चर्चा-ए-आम

प्रभु श्रीराम और महात्मा गांधी जी

कमल सेखरी

तृणमूल कांग्रेस के सभी सांसदों और उनका साथ दे रहे कुछ विपक्षी सांसदों ने 19 दिसंबर की रात कड़कड़ाती ठंड के बीच खुले आसमान के नीचे संसद परिसर के मकर द्वार पर धरना देकर बिताई। टीएमसी के ये सांसद अपने हाईकमान के निर्देशों पर दोनों सदनों में पास हुए उस बिल के खिलाफ धरना दे रहे थे जिसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से पिछले बीस वर्षों से चलाई जा रही ग्रामीण मजदूरों की रोजगार गारंटी योजना जिसे देश मनरेगा के नाम से जानता है उसका नाम बदलकर केन्द्र सरकार द्वारा जी राम जी रख दिया गया। यह बिल लोकसभा में रात लगभग डेढ़ बजे पारित हुआ और अगले दिन राज्यसभा में 12 बजे के बाद सरकार ने इसे पारित करा लिया। अब तक चल रही मनरेगा योजना और अब उसे बदलकर चलाई जा रही जी राम जी योजना में क्या अंतर है यह तो एक गहन अध्ययन का विषय है। विपक्ष का आरोप है कि मनरेगा योजना में पहले ग्रामीण मजदूरों को 100 दिन काम की गारंटी सरकार द्वारा दी जाती थी लेकिन काम राज्य सरकारों की संस्तुति पर कराया जाता था। जिसमें नब्बे फीसदी भुगतान केन्द्र करता था और 10 फीसदी का भुगतान राज्य को करना पड़ता था। अब नाम बदलकर शुरू की जा रही इस योजना में 100 दिन के स्थान पर 125 दिन काम की गारंटी दिये जाने का प्रावधान है लेकिन इसके भुगतान में अब केन्द्र 90 प्रतिशत के स्थान पर केवल 60 प्रतिशत भुगतान अपने पास से करेगा और राज्यों को 40 फीसदी का भुगतान करना होगा जो पहले मात्र 10 फीसदी था। लेकिन इस नई योजना में यह नियम बना दिया गया कि अब काम का आवंटन राज्य सरकारों की संस्तुति पर नहीं किया जाएगा बल्कि किस राज्य में क्या काम कराना है यह फैसला केन्द्र सरकार का रहेगा। विपक्ष का आरोप है कि पहले राज्य सरकारें अधिकतर फसल बुआई और कटाई के अलावा सड़कों के निर्माण और अन्य जनहित के कार्यों के लिए ही संस्तुति करती थीं लेकिन अब दिल्ली में बैठा एक बाबू यह फैसला करेगा कि विभिन्न राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में कहां-कहां काम आवंटित किया जाए। विपक्ष का यह भी आरोप है कि इस नई योजना के तहत कोल्ड स्टोरेज और वेयर हाउस में मजदूरी करने के कामों को भी शामिल कर लिया गया है और यह सभी को मालूम है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में वेयर हाउस और कोल्ड स्टोरेज के निर्माण कारपोरेट कंपनियां करा चुकी हैं और अब इन मजदूरों को सरकारी खर्चे पर उन निजी क्षेत्रों के कामों में इस्तेमाल किया जाएगा। लोकसभा और राज्यसभा के दोनों सदनों में 12-12 घंटे बहस होने के दौरान पक्ष-विपक्ष से जो आधार और कारण निकलकर सामने आए उस पर भी चिंतनशील लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। परंतु जो सबसे पीड़ादायक और हृदय विदारक परिस्थितियां इस योजना के नामों के परिवर्तन में और दोनों सदनों में चली लंबी-लंबी बहसों के दौरान निकलकर देश के सामने आई उन आधारों को सुनकर निसंदेह समूचा देश आज दुखी है। हमने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को योजना से निकालकर बाहर कर दिया वो एक अलग बात है लेकिन हमने किस तरह प्रभु राम के नाम को एक सियासी तरीके से बदलकर उसे जबरन जी राम जी बनाने की कोशिश की वो पीड़ादायक है। वर्तमान परिस्थितियों में निरंतर गिरते सियासी आचरण के बीच हमारे इन राजनेताओं ने अपने सियासी स्वार्थों के चलते गरिमा के सभी मापदंडों को तोड़ते हुए प्रभु श्री राम और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बीच जो एक नई सियासी जंग छेड़ने की कोशिश की है वो पूरे राष्ट्र को पीड़ा पहुंचा रही है। हमें ऐसे उन्मादी राजनेताओं के मंसूबों को सफल नहीं होने देना चाहिए।

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