चर्चा-ए-आम

मजबूत नीतीश कैसे हो गए मजबूर नीतीश!

कमल सेखरी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बृहस्पतिवार को दोपहर बाद राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए नामांकन कर दिया। यह खबर मीडिया के कुछ माध्यमों के द्वारा बुधवार की शाम यह कहकर चलाई गई कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति छोड़कर दिल्ली जा रहे हैं और वहां राज्यसभा में अपनी पार्टी जेडीयू का सदस्य बनकर अपर हाउस में प्रतिनिधित्व करेंगे। बृहस्पतिवार की सुबह जब नीतीश कुमार ने स्वयं अपने टिवटर हैंडल पर यह जानकारी दी कि वो बिहार के मुख्यमंत्री पद को छोड़कर राज्यसभा का सदस्य बन रहे हैं और बिहार को पहले की तरह ही अपना मार्गदर्शन देते रहेंगे और आवश्यकता पड़ने पर अपना हर सहयोग भी प्रदान करेंगे। नीतीश कुमार के बिहार छोड़ने की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई खासतौर पर बिहार में तो इस खबर की तीव्र प्रतिक्रिया भी यकायक नजर आई। जनता दल यूनाईटिड के कार्यकर्ता जिनके बीच कई बड़े पार्टी के नेता भी शामिल थे और कई विधायक भी उसका हिस्सा बने नजर आ रहे थे उन्होंने पटना की सड़कों पर उतरकर ना केवल अपना रोष जाहिर किया बल्कि नीतीश कुमार के ऐसा निर्णय लेने के पीछे भाजपा हाईकमान को दोषी भी माना। जेडीयू के इन आंदोलनकारियों ने अपनी ही पार्टी के दफ्तर में जाकर पुरजोरता से नारेबाजी की और वहां भारी तोड़फोड़ भी की। जेडीयू के इन कार्यकर्ताओं का कहना था कि बिहार की जनता ने जेडीयू को नीतीश कुमार के नाम पर ही वोट दिया है और भाजपा प्रत्याशियों को भी जितने वोट मिले हैं उनमें से अधिकांश मत नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर ही दिये गये हैं। उनका कहना था कि बिहार में इस बार का विधानसभा चुनाव यह कहकर लड़ा गया कि पच्चीस से तीस फिर से नीतीश। मीडिया से बातचीत के दौरान जेडीयू के अधिकांश छोटे-बड़े कार्यकर्ता यही कहते नजर आए कि हमें बिहार में नीतीश कुमार या जेडीयू के अलावा अन्य किसी और पार्टी का नेता मुख्यमंत्री के तौर पर बर्दाश्त नहीं होगा। खासतौर पर अगर भाजपा ने अपना कोई नेता मुख्यमंत्री बनाया तो जेडीयू के कई कार्यकर्ता और नेता पार्टी छोड़कर किसी अन्य राजनीतिक दल में जा मिलेंगे। नीतीश कुमार का नामांकन पत्र भरवाने के लिए दिल्ली से केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह विशेष रूप से पटना पहुंचे और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री आवास से अपने साथ गाड़ी में बैठाकर एक बड़े काफिले के साथ विधानसभा सचिवालय पहुंचे और नीतीश कुमार का राज्य सभा सदस्यता का नामांकन दाखिल कराया। जेडीयू के ही अन्य नेताओं का कहना था कि केन्द्रीय गृहमंत्री नीतीश कुमार को उनके आवास से वैसे ही अपहरण करके ले गए जैसा कि ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ किया था। नीतीश कुमार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले ही ये स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी और चुनाव का फैसला आने के ठीक 111 दिन बाद उस स्क्रिप्ट को अमलीजामा पहना दिया गया। जेडीयू पार्टी के ही नेता मीडिया में बोलते हुए नजर आए कि भाजपा ने जेडीयू के ही कुछ बड़े नेताओं के साथ मिलकर नीतीश कुमार को साजिश के बड़े जाल में फंसा लिया है जिससे नीतीश कुमार चाहते हुए भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं और वो सबकुछ कर रहे हैं जो साजिशकर्ता चाहते हैं। हालांकि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को उनके स्थान पर जेडीयू में कोई महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा और साथ ही बिहार सरकार में कोई मंत्री पद भी उन्हें सौंपा जा सकता है। लेकिन कुल मिलाकर बिहार में जो अचानक परिस्थितियां बनीं और कुछ ही घंटों के बीच इतने बड़े फैसले लिये गए इसके पीछे कोई ना कोई बड़ा खेल जरूर हुआ है और आने वाले समय में यह भी सामने आ ही जाएगा कि मजबूत नजर आने वाले नीतीश यकायक इतने मजबूर कैसे हो गए।

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