चर्चा-ए-आम

ट्रंप को भुगतने होंगे अपनी जिद के परिणाम !

कमल सेखरी

मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। मैं ये करुं या वो करुं या मेरे मन में जो आए वो करुं। ये मेरी मर्जी। आप कौन होते हैं मुझे रोकने वाले या टोकने वाले। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले कुछ समय से कुछ ऐसा ही व्यवहार अपनाया हुआ है। वो जब चाहते हैं दुनियाभर के देशों पर अपनी मर्जी से कोई टैरिफ लगा देते हैं। उस टैरिफ को बढ़ाकर कहीं तक ले जाते हैं और कम करके कहीं तक नीचे ले आते हैं। वो ऐसा सबकुछ एक तरफा अपनी मर्जी से निर्णय लेकर कर रहे हैं। ना उन्हें अपने विरोधियों की चिंता है और ना ही अपनी पार्टी के अन्य सांसदों से वो किसी तरह का विचार करते हैं और ना ही अपने किसी फैसले या योजना को संसद में विचार के लिए लाते हैं। अमेरिका ने उनकी इसी हठधर्मी के चलते अपने पड़ोसी मुल्क वेनेजुएला में अपनी फौज भेजकर वहां के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को जबरन अपहरण किया और उन्हें अमेरिका लाकर जेल में डाल दिया। अगले कुछ ही घंटों में वहां सत्ता परिवर्तन करके अपनी मर्जी का राष्ट्रपति बैठा दिया और वहां के तेल भंडारणों पर अपना कब्जा कर लिया। इसी तरह डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी जिद पूरी करने के लिए खाड़ी के बड़े मुल्क ईरान पर हमला किया यह कहते हुए वहां की सत्ता तानाशाह है और वहां की आवाम पर अत्याचार कर रही है लिहाजा इस सत्ता का बदला जाना जरूरी है। हालांकि कुछ महीने पहले ही ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर यह कहकर हमला किया था कि वो परमाणु बम बना रहा है जिससे दुनिया संकट पैदा होगा। इस हमले के दौरान अमेरिका ने उस स्थान पर भी हवाई हमले किए जहां उसे लगा कि ईरान परमाणु बम बनाने की तैयारी कर रहा है। इस हमले के बाद ट्रंप ने घोषणा की कि हमने ईरान के सभी हौसले पस्त कर दिए हैं अब वो कभी परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन अभी 28 फरवरी को उसने यह कहकर अपने मित्र देश इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर फिर दूसरा हमला कर दिया यह कहते हुए कि वहां की जनता सत्ता के अत्याचारों से त्रस्त है और परिवर्तन चाहती है लिहाजा हम जनता को तानाशाह के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए ईरान में सत्ता परिवर्तन करेंगे। अब पिछले 4-5 दिनों से ईरान के साथ-साथ खाड़ी क्षेत्र के कई और देश भी ईरान पर थोपी हुई इस जंग की चपेट में आ गए हैं। अमेरिका ने जंग आरंभ होने के दूसरे ही दिन ईरान के राष्ट्रपति अली खामेनेई सहित उनके परिवार के पांच सदस्यों और 40 अन्य वरिष्ठ सलाहकार और फौज के अधिकारियों को एक साथ मार गिराया। