हम बन गए गांधी जी के तीन बंदर !

कमल सेखरी
पिछले दो दिनों से सड़कों से लेकर लोकसभा तक हंगामा बरप रहा है। कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर शोर मचाते रैलियां निकाल रहे हैं और लोकसभा में विपक्ष के नेता सरकार से पूछ रहे हैं कि ग्रामीण मजदूरों के लिए चलाई जा रही मनरेगा का नाम अचानक क्यों बदल दिया गया। यह योजना पिछले बीस वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार मजदूरों के लिए एक वर्ष में न्यूनतम सौ दिन के लिए रोजगार की गारंटी के नाम से चलाई जा रही थी जिसे महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के नाम से जाना जाता था। सरकार ने उस मनरेगा नाम की योजना में कुछ परिवर्तन किये और उसका नाम जी राम जी रख दिया। अब जो भी बहस दो दिन से लोकसभा में चल रही है वो देश को सुनाई तो दे रही है लेकिन उसमें कुछ बदला नहीं है और बिल को सरकार ने अपनी मंशा के अनुसार पारित भी करा लिया है। यह एक मामला नहीं है पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई मामले और भी हुए हैं जिस पर देश को गंभीरता से सोचना चाहिए और कम से कम चिंतनशील व्यक्तियों को तो इस पर चिंता करनी ही चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है कि हम बदलते समय और देश की बदलती परिस्थितियों के चलते खुद इतना बदल गए हैं कि हम गांधी जी के तीन बंदरों की तरह व्यवहार करने लगे हैं। ना तो हमें कुछ बुरा होता नजर आ रहा है और ना ही हम बुरा होता सुन रहे हैं और ना ही इन सब बातों पर कुछ बोल रहे हैं। हमने आंखें भी बंद कर रखी हैं, कान भी ढक रखे हैं और मुंह पर ताला भी लगाए बैठे हैं। अब बिहार में जो अभी हाल ही में हुआ जिसमें नियुक्ति पत्र बांटते समय मंच पर सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री ने एक मुस्लिम डाक्टर महिला को नियुक्ति पत्र देते हुए उसकी मर्जी के बिना उसके चेहरे से हिजाब हटा दिया। मुख्यमंत्री की इस हरकत के खिलाफ उनके अपने दल के नेतागण और उनकी समर्थित पार्टियों के नेताओं ने बजाये इसके कि ऐसी घटना की निंदा करते बल्कि उनके समर्थन में खड़े हो गए और ऐसे बयान तक दिये कि अगर किसी महिला को इस तरह किसी बात से ऐतराज है तो उसे घर से बाहर निकलकर नौकरी करने जाना ही नहीं चाहिए। हम बता दें कि उस पीड़ित महिला ने ना केवल डाक्टर की अपनी नौकरी ठुकरा दी बल्कि बिहार राज्य को छोड़ दिया।
मुख्यमंत्री के पक्ष में उनके अपने साथी और समर्थकों का आना तो स्वाभाविक था क्योंकि उनके कुछ भी बोलने से उनकी विचारधारा प्रभावित नहीं होती और उन्हें कोई राजनीतिक हानि भी नहीं होती। लेकिन विपक्ष के उन नेताओं को क्या हुआ जो सत्ता पक्ष के खांसने और छींकने पर भी प्रतिक्रियाएं करते थे वो अचानक चुप्पी साध गए क्योंकि उन्हें मालूम था कि इस संबंध में बोलना उन्हें सियासी नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन देश के बुद्धिजीवियों, चिंतनशील व्यक्तियों और कथित जागरुक मीडिया को क्या हो गया , किसी ने भी खुलकर इस शर्मनाक घटना का लेशमात्र भी विरोध नहीं किया। अब हम ये नहीं कहते कि हमें अपने सियासी नेताओं की हरकतों व अन्य अश्लील आचरणों को लेकर सड़क पर विरोध करना चाहिए। क्योंकि ये देश हमारा है, लोग भी हमारे हैं और सड़कों पर आना अपने देश का वातावरण खराब करने जैसी बात है। लेकिन घर पर बैठे कुछ लिखकर या बोलकर हम अपने विचार और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया के माध्यम से जनता तक पहुंचाकर उन नेताओं की हरकतों पर तो अंकुश लगा सकते हैं। हमें गांधी जी के तीन बंदर बनकर ही नहीं बैठे रहना चाहिए क्योंकि हमारे ऐसे बंदर बनकर बैठने से ही महात्मा गांधी भी हमसे दूर जाते नजर आ रहे हैं। उनकी विचारधारा तो हम कई साल पहले ही अपने से दूर कर चुके हैं।

