यूपी में छिड़ी भगवाधारियों में जंग !

कमल सेखरी
उत्तर प्रदेश में दो भगवाधारी महान मानवों के बीच धर्म युद्ध छिड़ गया है। इस युद्ध का आगाज प्रयागराज में आयोजित माघ मेला के बीच उस समय हुआ जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके साथ आये लगभग दो सौ संतों को वहां गंगा में स्नान करने से रोका गया। शंकराचार्य जी पालकी में सवार होकर अपने संत साथियों के साथ स्नान के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि बड़ी संख्या में पुलिस ने आकर उन्हें रोका और कहा कि आप पालकी में स्नान करने नहीं जा सकते और स्नान करने से पहले आयोजकों की अनुमति भी लेनी अनिवार्य होगी। यह बात शब्द ब शब्द आगे बढ़ी और एक बड़े विवाद में बदल गई। जिसका परिणाम यह रहा कि वहां उपस्थित पुलिसकर्मियों ने शंकराचार्य सहित उनके सभी संत साथियों को बुरी तरह से पीटना शुरू कर दिया और उनमें से कइयों को उनके बाल पकड़कर दूर तक घसीटते ले गए, इनमें एक 83 साल के संत को भी बुरी तरह से पीटा गया साथ ही छोटी आयु के एक बाल संत को भी पुलिस वालों ने निर्ममता से पीटा। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि गंगा स्नान करने के लिए देश के शंकराचार्य मुगल समय से ही पालकी में ही बैठकर आते रहे हैं और पिछले कुंभ मेले में भी शंकराचार्यों और बड़े संतों ने शाही स्नान के दिन पालकी में बैठकर ही अपनी गंगा घाट तक की यात्रा पूरी की है। शंकराचार्य सरकार के इस रवैये से क्षुब्ध होकर वहीं धरने पर बैठ गए और कहा कि जब तक शासन प्रशासन हमारे स्नान की सम्मानजनक व्यवस्था नहीं कर देता तब तक हम बिना स्नान किये यूं ही धरने पर बैठे रहेंगे। वहां की व्यवस्था देख रहे शासन ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की बात मानना तो दूर देररात एक बजे उन्हें धरना स्थल पर एक नोटिस जारी करके यह पूछा कि आप बताएं कि आप कौन सी पीठ के शंकराचार्य हैं और आपकी नियुक्ति कब और किसने की है। अब शंकराचार्य कैसे नियुक्त किए जाते हैं इसकी धार्मिक विधि और नीतियां तो बड़ी पेचीदा हैं लेकिन आम व्यक्ति की समझ के लिए सामान्यत: यही माना जाता है कि भारत की चार प्रमुख पीठों में से यदि किसी एक पीठ पर किसी संत की नियुक्ति शंकराचार्य के रूप में होती है तो शेष तीनों पीठ के शंकराचार्यों की सहमति उसमें शामिल होनी चाहिए जो शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में पहले से ही है। इतना ही नहीं इन शंकराचार्यों जी की उपस्थिति कई बड़े सरकारी आयोजनों में इसी पद के नाम से दर्ज हो चुकी हैं, यहां तक कि प्रयागराज में आयोजित पिछले महाकुंभ मेले में इनके शिविर के बाहर सरकारी तौर पर इनके नाम के साथ शंकराचार्य लिखा गया था जो करोड़ों लोगों ने देखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कई बार ज्योतिष पीठ जाकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले चुके हैं। बताया जाता है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद हिन्दू धर्म में बढ़ती जा रही कई खामियों को लेकर बड़ी मुखरता से प्रतिक्रियाएं करते आए हैं और पिछले दिनों काशी व मथुरा में घाटों और सड़कों के सौन्दर्योकरण के नाम पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बुल्डोजर चलाकर जो सैकड़ों देवी देवताओं की मूर्तियां खंडित की उसका भी इन शंकराचार्य ने खुलकर विरोध किया और कहा कि पौराणिकता को कायम रखते हुए ही नया सौंदर्यीकरण किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं उन्होंने काशी की गलियों में सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा करके मूर्तियों के खंडित किए जाने का विरोध किया और खुलकर अपने प्रवचनों में हिन्दू समाज को यह कहकर कोसते रहे कि यह कायरों का समाज है जो अपने धर्म की रक्षा भी शासन के सामने खड़ा होकर नहीं कर पाता है। कई राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि इन्हीं कारणों से उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच एक लंबे समय से ठनी हुई थी। अब जब माघ मेला में शंकराचार्य अपने संत मंडल के साथ गंगा स्नान को आए तो पहले से ही पूर्व नियोजित योजना के तहत उनके साथ वो सब अपमानजनक व्यवहार किया गया जिसे लेकर आज इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह भी आंका जा रहा है कि इसके पीछे भाजपा के बड़े नेताओं के बीच जो कुछ उत्तर प्रदेश सरकार को लेकर चल रहा है वही प्रयागराज की इस घटना के पीछे एक बड़ा कारण हो सकता है। बरहाल कारण जो भी हो इस विवाद के जो परिणाम अगले कुछ समय में सामने आ सकते हैं वो उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति के लिए घातक भी हो सकते हैं। अभी तो ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में बड़े भगवाधारियों के बीच हिन्दुत्व को लेकर एक बड़ी जंग छिड़ गई है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने यह घोषणा भी कर दी है कि आगामी 10 व 11 मार्च 2026 को देश के सभी साधु-संत हिन्दू धर्म बचाने की खातिर राजधानी दिल्ली में एकत्रित हों और अपना विरोध प्रकट करके इन हिन्दू विरोधी सत्ताधारी ताकतों के विरुद्ध आवाज बुलंद करें।


