अब घुसपैठिये नहीं तय करेंगे पीएम और सीएम !

कमल सेखरी
भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार की शाम लोकसभा के शीतकालीन सत्र में बड़े ही खुले शब्दों में एक चुनौती के तौर पर चेतावनी भरे लहजे में यह बयान दिया कि अब घुसपैठिये देश का प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री तय नहीं करेंगे। श्री शाह ने लोकसभा में दो दिन चली चुनाव सुधार प्रक्रिया की बहस में अंतिम वक्ता के रूप में बोलते हुए यह हुंकार भरी। अमित शाह की इस हुंकार वाले बयान का अर्थ देश के सियासी हलकों में और सियासत में रूचि रखने वाले विशेषज्ञों में चर्चा का विषय बनी हुई है। बड़ा सवाल यह है कि अब ये घुसपैठिये कौन हैं और कितनी बड़ी संख्या में हैं जो ऐसी स्थिति में हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री को अपने दम पर बना सकें और विभिन्न राज्यों में भी मुख्यमंत्रियों को अपनी ताकत पर चुन सकें। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के बीच पिछले कुछ महीनों से घुसपैठिये नाम का यह शब्द रह रहकर जनसभाओं और अन्य सार्वजनिक बयानों में लिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि घुसपैठिये नाम का यह शब्द सत्ताधारियों का सबसे प्रिय शब्द बन गया है और उनके माध्यम से रह रहकर देश में गूंज रहा है। अभी तक महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में एनडीए के सभी नेताओं ने घुसपैठिये नाम का यह शब्द कई बार सार्वजनिक किया। बिहार का अभी हाल ही का चुनाव तो लड़ा ही घुसपैठियों के नाम से गया। बिहार में एसआईआर अचानक एक महीने के अंदर कराने का चुनाव आयोग का फैसला भी यही कहकर लिया गया कि घुसपैठिये वहां बड़ी संख्या में हैं और जो भारत का नागरिक नहीं है उसे हम मतदाता सूची से बाहर करेंगे वो मतदान में भाग नहीं लेगा। बिहार का चुनाव पूरा हुआ लगभग 80 लाख वोट जो पुरानी सूची में दर्ज थे उन्हें एसआईआर प्रक्रिया में निकालकर बाहर किया गया। लेकिन आज तक भी चुनाव आयोग यह नहीं बता पाया कि वोट कटौती की उस बड़ी सूची में बांग्लादेश के घुसपैठियों की संख्या क्या है। क्योंकि पिछले तीन सालों में हमारी सरकार पूरे देश में मिलाकर एक हजार से अधिक बांग्लादेशियों को चिन्हित नहीं कर पाई है। इसी तरह महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी अभी तक किसी एक बांग्लादेशी घुसपैठिये का नाम चुनाव आयोग ने अधिकृत रूप से सार्वजनिक नहीं किया है। अब पश्चिम बंगाल जहां चुनाव तीन महीने बाद है वहां भी घुसपैठिये शब्द का पुरजोरता से इस्तेमाल किया जा रहा है, यह आरोप लगाकर कि टीएमसी की ममता सरकार बनी ही इन घुसपैठियों की मदद से है। 11 दिसंबर को पश्चिमी बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। लोगों को इंतजार है कि कितने घुसपैठियों के नाम यहां मतदाता सूची में सामने आते हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश जहां चुनाव अभी और डेढ़ साल बाद हैं वहां भी केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर घुसपैठियों की बड़ी संख्या होने की आशंका व्यक्त कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में तो दो कदम और आगे निकलकर इन घुसपैठियों के लिए हर मंडल स्तर पर कुल मिलाकर 17 शेल्टर होम की व्यवस्था तैयार कर ली गई है। यहां भी एसआईआर की प्रक्रिया 11 दिसंबर को पूरी हो गई है और उम्मीद की जा रही है कि शायद यह तारीख कुछ और आगे बढ़ा दी जाए। लेकिन जब भी मतदाताओं की सूची उत्तर प्रदेश में सामने आएगी तो उसमें कितने घुसपैठियों के नाम उजागर होंगे इसका भी इंतजार सभी को है। जैसा केन्द्र व राज्य सरकार दावा कर रही हैं कि घुसपैठिये बड़ी संख्या में है तो यह भी देखना होगा कि एसआईआर की अंतिम मतदाता सूची में कितने घुसपैठिये सामने आते हैं और उनमें से कितनों को पकड़कर इन 17 शेल्टर होम्स में भेजा जाता है। घुसपैठियों के नाम से शेल्टर होम्स में भेजे जाने वाले लोगों को चिन्हित करने में अगर ईमानदारी ना बरती गई तो यह एक गंभीर मामला बन जाएगा और इससे पूरे सूबे की फिजा खराब होगी क्योंकि घुसपैठियों के नाम से सिर्फ मर्दों को ही शेल्टर होम्स नहीं पहुंचाया जाएगा उनके साथ उनकी पत्नी या अन्य परिजन भी होंगे जिन्हें अलग-अलग स्थानों पर रखा जाएगा और अगर इसमें प्रशासनिक स्तर पर गलती से भी कोई चूक हो गई तो प्रदेश का माहौल ही बिगड़ जाएगा। अत: केन्द्र और राज्य सरकारों को इस मामले में बड़ी ही सावधानी से फूंक-फूंककर कदम रखना चाहिए। गृहमंत्री का लोकसभा में दिया गया बयान यह गंभीर स्थिति भी पैदा करता है कि अब तक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री घुसपैठिये बना रहे थे और अब वो ऐसा नहीं कर पाएंगे। गृहमंत्री का लोकसभा के पटल पर बार-बार यह कहना कि उनकी सरकार तीन अहम बिन्दुओं पर काम कर रही है जिसे वो डिटेक्ट, डिलीट और डी-पोर्ट जैसे शब्दों से वर्णित कर रहे थे जिसका अर्थ मौजूदा स्थिति में गंभीर माना जा रहा है।

