चर्चा-ए-आम

सदन में कौन कर रहा है ड्रामा ?


कमल सेखरी

सोमवार को आरंभ हुए संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के द्वार के बाहर एकत्रित मीडिया को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों पर कई आरोप लगाते हुए कहा कि वो पिछले चुनावों में मिली हार की हताशा से उभर नहीं पा रहे। उन्हें संसद की कार्यवाही में गतिरोध पैदा नहीं करने चाहिएं क्योंकि अब समय ड्रामा करने का नहीं डिलिवरी देने का आ गया है। देश में पिछले कई सालों से जिस तरह की सियासत चल रही है उससे देश परेशान है। नेतागण चाहे सत्ता दल से जुड़े हों या विपक्ष से वो ना तो राजनीतिक आचरणों का पालन कर रहे हैं और ना ही राजनीति के मापदंडों की लेशमात्र भी परवाह कर रहे हैं। सदन के शीतकालीन सत्र के आरंभ होने के प्रारंभ में ही जो नजारा देश को देखने को मिला है उससे यह अंदाजा नहीं लगाया जा पा रहा कि ड्रामा कौन कर रहा है और डिलिवरी कौन दे रहा है। संसद के किसी भी सत्र के आरंभ होते ही ढाई लाख रुपया प्रति मिनट के खर्चे का मीटर डाउन हो जाता है और संसद के एक दिन का मिलाकर खर्चा लगभग नौ करोड़ रुपया हर रोज का पड़ता है। अब यह किसका पैसा है? निसंदेह यह हम सब करदाताओं का धन है जो ये राजनेता बेरहमी से अपने स्वार्थों के लिए फूंक रहे हैं। सदन में विपक्ष देश की किसी भी बात को लेकर सत्ता दल से प्रश्न पूछने का अधिकार रखता है। सदन में विपक्ष कई तरह के आरोप सत्ता दल पर लगा भी सकता है, सदन के सत्र की कार्रवाई होती ही इसलिए है। जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भाजपा के कई बड़े नेता सदन के बीच कार्रवाई में बाधा डालकर कई तरह के आरोप लगाकर सरकार से प्रश्न पूछते थे तो यही कहते थे कि ये विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है जिसे छीना नहीं जा सकता। स्वर्गीय सुषमा स्वराज और स्वर्गीय श्री अरुण जेटली ने सदन में इस तरह के कई बयान दिये जो आज भी सदन के रिकॉर्ड में हैं। फिर आज विपक्ष को कुछ भी कहने से क्यों रोका जा रहा है। वंदे मातरम गीत को राष्ट्रीय गीत बनाने की अनिवार्यता को लेकर सत्ता दल प्रस्ताव रखने जा रहा है और उसके लिए दस घंटे अलग बहस का समय भी लोकसभा में निर्धारित कर दिया गया है जबकि इस गीत को अनिवार्य बनाने के लिए दस घंटे बहस करने की गुंजाइश ही नहीं है क्योंकि इसका विरोध करने की हिमाकत कोई सियासी दल कर ही नहीं सकता। ऐसे में अगर विपक्षी दल चुनाव सुधार प्रक्रिया पर अधिनियम 267 के तहत अलग समय देकर बहस कराना चाहते हैं तो उसको अनुमति क्यों नहीं दी जा रही। विपक्षी दल लोकसभा की कार्यवाही में शोर मचाकर बाधा डाल रहे हैं और कार्यवाही रह रहकर स्थगित हो रही है। इससे सत्ता दल को क्या फर्क पड़ता है वो तो अपने प्रस्तावित 14 प्रस्ताव इस शोरगुल के बीच में भी पारित कराकर ले जाएगा। विपक्ष अगर सदन में उपस्थित भी रहकर सरकार के इन प्रस्तावों का विरोध करेगा तब भी कुछ प्रभाव पड़ने वाला नहीं है, सरकार तो बहुमत से अपने प्रस्तावों को पारित करा ही ले जाएगी। अब इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा जाए कि सदन में ड्रामा कौन कर रहा है और डिलिवरी कौन दे रहा है जबकि विपक्ष के किसी भी बड़े प्रस्ताव पर सदन में बहस का समय ही नहीं दिया जा रहा है। लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि विपक्ष मजबूत रहे और मजबूती से जनहित के प्रस्तावों को सदन में रख सके। विपक्ष को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है और सत्ता दल को विपक्ष की बातों को सुनना उसका अनिवार्य दायित्व है। कुल मिलाकर सदन का यह ड्रामा बंद किया जाना चाहिए वरना ड्रामा करने का दोष दोनों पक्षों पर लगेगा और डिलिवरी ना देने के लिए भी दोनों ही पक्ष आरोपी ठहराए जाएंगे।

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