अभी भी कूदफांद में लगे हैं पापा ट्रंप

- ट्रंप क्यों कराना चाहते हैं भारत-पाक की दोस्ती
- ट्रंप की भारत-पाक में इतनी निजी रुचि क्यों ?
- हम इतिहास से सीखें अमेरिका का वजूद क्या है?
कमल सेखरी
समूचे विश्व की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सबसे बड़े जोकर के रूप में अपनी पहचान बनाकर इसी नाम से कहलाए जाने वाले पापा ट्रंप अभी भी बेमतलब की कूदफांद से बाज नहीं आ रहे। वो जंगल बुक के बाल हीरो मोगली की तरह डाल-डाल कूदकर नए-नए पैंतरे फेंक रहे हैं। अभी तक तो वो यही राग अलापते रहे कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़े छदम युद्ध में अपने हस्तक्षेप से युद्ध विराम करा दिया। पाकिस्तान के सियासी नेता ट्रंप को इसका पूरा क्रेडिट देते हुए कई बार उनका शुक्रिया भी अदा कर चुके हैं क्योंकि पाकिस्तान के पास इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं था कि भारत के साथ उसका आपरेशन सिंदूर जो युद्ध में परिवर्तित हो रहा था वो जल्द ही रुक जाए क्योंकि पाकिस्तान की हिम्मत, हौसले और क्षमता भारत से युद्ध करने की ना तो पहले कभी रह पाई और ना ही अब उसके पास वो क्षमता बाकी रही। लेकिन भारत ने अचानक सीज फायर की घोषणा तो कर दी लेकिन यही बताया कि यह घोषणा पाकिस्तान फौज की गुहार पर ही की गई है। पापा ट्रंप जो दुनिया को अपनी पीठ थपथपाकर इस युद्ध विराम की मध्यस्थता का श्रेय ले रहे थे हमने ना तो सार्वजनिक रूप से उनकी उस बात को माना और ना ही ट्रंप के उस बयान का खंडन किया। ट्रंप यहीं तक नहीं रुके उन्होंने यह तक कह दिया कि अगर दोनों देश उनकी बात मानकर युद्ध विराम नहीं करते तो वो उनके साथ अमेरिका का व्यापार पूरी तरह से बंद कर देते। भारत अमेरिका को हर साल अस्सी अरब डालर का निर्यात करता है। विपक्षी दलों का कहना है कि ट्रंप की इस धमकी के दबाव में भारत ने छदम युद्ध में अपनी स्थिति काफी मजबूत होते हुए भी यकायक युद्ध विराम की घोषणा कर दी। पापा ट्रंप यहां तक भी नहीं रुके और उन्होंने दोनों देशों को अपनी बात मानने के लिए दोनों को ही महान देश करार देते हुए दोनों के प्रधानमंत्रियों को अपने निवास पर दोस्ती प्रगाढ़ करने की नजर से रात्री भोज पर भी आमंत्रित कर लिया। अब ट्रंप कौन होते हैं दोनों मुल्कों को भोज पर बुलाकर उनकी दोस्ती प्रगाढ़ कराने वाले। दोनों देशों को महान देश बताने का कौन सा मापदंड ट्रंप ने अपनाया है। जबकि भारत आतंक पीड़ित देश है और पाकिस्तान आतंकियों की शरण स्थली है। भारत आतंकियों को खत्म करना चाहता है और पाकिस्तान पिछले कई दशकों से आतंकवाद का पालन पोषण कर रहा है। ट्रंप के इस नजरिये पर हमें सरकारी तौर पर खंडन करते हुए खेद प्रकट करना चाहिए जो कि हम नहीं कर रहे हैं। ट्रंप की एक और कलाकारी भारत को पीड़ा पहुंचा रही है कि वो हमारी कश्मीर की समस्या को अपनी मध्यस्थता से हल करने के जबरन इच्छुक बन रहे हैं। वो दुनिया को बता रहे हैं कि सात दशक से अधिक भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही काश्मीर और पीओके की समस्या को वो अपने माध्यम से हल करा सकते हैं। भारत में अभी तक ट्रंप के इन सभी बेतुके बयानों में से किसी एक बयान का ना तो खंडन किया है और ना ही उन पर खेद प्रकट किया है। जबकि भारत के इतिहास में ये अंकित है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को लेकर उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपने सभी घोड़े खोल दिये और पूरी ताकत लगाकर उस समय की प्रधानमंत्री इन्दिरागांधी को तुरंत पाकिस्तान के साथ युद्ध समाप्त कर सीज फायर करने पर अपना पूरा जोर लगा दिया लेकिन इन्दिरागांधी टस से मस नहीं हुई और दो टूक जवाब दिया कि अमेरिका भारत के इस अंदरुनी मामले में हस्तक्षेप ना करे और धमकी देने की बजाए जो करना चाहे सो करे। 1971 के उस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को दो फाड़ करके बांग्लादेश को अलग राष्टÑ बना दिया। इस युद्ध में पाकिस्तान के 90 हजार सशस्त्र सैनिकों ने भारतीय सेना के आगे शस्त्र डालकर आत्मसमर्पण किया जो अब तक विश्व में एक रिकार्ड की तरह माना जाता है। हमें भी आज उन्हीं नीतियों पर चलते हुए अमेरिका को दो टूक कह देना चाहिए कि वो हमारे अंदरुनी मामलों में हस्तक्षेप ना करे और हमें बिना किसी देश के दबाव में आए वो करना चाहिए जो देश की जनता चाहती है और जो देश की हमारी तीनों फौजों के सेनापतियों को मंजूर है। अभी भी समय है हमें अपने किसी भी छोटे बड़े आर्थिक नुकसान पर विचार किये बिना पापा ट्रंप को दो टूक कह देना चाहिए कि तुम दुनिया के और छोटे देशों के लिए कथित पापा ट्रंप हो सकते हो, भारत जैसे विशाल विकसित राष्ट्र पर तुम किसी भी तरह का कोई गैर वाजिब दबाव नहीं डाल सकते।



