हे राम! इन सिरफिरों को सदबुद्धि दो

कमल सेखरी
हम चाहे कितनी भी प्रार्थनाएं कर लें, चाहे लाख दुआएं मांगे कि आने वाला 2026 हमारे देश भारत को उस सियासी शिकंजे के दलदल से बाहर निकाल दे लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। हमारी प्रार्थनाएं, हमारी दुआएं, सियासी ताकतों के आगे बौनी पड़ ही जाती हैं। पश्चिम बंगाल में जल्द होने जा रहे चुनाव में देश का चुनाव आयुक्त बड़े स्तर पर अनियमितताएं बरत रहा है, यह आरोप वहां सत्ता में बैठी ममता सरकार के नेता पिछले कई दिनों से लगातार लगाते चले आ रहे हैं। वर्ष 2025 के अंतिम दिन टीएमसी का एक दस सदसीय प्रतिनिधि मंडल दिल्ली आकर मुख्य चुनाव आयुक्त से मिला और उसने अपनी 11 सूत्रीय समस्याओं का एक ज्ञापन बनाकर चुनाव आयोग को सौंपा और उन सभी बिन्दुआें पर चुनाव आयोग के साथ खुलकर बातचीत करनी चाही। हालांकि यह बातचीत ढाई घंटे तक चली लेकिन कोई निष्कर्ष ऐसा निकलकर नहीं आया जिससे शिकायतकर्ता टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल संतुष्ट हो पाता। टीएमसी के राष्टÑीय महासचिव सांसद अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयुक्त कार्यालय के बाहर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि आयुक्त ने हमारी किसी एक बात का भी जवाब नहीं दिया। सांसद बनर्जी का यह भी कहना था कि डेढ़ माह पहले हमारा एक प्रतिनिधिमंडल पश्चिम बंगाल की चुनावी समस्याओं को लेकर चुनाव आयुक्त से मिला था लेकिन हमारी उन पांच समस्याओं पर आज तक भी आयुक्त कोई जवाब नहीं दे पाये। टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी का आरोप है कि पहले घोषित सूची में 58 लाख वोट काटे गए और अब एआई साफ्टवेयर की मदद से उस सूची में से भी 54 लाख वोट गायब कर दिए गए। ऐसा ही कुछ आरोप अब इंडिया गठबंधन के नेता बिहार में हो चुके चुनावों को लेकर भी लगा रहे हैं उनका कहना है कि बिहार चुनाव में घोषित सूची में से 14 लाख वोट ‘डी-डुप्लीकेटर’ साफ्टवेयर इस्तेमाल करके बड़ी खामोशी से अलग कर दिए गए और उसका संपूर्ण विवरण चुनाव आयुक्त ने सत्ता दल के नेताओं को सौंप दिया ताकि उसके आधार पर फर्जी डुप्लीकेट मतदान किया जा सके। उत्तर प्रदेश में विपक्ष के नेता सपा मुखिया अखिलेश यादव जो अब तक यह बताकर खुश हो रहे थे कि पहले की मतदाता सूची से जो तीन करोड़ मतदाता काटे गए हैं उनमें अधिकांश भाजपा के हैं। लेकिन अब जब अंतिम सूची के प्रकाशन की तिथि 31 दिसंबर से बढ़ाकर छह जनवरी कर दी गई तो विपक्ष ने यह कहना शुरू कर दिया कि अब दाल में कुछ काला नजर आ रहा है। क्योंकि अंतिम सूची की घोषणा जो पहले 16 दिसंबर को होनी थी उसे बढ़ाकर 26 दिसंबर किया गया और फिर प्रकाशन की तिथि 31 दिसंबर से बढ़ाकर 6 जनवरी की गई तो इससे लगता है कि इतनी बार तिथियों में बदलाव करने के पीछे चुनाव आयोग की कोई बड़ी मंशा है और यूपी की सूची में कोई बड़ा खेल खेला जा सकता है। कुल मिलाकर नववर्ष 2026 किसी भी मायने में सियासी नजर से जो प्रारंभिक पकड़ बना रहा है उसे देखकर तो लगता है कि पश्विम बंगाल का चुनाव जो आगामी मार्च में होना है और उत्तर प्रदेश का चुनाव जो 2027 के प्रारंभ में होना है वो देश को कई तरह की पीड़ा और दर्द देने जा रहा है जिसके प्रारंभिक संकेत हमें एनसीआर के कई शहरों में व गाजियाबाद में हुए उस सियासी प्रयासों से मिल गए हैं जिसमें हिन्दू संगठनों का नाम लेकर कुछ लोगों ने बड़ी संख्या में घर-घर जाकर तलवारें और फरसे बांटे हैं यह कहकर कि इन्हें अपने पास रखिए ये जल्द ही आपकी रक्षा में काम आएंगे। हम और आप यानी देश का आम आदमी इन परिस्थितियों में भी प्रार्थनाएं और दुआएं मांगने के सिवाए कर भी क्या सकता है कि हे राम इन कुछ सिरफिरों को सदबुद्धि दें और हमारे देश का आपसी सौहार्द, भाईचारा और अमन बना रहे।

