कई बड़े सियासी नेता रह रहे हैं उस महानगर में हम दो घंटे तक मदद की गुहार लगाते रहे एक युवा साफ्टवेयर इंजीनियर को नहीं बचा पाए जबकि वहां मौके पर फायर ब्रिगेड, स्थानीय पुलिसकर्मी और सौ से अधिक अन्य नागरिक उपस्थित थे। देश के सभी बड़े टीवी चैनल भी उसी महानगर से संचालित होते हैं उन चैनलों ने भी खुली जुबान से प्रदेश और केन्द्र की सरकार से यह पूछने की हिमाकत नहीं की कि युवराज को क्यों नहीं बचाया जा सका। यह मामला एक नवयुवक युवराज मेहता का नहीं है यह देश की सोच का हिस्सा बन गया है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि देश में ऐसी परिस्थितियां और ऐसी असंवेदनशीलता बनाने का जिम्मेदार कौन है। हम पहले कभी ऐसे नहीं थे जैसे संवेदनहीन अब हम बनते जा रहे हैं। युवराज की यह मौत सही मायने में सब लोगों के बीच व्यवस्था की लापरवाही के चलते एक हत्या ही है। ऐसी व्यवस्था पर हत्या के इल्जाम दागने वाजिब होंगे।

