
- क्या बिहार में होगा महाराष्ट्र जैसा खेला
- सुलग रही धीमी आंच बदल सकती है लपटों में
- भाजपा नेता बिहार में चाहते हैं अपनी स्वतंत्र सरकार
कमल सेखरी
बिहार में विधानसभा चुनाव होने में भले ही ग्यारह महीने का समय अभी बाकी है लेकिन वहां धीमी आंच पर बीरबल की खिचड़ी पकनी शुरू हो गई है। पूरे देश की नजर उत्तर प्रदेश की मजहबी कुश्ती पर चल रही सियासत पर लगी है और दिल्ली में प्रदेश चुनाव की घोषणा से पहले पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जो धुआंधार गेंदबाजी हो रही है मीडिया की नजर वहां पर टिकी हुई है। लेकिन इस बीच बिहार में क्या खेल खेला जा रहा है उस पर ना तो मीडिया गंभीरता से देख रहा है और ना ही देश के राजनीतिक गलियारों में उसकी चर्चा हो रही है। लेकिन बिहार का ये सियासी खेल धीमी आंच पर पक रही खिचड़ी की तरह रह रहकर सुलगता नजर आ रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिला सम्मान यात्रा निकालने की योजना बनाई और इसकी घोषणा भी हो गई लेकिन देश की आधी आबादी महिलाओं के नाम से जो भी सियासी खेल अब तक कहीं भी खेला गया उसकी शत प्रतिशत सफलता की गारंटी पर नजर रखते हुए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नीतीश कुमार की इस महिला यात्रा से विचलति हो गया और कह सुनकर महिला सम्मान यात्रा की जगह प्रगति यात्रा निकालने की बात तय हो गई। प्रगति यात्रा अभी पूरी तरह से सड़क पर आ ही नहीं थी कि जेडीयू और भाजपा के बीच मनमुटाव सा नजर आने लगा। नीतीश कुमार के समर्थक इस यात्रा को नीतीश कुमार के पोस्टरों को लेकर यह कहते हुए निकले कि इस बार फिर बिहार में नीतीश कुमार। इन पोस्टरों पर भी आपत्ति लगाई गई और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने यह कहकर इसमें बाधा डाली कि बिहार के चुनाव एनडीए के नेतृत्व में होंगे किसी व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में नहीं होंगे। अभी 25 दिसंबर को ही बिहार में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन मनाने पर एक बड़ा आयोजन हुआ जिसमें महात्मा गांधी के प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम के एक गायिका द्वारा गाये जाने पर उस समय बीच में रोक दिया जिसमें गाया जा रहा था ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान। इस भजन को लेकर बहुत देर तक हंगामा होता रहा और यह शोर गायिका द्वारा माफी मांगने पर ही शांत हो पाया। लेकिन इस कार्यक्रम में बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने खुलेआम मंच से कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी जी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम बिहार में बिना किसी सहयोग के भाजपा की सरकार बना पाएंगे। इससे पहले केन्द्रीय मंत्री अश्वनी चौबे भी खुलकर कह चुके हैं कि बिहार का चुनाव किसी व्यक्ति विशेष के चेहरे पर नहीं बल्कि एनडीए के नाम से लड़ा जाएगा। इस तरह की और भी कई सारी बातें रह रहकर भाजपा के नेता बिहार में सार्वजनिक रूप से बोलते नजर आ रहे हैं। इन सब बातों से क्षुब्ध हो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीते दिन दिल्ली आए और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह के परिवार से मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने गए लेकिन काफी प्रतीक्षा करने पर भी प्रधानमंत्री ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। इसके बाद नीतीश कुमार अपनी पीड़ा को लेकर भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने पहुंचे तो वहां भी भाजपा अध्यक्ष ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। नीतीश कुमार को अपनी इन दोनों सियासी मुलाकातों के बाद दिल्ली में ही रुकना था लेकिन मुलाकातों में सफलता ना मिलने पर वो शाम को ही बिहार वापस लौट गए। अब जेडीयू और भाजपा के बीच बिहार के विधानसभा चुनावों को लेकर क्या खिचड़ी पक रही है उसका अंदाजा अब राजनीतिक गलियारों में इस सुगबुगाहट के साथ शुरू हो गया है कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है। अब संबंध सामान्य नहीं रहे। वहीं दूसरी ओर मीडिया के कुछ लोगों ने राजद के बड़े नेता तेजस्वी यादव से पूछना शुरू कर दिया कि आवश्यकता पड़ने पर उनके दरवाजे नीतीश कुमार के लिए क्या खुले होंगे। हालांकि तेजस्वी यादव ने कहा तो यही है कि हमें अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारने का शौक नहीं है लेकिन राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा है कि राजनीति में ना कोई किसी का दोस्त है और ना दुश्मन, आवश्यकता पड़ने पर कुछ भी फैसला लिया जा सकता है, लिहाजा इतना कुछ होने पर ये प्रारंभिक सुगबुगाहट जो अभी तो धीमी आंच सी नजर आ रही है, कभी भी तेज लपटों में बदल सकती है। कुल मिलाकर संकेत यही आ रहे हैं कि बिहार में सबकुछ सामान्य नहीं है। भाजपा समय आने पर कोई बड़ा खेला कर सकती है। नीतीश कुमार भले ही राजनीति के बहुत बड़े खिलाड़ी नजर आ रहे हों, समय आने पर उनका भी वही हाल हो सकता है जो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का हुआ है या फिर उससे भी कहीं बुरा हो सकता है।



