चर्चा-ए-आम

राजनेता राष्ट्र का चरित्र खत्म ना करें !

कमल सेखरी

हमारे देश के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी लोकसभा और उसके साथ ही राज्यसभा में पिछले तीन दिनों से बड़े हंगामे और शोर-शराबे के बीच कुछ ऐसे मुद्दों पर बातचीत चल रही है जो देश के आम नागरिक को ना तो समझ में आ रही है और ना ही उन मुद्दों पर चल रही बहसों का आम नागरिक से कोई सीधा लेना देना है। पहला एक दिन राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम पर छिड़ी बहस को लेकर बीत गया और दूसरा व तीसरा दिन एसआईआर या फिर यूं कहें चुनाव सुधार प्रक्रिया को लेकर हुई बहस में बीत गए। अब हम अगर बात करें राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम पर संसद के दोनों सदनों में हुई हंगामे वाली बहस को लेकर हमें क्या मिला तो शायद परिणाम यही आएगा कि प्राप्ति शून्य रही। हमारी व्यवस्था इस राष्ट्रीय गीत को गाने की अनिवार्यता बनाना चाहती है और पुरजोरता से इस प्रयास में लगी है कि यह गीत सभी शिक्षण संस्थानों में और सभी बड़े आयोजनों में अनिवार्य रूप से गाया जाए। यह राष्ट्रीय गीत जिसके अब डेढ़ सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं वो प्रारंभ से ही यानी आजादी से पहले से ही पूरा देश राष्ट्रीय गीत के तौर पर गाता आ रहा है और आजादी से पहले तो स्वतंत्रता दिलवाने वाले दीवानों में जोश भरने का काम वंदेमातरम गीत करता रहा है। तो फिर आज इसे अनिवार्य करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। पूरा देश समझ रहा है कि इसके पीछे सरकारी भावना देश में धार्मिक मतभेद को और गहरा बनाने की है। दो दिन जो बहस चुनाव सुधार प्रक्रिया के नाम पर चली उसमें विपक्ष ने वो ही सब बातें रखीं जो पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान वो जनसभाओं में वोट चोरी और चुनाव आयोग के पक्षपात रवैये को लेकर कही जाती रही हैं। चुनाव सुधार प्रक्रिया के नाम से चुनाव के दौरान अलग-अलग राज्य की सरकारों ने मतदाताओं को लुभाने के दौरान जो नकदी का वितरण किया उस पर भी खूब चर्चा हुई लेकिन चर्चाओं से जनहित का क्या निकलकर आया। ना तो जनसभाओं में लोगों ने विपक्ष की बातों को सुना और ना ही संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे को सरकार ने गंभीरता से लिया। यह जरूर है कि सदन के दोनों सदनों के माध्यम से एक बार फिर रिश्चत के तौर पर मतदाताओं को नकदी देने का मामला लोगों तक पहुंच गया लेकिन इन सदनों के माध्यम से वही पुराने विपक्ष के संदेश अगर देश की आवाम को सुनने को मिल भी गए तो भी क्या फर्क पड़ा। परिवर्तन की कोई गुंजाइश तो आज भी नजर नहीं आ रही। अब विपक्ष जितना भी शोर मचाता रहे कि हर चुनाव में वोट चोरी हो रही है, हर चुनाव में चुनाव आयोग आंख मंूदकर सरकार के साथ एक पक्ष बनकर खड़ा हो जाता है या फिर चुनावों के दौरान मतदाताओं को जो रिश्चत की नकदी दी जा रही है उस पर चुनाव आयोग कुछ नहीं कर रहा। कुल मिलाकर पिछले कुछ समय से देश का जो वातावरण पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के दौरान एक नियमित प्रक्रिया के तौर पर बनकर सामने आया है वो देश के लिए बड़े गंभीर संकेत दे रहा है, क्या हम यह मानें कि हम अपने देश के मतदाताओं को मात्र 5 किलो अनाज हर महीने देकर या फिर राज्यों के चुनावों के दौरान महिला सशक्तिकरण के नाम पर नकद राशि बांटकर और मतदाता सूची में व्यापक अनियमितताएं दर्ज करके चुनावों के मनमाने परिणाम प्राप्त कर सकते हैं तो फिर क्या हम यह चिंता प्रकट नहीं कर सकते कि हमारे राजनेता समूचे देश के आवाम का राष्ट्रीय चरित्र ही खत्म करने पर आमादा हो गए हैं। हम आने वाले समय में चुनाव में बढ़ती जा रही अनियमितताओं और अव्यवस्थाओं पर तो कभी नियंत्रण पा सकते हैं लेकिन अगर देश का राष्ट्रीय चरित्र ही खत्म हो गया और देश की जनता मात्र 5 किलो अनाज और चुनाव के दौरान नकदी की रिश्चत लेने की आदी हो गई तो देश के लिए इससे ज्यादा घातक कुछ और हो ही नहीं सकता। हम जहां एक ओर कई लाख करोड़ रुपयों का राजस्व इस तरह की रिश्वतखोरी पर बर्बाद कर देंगे तो देश एक बड़े आर्थिक संकट में पड़ जाएगा। हमारे राजनेताओं को चाहिए कि वो छलकपट और रिश्चतखोरी का गुलाम बनाकर देश के आवाम का चरित्र खत्म ना करें और चुनावों को जनहित और राष्ट्रहित के मुद्दों को ही सामने रखकर चुनाव लड़ें और जनता का विश्वास जीतें।

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