75 वर्ष के होते ही सियासत छोड़ें नेता: भागवत

- क्या भाजपा-आरएसएस के संबंध फिर हो रहे तल्ख
- तीखे हुए गडकरी के भी सुर
- विपक्षी नेताओं को मिल रही है संजीवनी
कमल सेखरी
आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने बीते दिन सियासी नेताओं की आयु सीमा 75 वर्ष तय करने के सार्वजनिक बयान में देश के सियासी हलके में हलचल मचा दी है। श्री भागवत ने यह बयान उस समय दिया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अगले दो महीने बाद 75 वर्ष के होने जा रहे हैं। भाजपा ने अपनी कार्यकारिणी में वर्ष 1914 में ही यह तय कर दिया था कि सक्रिय राजनीति की आयु सीमा 75 साल होगी और जो सियासी नेता 75 साल के हो जाएंगे वो चुनाव नहीं लड़ेंगे और सक्रिय सियासत से अलग होकर पार्टी के मार्गदर्शक बन जाएंगे। अपने इस फैसले के तहत भाजपा ने पार्टी के वरिष्ठतम नेता लाल कृष्ण आडवाणी जो प्रधानमंत्री श्री मोदी के राजनीतिक गुरु भी माने जाते हैं सबसे पहले उन्हें सक्रिय राजनीति से अलग किया और उन्हें वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी नहीं दिया। उनके साथ-साथ तीन अन्य वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और सुमित्रा महाजन को भी चुनावी मैदान से अलग कर दिया। इसी के साथ-साथ नजमा हेपतुल्ला और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल से भी मंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर इसलिए अलग किया गया क्योंकि उनकी आयु 75 वर्ष की हो गई थी। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगामी 14 सितंबर को 75 वर्ष की आयु पूरा करने जा रहे हैं तो ऐसे में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का सार्वजनिक बयान आना कि राजनेताओं की अधिकतम आयु 75 वर्ष की ही रखी जानी चाहिए और 75 वर्ष पूरा होने पर उन्हें स्वत: ही सक्रिय राजनीति से इस्तीफा दे देना चाहिए। मोहन भागवत के इस बयान में बहुत कुछ छुपा है और एक यह राज भी निकलकर अब सामने आ रहा है कि भाजपा और आरएसएस के बीच जो पिछले दिनों सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित हुए थे वो भी कहीं टूटते से नजर आ रहे हैं। इसके साथ-साथ वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सार्वजनिक रूप से यह कहा कि देश का आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है। देश में गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर होता जा रहा है।
श्री गडकरी ने यह भी कहा कि देश के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की आधी पूंजी पहुंच चुकी है। जो देश के लिए चिंता का विषय है। हालांकि इस आर्थिक असंतुलन के ऊपर पिछले दिनों अखबारों में काफी कुछ लिखा जा चुका है और टीवी चैनलों पर इस विषय पर कई बार बहस भी हो चुकी है। लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी का इस तरह से बयान देना मोहन भागवत के उस बयान से जोड़ा जा रहा है जिसमें नेताओं के लिए आयु सीमा की बात कही गई है। क्योंकि यह जगजाहिर है कि नितिन गडकरी आरएसएस के काफी करीब हैं और नागपुर से कई बार के सांसद रहने पर उनके संबंध आरएसएस के बड़े नेताओं से अपेक्षाकृत काफी मजबूत हैं। भाजपा में भी गडकरी की स्थिति काफी मजबूत आंकी जा रही है और वो विशेष परिस्थितियों में भाजपा के अंदर अगले प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपाइयों की मजबूत पसंद भी बताए जाते हैं। लिहाजा आरएसएस और भाजपा के बीच अब कुछ तो पक रहा है। फिलहाल ऐसा जो कुछ भी चल रहा है वो विपक्षी दल के नेताओं के लिए संजीवनी का काम कर रहा है। विपक्षी दल जल्द ही एक मुहिम छेड़कर प्रधानमंत्री मोदी के 75 वर्ष आयु पूरा होने पर उनके पद छोड़ने की मांग भी एक अभियान के रूप में देश के सामने रख सकते हैं। एक तरफ बिहार का चुनाव और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के 75 वर्ष पूरे होने पर विपक्षी आंदोलन दोनों मुद्दे मिलकर बिहार के चुनाव में बड़ी चर्चा का विषय बन सकते हैं।


