चर्चा-ए-आमस्लाइडर

कल संसद में लिखा जाएगा नया इतिहास !

New history will be written in Parliament tomorrow!

कमल सेखरी
भारत के सियासी इतिहास में हो सकता है कल एक और नया पृष्ठ जुड़ जाए। फैसला जो भी रहे लेकिन इतिहास में यह एक नए अध्याय के रूप में अंकित होगा, इसमें दोराय नहीं देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के दरबार में कल मुस्लिम वक्फ बोर्ड कानून में सरकार ने जो संशोधन किये हैं उन संशोधनों के साथ नया बिल संसद में रखा जाना है। सत्ता दल पुरजोरता से इस प्रयास में जुटा है कि वो इस बिल को पास कराकर ले जाए वहीं विपक्ष संख्या बल कम होने पर भी इस कोशिश में है कि यह संशोधित बिल किसी भी तरह संसद में पारित ना हो पाए। इस बिल के पारित होने और ना होने में तीन राजनीतिक दलों की विशेष भूमिका है और ये तीनों दल भाजपा के साथ एनडीए के सहयोगी दल हैं। अब इस बिल को पास कराकर ले जाने में जितनी बड़ी परीक्षा भाजपा की है उससे कहीं बड़ी परीक्षा नीतीश कुमार,चन्द्रबाबू नायडू, चिराग पासवान की मिलाकर है। ये तीनों नेता एनडीए के साथ रहते हुए भले ही भाजपा के सहयोगी हैं लेकिन फिर भी इनकी पुरानी धर्मनिरपेक्ष की छवि आज भी मुस्लिम मतदाताओं में पहले जैसी ना भी हो तो भी काफी मजबूती से बरकरार है। अब ये तीनों नेता भाजपा के साथ अपना एनडीए का धर्म निभाते हैं या फिर अपने-अपने राजनीतिक लाभों के चलते अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को गहरी चोट पहुंचाते हैं। लेकिन इसके बीच का भी एक रास्ता है जिसे ये तीनों चतुर नेता बड़ी चतुराई से खेल सकते हैं। भाजपा जब यह बिल सदन में रखे तो ये तीनों पार्टियां उसमें भाग ना लें और सदन से गैरहाजिर हो जाएं, ऐसे में ना तो बिल का समर्थन होगा और अप्रत्यक्ष रूप से बिल पास कराने में ये भाजपा को सहयोग कर देंगे। क्योंकि इनके गैर हाजिर होते ही सदन की उपस्थिति की संख्या इतनी कम रह जाएगी कि जिसके 50 प्रतिशत की संख्या पूरी होते ही जो लगभग 258 सदस्यों की बैठती है वो पूरी हो जाएगी और भाजपा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगी। मुस्लिम वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन करने से देश का मुसलमान खफा है और जितने मुस्लिम संगठन मुसलमानों के लिए काम कर रहे हैं उनका कहना है कि सरकार इस बिल में संशोधन लाते ही वक्फ बोर्ड की जमीनों को एकतरफा अधिकार के साथ हथिया लेगी और उसे अपने पूजींपति मित्रों और बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को दे देगी। ये ही आरोप लगभग तीन साल पहले तीन कृषि बिलों को लाए जाने पर देश के किसानों ने लगाया था। उस समय देशभर के किसान उन तीन कृषि बिलों को काला बिल बताकर उनके विरोध में सड़कों पर उतर आए और उन्होंने दिल्ली, गाजियाबाद बार्डर के साथ-साथ अन्य कई स्थानों पर भी धरने दिये। उस समय भी किसानों को यही आरोप था कि सरकार छोटे गरीब किसानों की जमीनें ये बिल लाकर हड़पना चाहती है और उसे अपने मित्रों और देश के बड़ी पूंजीपतियों को देना चाहती है। एक साल से अधिक समय तक चले किसानों के आंदोलन के दौरान 750 किसानों की गर्मी की लू लगने और सर्दी की ठंड लगने से मौत हो गई। सरकार तब झुकी जब उस दौरान उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव एकदम निकट आ गए और किसानों ने अपने-अपने गांवों में भाजपा के नेताओं को प्रवेश ही नहीं करने दिया तब सरकार ने अपनी गलती मानते हुए वो कृषि बिल वापस लिये लेकिन वापस लेते समय जो वायदे किये उन्हें अभी तक नहीं निभाया। किसानों की भारी संख्या को देखते हुए और अधिकांश विपक्षी दलों का समर्थन किसानों को मिलने की वजह से सरकार के हौसले टूटे और सरकार ने वो कृषि बिल वापस लिया लेकिन वक्फ बोर्ड कानून में परिवर्तन के मामले में अगर मुस्लिम मिलकर भी विरोध पर उतर आएं तो सरकार को इसकी चिंता नहीं है। केन्द्र सरकार को फिलहाल चिंता अपने उन तीन सहयोगी दलों की है जिनके समर्थन से वो केन्द्र सरकार में बनी हुई और उनके समर्थन वापस लेते ही वो केन्द्र की सत्ता से बाहर हो सकती है। वक्फ बोर्ड कानून के बदले जाने पर विपक्षी दल कितना भी चिल्लाते रहें सरकार को उसकी लेशमात्र भी परवाह नहीं क्योंकि उनका मुस्लिम समुदाय के प्रति समर्थन देना तो केन्द्र सरकार की नीतियों के माफिक आता है। अब कल संसद में क्या होता है मुस्लिम वक्फ बोर्ड कानून का यह नया बिल पारित होता है या गिर जाता है यह तो कल ही पता चलेगा लेकिन यह तय है कि कल लोकसभा में जो कुछ भी होगा वो आने वाले इतिहास का एक नया अध्याय बनेगा। अब वो अध्याय सफेद होगा या काला यह तो समय ही बताएगा।

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