चर्चा-ए-आम

कौन धकेल रहा है देश को विनाश की ओर !

कमल सेखरी

जाने में या अनजाने में हम ये कर क्या रहे हैं। ये गलतियां हम से हो रही हैं या फिर हम इन गलतियों को अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते जानबूझकर कर रहे हैं। प्रयागराज के माघ मेला में गंगा स्नान को आए ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके साथ संगत दे रहे उनके सहयोगी संतों को लेकर हमारे शासन प्रशासन ने जो किया वो किसी शंकराचार्य स्तर के महान संत के साथ हुआ एक ऐसा दुर्व्यवहार था जिसे आसानी से माफ नहीं किया जा सकता। लेकिन हमारे प्रदेश शासन ने और वहां के स्थानीय प्रशासन ने महसूस करना तो दूर बल्कि उलटा शंकराचार्य और उनके सभी सहयोगी संतों को अपराधियों की तरह आंकते हुए उनके खिलाफ कई ऐसी कार्रवाइयां निरंतर रह रहकर की जो क्षमा योग्य नहीं हो सकती। हमने अपने इसी स्तंभ में प्रारंभ में ही लिखा था कि अगर दो भगवाधारी संत और महंत के बीच छिड़ी यह जंग जल्द ही ना निपटा ली गई तो यह एक विकराल रूप धारण कर सकती है। ऐसा ही हुआ। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो हठ योगी हैं वो अपनी हठ पर अड़ गए और दूसरी ओर शंकराचार्य को विकल्प के अभाव में हठ पर उतरना पड़ा क्योंकि मामला उनका अपना निजी नहीं था। यह मामला ज्योतिष पीठ से लेकर उनके साथ आए सैकड़ों संतों और बाल बटूकों के मान सम्मान और स्वाभिमान का भी था जिसे किसी संतोषजनक निर्णय तक पहुंचाकर शंकराचार्य ना तो स्नान करने जा सकते थे और ना ही अपने शिविर से वापस लौटकर जा सकते थे। मामले ने तूल पकड़ा और कुछ लाभार्थी संतों को छोड़कर देश के कई बड़े संत यहां तक कि अन्य तीनों पीठों के शंकराचार्य भी ज्योतिष पीठ के मान सम्मान की खातिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खड़े हो गए। इस बीच उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केश्व प्रसाद मौर्य ने दो बार इस घटना से आहत हुए शंकराचार्य को पूरा मान सम्मान देते हुए अनुरोध किया कि वो अपना धरना छोड़कर गंगा में स्नान करें लेकिन श्री मौर्य का इतना कहना भर पर्याप्त नहीं था क्योंकि दूसरी ओर शासन के मुखिया और प्रशासन के अधिकारी रह रहकर इस तरह के बयान दे रहे थे जिससे यह प्रकरण और उग्र हो और ऐसा हुआ भी। अब वहां शंकराचार्य के शिविर के बाहर देश के कई नामी संत एकत्र हो गए हैं और उन्होंने वहां हठ धूनी की क्रिया यह कहकर आरंभ कर दी है कि हम संतजन मिलकर हठ का जवाब हठ से देंगे। शंकराचार्य का यह प्रकरण अभी पुरजोरता से चल ही रहा था कि इस बीच यूजीसी ने छात्रों के लिए एक नया नियम जारी कर देश में पहले से बिगड़े हालात से सुलग रही आग में घी डालने का काम किया। यूजीसी ने एक नया आदेश जारी कर देश के तमाम विश्वविद्यालयों को जिनमें लगभग दो करोड़ छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं उनके लिए एक नियम यह जारी किया कि किसी भी विश्वविद्यालय में एससी/एसटी और ओबीसी वर्ग के किसी भी छात्र-छात्रा के साथ अगर कोई अन्य सामान्य वर्ग का विद्यार्थी कोई अपशब्द बोलता है या उसे किसी रूप में अपमानित करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस नियम में यह प्रावधान भी रखा गया है कि जिस छात्र पर आरोप लगाया जाएगा वो बेगुनाह यह उस कथित आरोपित छात्र को ही प्रमाणित करना होगा। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि एससी/एसटी या ओबीसी वर्ग का कोई पीड़ित छात्र अपने ऊपर हुए अत्याचार का आरोप लगाता है और यदि वह आरोप गलत भी पाया जाता है तो भी आरोप लगाने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। जबकि पहले यह नियम था कि गलत आरोप लगाने पर उसे दंडित किया जाएगा जो गलत आरोप लगाएगा। यूजीसी के इस नियम का आदेश पारित होते ही पूरे देश में बड़ी तेज प्रतिक्रिया हुई और इससे प्रभावित बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने आहत होकर यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि मैं शंकराचार्य अविमुक्तरानंद पर हुए अत्याचारों और यूजीसी द्वारा पारित नए आदेश से आहत होकर अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं। उन्होंने सत्ता का सुख भोग रहे ब्राह्मण विधायकों, सांसदों और मंत्रियों से अपील की कि वो सत्ता सुख छोड़कर अपने समाज की रक्षा में सरकार के गलत फैसलों के खिलाफ खड़े हो जाएं। यूजीसी के इस नए नियमों के खिलाफ राजपूत बिरादरी की करणी सेना ने भी आज प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जुलूस निकाला इसके अलावा कई हिन्दू संगठनों ने भी इस संबंध में मीडिया में बयान जारी कर अपना रोष प्रकट किया है। राष्ट्रीय सैनिक संस्था से जुड़े पूर्व सैनिकों ने अपने खून से एक विरोध पत्र लिखकर राज्यपाल की मार्फत देश के प्रधानमंत्री को भेजा है। कुल मिलाकर एक तरफ प्रयागराज के माघ मेला में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का चलाया जा रहा विरोध प्रदर्शन और देश के कई प्रदेशों में यूजीसी के इस नए नियम के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं और मामला कुछ ऐसा बनता जा रहा है जैसा कभी अगस्त 1990 में मंडल-कमंडल के मामले को लेकर पूरे देश में बनता नजर आया था। यह जो कुछ भी हो रहा है वो देश को विनाश की ओर धकेल रहा है अगर इसे तुरंत ही ना रोका गया तो देश में गृहयुद्ध होने की संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं।

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