चर्चा-ए-आम

पीडीए की पाठशाला बनाम बंद होते सरकारी स्कूल !

कमल सेखरी

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने पिछले एक महीने के दौरान दस हजार 24 बच्चों के माध्यमिक शिक्षा के स्कूल बंद कर दिए। बंद किए इन स्कूलों को ऐसे स्कूलों के साथ मर्ज कर दिया जिनकी संख्या 50 से अधिक है भले ही वो बंद किए गए स्कूल से दो या तीन किलोमीटर दूर हों। जबकि सरकारी नियमों के अनुसार स्कूली बच्चों के माध्यमिक स्कूलों के बीच एक किलोमीटर से अधिक की दूरी नहीं होनी चाहिए। बंद वही स्कूल किए गए हैं जिनमें विद्यार्थियों की संख्या 50 से कम है। एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में 48 करोड़ 84 हजार के करीब स्कूली बच्चों की संख्या है जिनमें से लगभग 15 करोड़ बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं जबकि बकाया लगभग 34 करोड़ बच्चे देश के निजी क्षेत्र वाले अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। बताया जाता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के लिए लगभग 11 लाख सरकारी स्कूल संचालित हैं जिनमें से लगभग डेढ़ लाख स्कूलों में अभी तक बिजली की व्यवस्था भी नहीं हुई है। इनमें से 40 हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं जिनमें छात्राओं के लिए भी शौचालय की व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है। पिछले लगभग 5 सालों में 56 हजार के करीब सरकारी स्कूल पूरे देश में बंद किए गए हैं जिनमें से 25 हजार सिर्फ उत्तर प्रदेश के माध्यमिक स्कूल हैं। पिछले तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नौ प्रतिशत की कटौती हुई है जबकि निजी क्षेत्र के स्कूलों की संख्या में 14 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। एक अन्य सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के किसी भी सरकारी स्कूल में किसी एक राजनीतिक व्यक्ति का बच्चा पढ़ने नहीं जाता। इन राजनेताओं के सभी बच्चे स्कूली शिक्षा तो निजी क्षेत्र के अंग्रेजी स्कूलों में प्राप्त कर रहे हैं जबकि स्नातक और तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने विदेशी स्कूलों में या फिर विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसी तरह प्रशासनिक अधिकारियों के बच्चे भी स्कूली शिक्षा को निजी क्षेत्र के स्कूलों में ले रहे हैं और आगे की शिक्षा के लिए विदेशों में जा रहे हैं। राजनीति में चाहे कोई छोटे स्तर का नेता हो या फिर प्रशासनिक क्षेत्र में कोई छोटे पद पर कार्यरत कर्मचारी हो सभी के बच्चे निजी स्कूलों में ही पढ़ रहे हैं। शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी माध्यमिक स्कूलों में जो बच्चे पढ़ रहे हैं उनमें से 80 फीसदी मजदूरों के बच्चे हैं जिनकी मासिक आय 5 या छह हजार रुपए प्रति माह से अधिक नहीं है। ऐसे में देश में शिक्षा के समान स्तर की कल्पना हम कर भी कैसे सकते हैं। जो शिक्षा प्रणाली चल रही है उसमें मजदूर का बच्चा मजदूर बना रहता है और प्रशासनिक अधिकारियों, व्यवसाइयों तथा राजनेताओं के बच्चे निकलकर आगे आ जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश अपनी सेवाएं देश को ना देकर ऐसे विदेशी मुल्कों में दे रहे हैं जहां डॉलर में कमाई होती है और वो बच्चे डॉलर में कमाकर अपनी एक अलग दुनिया बना लेते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पिछले दो सालों में ही दस लाख से अधिक भारतीयों ने अपने भारत का पासपोर्ट खारिज कराकर वापस जमा करा दिया है और अब वो विदेशी नागरिकता लेकर रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में सरकारी माध्यमिक स्कूलों के बंद होने पर समाजवादी पार्टी ने अपना एक नया रास्ता निकाल लिया। इसके मुख्यिा अखिलेश यादव ने प्रदेश के कई शहरों और गांवों में पीडीए की पाठशाला नाम से छोटे- छोटे स्कूल खोलकर वहां बंद हुए सरकारी स्कूलों के बच्चों को अपने हिसाब से पढ़ाना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने समाजवादी पार्टी के तीन नेताओं पर एफआईआर दर्ज कर बच्चों को गलत शिक्षा देने के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी अपने स्वार्थ के हिसाब से अपनी पार्टी का एजेंडा पढ़ाई के नाम से बच्चों में चला रही है जो आने वाले वक्त में घातक सिद्ध होगा वहीं समाजवादियों का कहना है कि सरकार जहां कुछ नहीं कर रही वहां हम कुछ तो कर रहे हैं। बंद स्कूलों की जगह बच्चों को एकत्र कर बैठाकर शिक्षा दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश में शिक्षा प्रणाली पर हो रहे इस राजनीतिक कुठाराघात से स्कूली बच्चों का तो नुकसान हो ही रहा है प्रदेश का वातावरण भी खराब हो रहा है।

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