रूस संभल गया हम नहीं संभले !

कमल सेखरी
एक समय के इतिहास के पुराने दौर से जुड़े सोवियत संघ से लेकर कई राज्यों में विभाजित होकर शेष बचे रूस की शक्ल में आने के बाद भी रूस ने अपना सियासी महत्व नहीं खोया है। सोवियत संघ के समय में भी यह देश विश्व की एक बड़ी ताकत कहलाता था और आज भी इसने कंधे पर उस सख्ती के तगमों को खोया नहीं है। आज हम भारत में एक शक्तिशाली देश रूस के शक्तिशाली नेता राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का स्वागत दुनिया की एक बड़ी ताकत के नाम पर ही कर रहे हैं। सोवियत संघ से लेकर रूस तक के सफर में इस देश ने कई करवटें बदली हैं और इसमें कई आर्थिक उतार-चढ़ाव भी रहे लेकिन हर बार यह कठिनाई के उन अलग-अलग दौरों से निकलकर बाहर आया और आज भी उसी मान-सम्मान के साथ माना और जाना जाता है। मुझे ध्यान है कि लगभग चाढ़े चार दशक पूर्व जब मुझे मास्को जाने का अवसर मिला तब उस समय वहां की एक इकाई यानी रूबल की कीमत अमेरिकी डॉलर से ऊपर थी। सौ डॉलर देकर मात्र 75 रूबल ही आपको मिल पाते थे। इस स्थिति के एक दशक बाद मैं एक बार फिर मॉस्को गया तब एयरपोर्ट पर एक डॉलर देकर मुझे 65 रूबल प्राप्त हुए। परिस्थितियां इतनी बदल गई थीं कि इस आर्थिक परिवर्तन ने मेरी उस यात्रा को काफी सुगम बना दिया था। इससे और 12 साल बाद एक समय ऐसा आया जब उस समय के राष्ट्रपति मिखाइल गौरवचे के कार्यकाल में रूस में एक नई क्रांति शुरू हुई जिसमें मार्क्सवाद की जगह आर्थिक लिबरेशन ने लेनी शुरू की तब कुछ समय रूस के ऊपर आर्थिक संकट का सबसे बुरा दौर गुजरा। ऐसी स्थिति बनने के दो साल बाद ही मुझे एक बार फिर वहां जाने का मौका मिला, अब एक डॉलर के बदले 4 हजार से साढ़े चार हजार रूबल मार्केट में मिलने लगे थे। बाजार की स्थिति ऐसी हो गई थी कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स में डबल रोटी, अंडे, टूथपेस्ट, ब्लेड और अन्य सामान्य वस्तुएं मिलनी दूभर हो गई थीं और छोटी-छोटी चीजों के लिए हजारों लोग लाइनों में खड़े नजर आते थे। उस आर्थिक संकट की स्थिति में देश के हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि मॉस्को एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही खूबसूरत युवतियां आपको यह कहते मिलती थीं कि आप होटल में ना ठहरकर उनके साथ उनके घर में मेहमान बनकर ठहरें तो बहुत कम पैसों में आपकों उनके घरों पर हर तरह की सुविधा मिलेगी। लेकिन रूस इतनी विकट आर्थिक संकट की परिस्थितियों से भी एक छोटे समय में ही बाहर निकल आया और आज एक अमेरिकी डॉलर में 75 रूबल आपको बैंक में और बाजार में बराबर की दर से मिलते हैं। यह सब चीजें हम इसलिए जोड़कर बता रहे हैं कि कल राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने के साथ ही रुपये की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक एकदम और गिर गई। आज भारतीय रुपया एक डॉलर के बदले 91 तक की कीमत पर गिर गया है। ऐसा तब हो रहा है जब हमने रूस के साथ कई लाख डॉलर कीमत के आयात सौदे किए हैं। अब अगर रुपया ऐसे ही थोड़ा सा और गिर गया तो भारत को इन आयात सौदों में कई हजार डॉलर का और अधिक नुकसान होगा। मौजूदा सरकार 2014 में जब सत्ता में आई थी तो यही कहकर आई थी कि उस समय यानी कांग्रेस सरकार में जो डॉलर 65 रुपये का उस समय था उसे जल्द ही घटाकर 45-40 रुपए तक कीमत पर ले आएंगे। लेकिन डॉलर की कीमत कम होना तो दूर निरंतर बढ़ती चली गई और आज 91 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गई। अब अगर हम गंभीरता से सोचें तो पिछले डेढ़ दशक में हम दुनिया के अलग-अलग देशों को जितना निर्यात कर रहे हैं उससे तीन गुणा अधिक हम अलग-अलग देशों से आयात कर रहे हैं। अब यह आयाता करने में हमें कितने लाख हजार डॉलर का नुकसान हो रहा है यह अनुमान लगाया जा सकता है। हां इतना जरूर है कि इस दौरान भारत से मीट का निर्यात काफी हद तक बढ़ा है जिससे हमें बड़ा लाभ हुआ है। शायद इसलिए ही मीट निर्यात के इस व्यवसाये में भाजपा के कई बड़े नेता भी शामिल हो गए हैं। भारत से खाड़ी के मुस्लिम देशों और यूरोप में जो मीट निर्यात हो रहा है वो हलाल मीट के नाम से हो रहा है जबकि सभी मीट फैक्ट्रियों में स्वचालित यंत्रों द्वारा प्रति 10 सैकंड प्रति पशु की स्पीड से धड़ाधड़ झटकों में पशुओं के वध हो रहे हैं जो हलाल मीट के नाम से बेचे जा रहे हैं। कुल मिलाकर मांस निर्यात व्यवसाये के अलावा अन्य सभी व्यवसायों में रुपये की निरंतर गिरती कीमत के कारण हमारे आयातकों को हजारों करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है।

