दो खेमों में बंट रहा है संत समाज !

कमल सेखरी
5 दिन पहले प्रयागराज के माघ मेला में छिड़ी हिन्दू धर्म की सनातनी जंग अब देश का बड़ा मुददा बन गई है। अपने मान-सम्मान के अपमान के आरोप लगाते हुए ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पिछले 5 दिनों से माघ मेला में अपने शिविर के बाहर अपनी संत मंडली के साथ धरने पर बैठे हैं और मेला आयोजकों वहां के शासन-प्रशासन और प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि इन सभी ने मिलकर एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत ना केवल उन्हें गंगा में स्नान करने से रोका है बल्कि बड़ी संख्या में उनके साथ आए संतजनों को बुरी तरह से अपमानजनक तरीके से मारा पीटा है और संतों को उनके बालों से खींचकर दूर-दूर तक घसीटा है। धरने पर बैठे शंकराचार्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पर भी कई तरह के गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें हिन्दू विरोधी मानसिकता का व्यक्तिव बता रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि उनके व उनके संतों के साथ ऐसा अपमानजनक रवैया इसलिए अपनाया है क्योंकि उन्होंने पिछले दिनों काशी और मथुरा में सौन्दर्यीेकरण के नाम पर घाटों और मंदिरों में सैकड़ों देवी देवताओं की मूर्तियां ध्वस्त करने का खुलकर विरोध किया था। वहीं दूसरी ओर बजाए मामले को शांत करने के प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अब कई तरह के आरोप लगाते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को हिन्दू विरोधी और देशविरोधी तक बता रहे हैं। इन पिछले 5 दिनों में धरने पर बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को धरनास्थल पर ही वहां के प्रशासन ने तीन अलग-अलग नोटिस जारी करके उनसे ना केवल शंकराचार्य होने के सुबूत मांगे हैं बल्कि उनसे यह भी पूछा है कि क्यों ना माघ मेला में आपको आवंटित किए गए भूखंड को रदद कर दिया जाए और तीसरे नोटिस में यह कहा है कि आपने और आपके साथियों ने मेले में बेरेकेडिंग तोड़कर नियमों का उल्लंघन किया है इसके लिए क्यों ना आपके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इन तीनों प्राप्त नोटिसों ने मामला और गरमा दिया और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि देश का संत समाज दो खेमों में बंटता नजर आने लगा। देश के कई नामी संतों ने शंकराचार्य के पक्ष में अपना समर्थन दिया वहीं दूसरी ओर हिन्दू समाज के कुछ अखाड़ों और साधू-संतों ने बड़ी मुखरता से अपने बयान प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पक्ष में दिए। वहीं दूसरी ओर इस मामले ने सियासी रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस सहित समाजवादी पार्टी ने खुलकर शंकराचार्य के पक्ष में अपने बयान जारी करने शुरू कर दिए हैं और सड़कों पर उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ सियासी पोस्टरवार भी आरंभ हो गई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जो साधू-संत समाज उत्तर प्रदेश सरकार के समर्थन में आ रहा है उनमें से अधिकांश लाभार्थी हैं जिन्होंने प्रदेश सरकार से काफी बड़ा मुनाफा पिछले दिनों लिया है। सपा के मुखिया अखिलेश यादव का कहना है कि जो सूफी संत समाज है और सही मायने में धार्मिक गुरु हैं वो सच्चाई के साथ हैं और इस मामले में शंकराचार्य के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी बन गई है कि अगर यही परिस्थितियां अगले दो-चार दिन और चलती रहीं तो देश में भाजपा की धरोहर कहे जाने वाला सनातनी समाज संतों के खेमों में बंटता नजर आ सकता है। इस मामले में यह बात तो खुलकर सामने आ गई है कि भारत के चारों पीठों के शंकराचार्य एक मत से एक साथ खड़े हैं और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य को अपना नैतिक समर्थन दर्शाते नजर आ रहे हैं। इसमें एक और गंभीर पहलू यह जुड़ रहा है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने घोषणा की है कि आगामी 10-11 मार्च को देश के सभी साधू-संत गौ रक्षा की मांग को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में एकत्रित होंगे। इस दो दिनों के आंदोलन में अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यों ने भी अपनी उपस्थिति की सहमति इस आंदोलन को दी है। बताया जाता है कि साधू-संतों का यह दो दिनों का आंदोलन गाय को गौ माता का अधिकृत दर्जा दिए जाने के लिए बुलाया गया है। इन संतों का यह मानना है कि भारत विश्व में मांस निर्यात का पहले दस नंबर का देश था जो अब दूसरे नंबर पर आ गया है। मांस निर्यात करने वाली इन कंपनियों में से अधिकांश कंपनियों के मालिक भाजपा के नेता हैं और वो बीफ का भी निर्यात कर रहे हैं। संत समाज के इस दो दिवसीय आंदोलन के ऐलान ने केन्द्र सरकार की नींद उड़ा रखी है।