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर अब तक ईरान की लगभग सभी सरकारी महत्वपूर्ण इमारतों को खंडहर में बदल दिया और कई नागरिक क्षेत्रों में भी हमला किया। इजराइल के एक हवाई हमले में ईरान में लड़कियों के एक बड़े शिक्षण संस्थान में बम बरसाए गए जिसमें लगभग दो सौ छात्राओं की मौत हो गई जिन्हें मौजूदा सत्ता व्यवस्था ने सभी को सामूहिक रूप से दफनाने का काम किया। इन मासूम छात्राओं की सामूहिक मौत से ना केवल ईरान बल्कि विश्व के अन्य देशों में गम का माहौल सा बन गया। इजराइल हमले में मारे गए 86 साल के इस्लामिक धर्म गुरु अली खामेनेई के अंतिम दर्शनों के लिए लाखों की संख्या में ईरानी आवाम का हुजूम उमड़ पड़ा। जिसे देखकर ये लगा कि अमेरिका का यह कहना कि वहां के लोग सत्ता से त्रस्त हैं ना केवल झूठा लगा बल्कि यह प्रमाणित भी हुआ कि लोगों का बेशुमार प्यार अपने नेता के साथ इंतकाल के बाद भी बना हुआ था। ईरान ने भी जवाबी हमले में इजराइल पर तो कई गाइडिड मिसाइलें गिरार्इं ही साथ ही खाड़ी के उन तेरह देशों में बनाए गए अमेरिका के एयरबेस को भी भारी नुकसान पहुंचाया। अमेरिका को यह लग रहा था कि खामेनेई की मौत के बाद आसानी से सत्ता परिवर्तन हो जाएगा लेकिन उसका अनुमान ना केवल गलत निकला बल्कि उसका विपरीत प्रभाव पड़ा। ईरान के पास अपनी प्रतिरक्षा में जितनी बड़ी संख्या में मिसाइलें मौजूद हैं उसका अनुमान अमेरिका और इजराइल जंग से पहले नहीं लगा पाए। वर्तमान स्थिति यह है कि ईरान के पास आज भी जितनी बड़ी संख्या में छोटी और बड़ी घातक मिसाइलें उपलब्ध हैं उसे देखते हुए लग रहा है कि ईरान अगले कई दिनों तक यह लड़ाई लड़ सकता है। अमेरिका का यह प्रयास कि वो इस जंग के माध्यम से ईरान की सत्ता का तख्ता पलट देगी वो अब दूर की करैढ़ी नजर आ रहा है। क्योंकि मिसाइलें दागने और हवाई हमलों से इमारतें तो गिराई जा सकती हैं सत्ता का परिवर्तन संभव नहीं है। सत्ता एक विचारधारा से जुड़ी होती है जो नेताओं के मारने से खत्म नहीं होती सत्ता बदलने के लिए अमेरिका और इजराइल को अपने सैनिकों को जमीन पर उतारना होगा जौ मौजूदा हालात में संभव नजर नहीं आ रहा है। अमेरिका अबसे पहले कई देशों में अपनी सेना भेजकर मुंह की खा चुका है और अपने इन परिणाम शून्य प्रयासों में अपनी सेना के कई हजार सैनिकों की जान भी गंवा चुका है। लीबिया में 15 साल रहकर अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ जबकि उसके दस हजार से अधिक सैनिक मारे गए। ईराक में भी सत्ता परिवर्तनन के नाम पर उतरे अमेरिकी सैनिकों को कुछ हाथ नहीं लगा जबकि उसके कई हजार सैनिक हताहत हुए। इसी तरह अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के नाम पर वहां के मैदानी क्षेत्रों में बीस साल रहने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ जबकि उसके 40 हजार से अधिक सैनिक अनावश्यक ही मारे गए और लादेन उन्हें उनके अपने प्रिय मित्र पाकिस्तान की पनाहगार में मिला जहां उसे मारकर उसके शव को हेलीकाप्टर से हवा में लटका कर समुद्र के बीच डाल दिया। ऐसे ही अगर ईरान में भी सत्ता परिवर्तन के नाम पर उसने अपने सैनिक युद्ध के मैदान में उतारे तो उनकी भी वहीं दुर्दशा होगी जो लीबिया, ईराक और अफगानिस्तान में हुई। अगर ऐसा हुआ और ट्रंप की इस जिद में अमेरिकी सेना मैदान में उतरी तो भी सत्ता परिर्वतन शायद ना होने पाए। लेकिन अगर उसके सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए तो अमेरिका की जनता ट्रंप को छोड़ेगी नहीं उसे सत्ता से उतारकर सड़कों पर घसीटने का काम भी कर सकती है।

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