चर्चा-ए-आमस्लाइडर

हमलावर यकायक बने पीड़ित और पीड़ित अचानक घोषित हुए हमलावर

  • थम नहीं रही दलित-पिछड़ों पर अत्याचार की घटनाएं
  • देश में बिगड़ रहा है धार्मिक-जातीय संतुलन
  • राजनेता कर रहे हैं आग में घी डालने का काम

कमल सेखरी
या तो जुल्मात की हद है या फिर कोई जादू है। हमलावर यकायक पीड़ित बन जाते हैं और पीड़ितों को अचानक हमलावर घोषित कर दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के दांदरपुर गांव में पिछले 5 दिन से पुलिस और राजनेताओं के बीच जो बड़े स्तर का नाटक चल रहा है वो समूचे देश में जातीय असमानता, उच्च जातियों की दबंगई और राजनेताओं के बीच चल रही निम्न स्तर की राजनीति की एक ऐसी मिसाल बन रही है जो आने वाले समय में देश के राजनीतिक इतिहास में एक बदनुमा दाग बनकर अंकित होगी। एक तरफ तो देश का युवा सुधांशु शुक्ला कंधे पर तिरंगा डाले चन्द्रयान से अंतरिक्ष में प्रवेश करता है और दूसरी ओर उसी समय देश इटावा जिले के दांदरपुर गांव में अशोभनीय, अश्लील स्तर की राजनीति की शर्मनाक घटना के घटित होने का अनुभव करता है। 5 दिन पहले जिन दो कथा वाचकों संत कुमार यादव, मुकुट शिरोमणि यादव के साथ संगत दे रहे दलित समाज के नेत्रहीन ढोलक वादक के साथ गांव के ब्राह्मण समाज ने ना केवल मारपीट की बल्कि उनके सिर मुंडवाकर उनसे पैरों में नाक रगड़वाई और ब्राह्मण समुदाये के लोगों का पेशाब एकत्र कर उनके मुंह पर छिड़का गया। पुलिस ने 48 घंटे बाद 4 नामजदों और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की और चार लोगों को ऐसी हिंसा करने पर गिरफ्तार कर लिया। जबकि उपलब्ध वीडियों में गांव के 10 अन्य ब्राह्मण समाज के लोगों के चेहरे भी स्पष्ट नजर आ रहे थे लेकिन पुलिस ने अभी तक उन्हें ना तो नामजद किया, ना ही गिरफ्तार किया है। कथा वाचन में जो नेत्रहीन दलित व्यक्ति ढोलक बजा रहा था उसके साथ भी जो मारपीट हुई उसके लिए पुलिस ने दर्ज रिपोर्ट में एससी/एसटी एक्ट की कोई धारा नहीं लगाई। 72 घंटे बाद यादव कथा वाचकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने कथा वाचन के दौरान महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की। यह प्रतिक्रिया 72 घंटे बाद सामने आई। यादव कथा वाचकों के खिलाफ अपना नाम और जाति छिपाकर कथा के करने के आरोप में भी रिपोर्ट दर्ज कराई गई। अब यह मामला राजनीतिक तौर पर तूल पकड़ रहा है और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार चुनाव में भी एक चुनावी मुददा बनता नजर आ रहा है। इस तरह की घटनाएं दलित, अति दलित, जाटव और अन्य पिछड़े समाज के लोगों के साथ लगभग रोज ही घटित हो रही हैं लेकिन कहीं भी कोई बड़ी कार्रवाई होती नजर नहीं आ रही है। अब हम जब भारत को विश्व की चौथी आर्थिक शक्ति बनने का दावा करते हुए अपने देश को विकासशील देश से ऊपर ले जाकर विकसित देश की श्रेणी में राजनीतिक तौर से जोड़ रहे हैं तो ऐसे में इटावा जैसी घटना और ऐसी अन्य कई घटनाओं का लगभग रोज ही होना क्या संदेश दे रहा है। क्या हम ऐसी सोच और विचारधारा के साथ विश्व की दूसरी या तीसरी ताकत बनकर खड़े हो सकते हैं जबकि हमारे समाज में लोगों की सोच और विचारधारा वैसी ही बनी हुई है जैसा हम ऊपर से जिक्र करते चले आ रहे हैं, ऐसे में हमारे राजनेता बजाये इसके कि स्थिति में सुधार लाने का प्रयास करे और जो सामाजिक संतुलन जातीय आधार पर बिगड़ रहा है उसे संभालने की कोशिश करें, इसके विपरीत हमारे राजनेता स्थितियां और बिगाड़ रहे हैं और अपनी राजनीति चमकाने के लिए हर रोज आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। ऐसा सबकुछ पिछले एक दशक से निरंतर चल रहा है और पूर्व के समय से कहीं अधिक संख्या में और तेजी के साथ हो रहा है। हम हो सकता है कि विकल्प के अभाव में धर्म और जाति के आधार पर अपनी सत्ता को कायम रखते हुए कुछ साल और आगे खींचकर ले जाएं लेकिन यह तय है कि जो परिस्थितियां और वातावरण सामाजिक असमानता को लेकर आज खड़ा हो गया है वो आने वाले दिनों में पूरे देश को तंग करेगा और लोगों में सौहार्द व समनव्य की भावनाओं को खंडित भी कर सकता है।

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