बिना हिन्दी कैसे बनेगा हिन्दू राष्ट्र !

- तेजी से बंद हो रहे हैं हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल
- देश में 53 प्रतिशत लोग नहीं बोल रहे हिन्दी
- अंग्रेजी बन गई है प्रांतों में वैकल्पिक भाषा
कमल सेखरी
महाराष्ट्र में भाजपा सरकार को स्कूली स्तर पर हिन्दी भाषा अनिवार्य रूप से लागू करने का अपना आदेश जो वापस लेना पड़ा उसके पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक खेल छिपा है। महाराष्टÑ सरकार को मजबूरी में ये यू टर्न लेना पड़ा क्योंकि महाराष्ट्र में हिन्दी के इस अनिवार्यता के आदेश का बड़े स्तर पर विरोध हुआ और इसके खिलाफ ठाकरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे मिलकर एक मंच पर आ गए और उन्होंने एक विशाल रैली कर सीधे शब्दों में कह दिया कि महाराष्ट्र में मराठी चलेगी और यह मराठी अस्मिता का मामला है जो हम खंडित नहीं होने देंगे। इतना ही नहीं पिछले एक सप्ताह में महाराष्ट्र में कई ऐसी घटनाएं घटित हुई जिनमें मराठी ना बोलने पर गैर मराठियों को मारा पीटा गया और उन्हें महाराष्ट्र छोड़ने की धमकी भी दी। महाराष्ट्र का यह मामला फैलते-फैलते देश के कई अन्य राज्यों में भी पहुंच गया और वहां से भी हिन्दी भाषा और प्रांतीय भाषा के मतभेद खुलेआम उभरकर सामने आने लगे हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा के कई बड़े नेताओं ने बयानबाजी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आदत से मजबूर सांसद निशीकांत दुबे ने यहां तक कह दिया कि मराठी महाराष्ट्र में दबंगी दिखा रहे हैं अगर ये यूपी-बिहार और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जाएंगे तो लोग इन्हें पटक- पटक कर मारेंगे। इस मुद्दे को लेकर स्थिति यह बन रही है कि हिन्दी बनाम अन्य प्रांतीय भाषा का जो मतभेद कई बार पहले भी उभरा है वो फिर उसी तरह से जहर उगलता हुआ सामने आ सकता है। भाजपा के बड़े नेताओं ने अब एक अलग से दूसरी लाइन पकड़कर यह कहना शुरू कर दिया है कि हमारे देश में इंग्लिश जो विभिन्न प्रांतों में वैकल्पिक भाषा के रूप में बोली जाती है उसकी जगह हिन्दी आ जानी चाहिए और जल्द ही ऐसा समय आएगा कि अंगेजी बोलने वाले खुद अपने पर ही शर्म महसूस करने लगेंगे। अब यहां से दो बातें निकलकर सामने आती हैं। एक तो हिन्दी बनाम प्रांतीय भाषा और दूसरा हिन्दी बनाम अंग्रेजी भाषा। एक सर्वे के मुताबिक यह सामने आ चुका है कि हिन्दी केवल उत्तर भारत के कुछ प्रांतों में ही बोली जाती है जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश। बकाया समूचे देश में अलग-अलग प्रांतों में प्रांतीय भाषा ही बोली और लिखी जाती है। सर्वे के मुताबिक भारत में केवल 47 प्रतिशत लोग ही हिन्दी बोलते और लिखते हैं जबकि 53 प्रतिशत लोग ना हिन्दी लिखते हैं और ना बोलते हैं। अब हमारी सोच इस ओर बढ़ रही है कि हम भारत को हिन्दू राष्टÑ बनाएं तो इसके लिए जरूरी है कि देश में हर स्थान पर हिन्दी बोली और लिखी जाए। ऐसा हो पाना संभव नजर नहीं आ रहा क्योंकि दशकों नहीं शतकों से जो प्रांतीय भाषाएं बोली जा रही हैं जिन्हें हम अनेकता में एकता बताकर भारत की खूबी गिनाते हैं उसकी जगह हिन्दी को लाना अब संभव नजर नहीं आता है। दूसरा मामला जो इंग्लिश भाषा का है और जो देश के लगभग सभी प्रांतों चाहे वो दक्षिण भारत हो, उत्तरी पूर्वी क्षेत्र हो या फिर बंगाल या महाराष्ट्र हो सभी जगह प्रांतीय भाषा से अलग वैकल्पिक भाषा इंग्लिश को ही स्थान दिया जा रहा है। अब इंग्लिश की जगह हिन्दी को लाना भी कोई सरल काम नहीं है। पूरे देश में ही छोटे पार्षद से लेकर विधायक, सांसद, सभी के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों और यहां तक कि लिपिक और अन्य छोटे कर्मचारियों के बच्चे भी अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ने जाते हैं। यहां तक कि एक चाय वाला और रेहड़ी ठेली वाला भी अपनी पूरी कोशिश करके अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ा रहा है। मंत्रियों के बच्चों की तो बात ही अलग है, उनके बच्चे तो विदेशों के अंगे्रजी स्कूलों में ही पढ़ने जाते हैं देश में कोई सा राज्य हो वहां हिन्दी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या ना के बराबर है। हिन्दी भाषाई प्रदेशों में हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल तेजी से बंद होते जा रहे हैं। ये परिस्थितियां भाजपा और आरएसएस के नेताओं के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। हिन्दू राष्ट्र बिना हिन्दी के कैसे संभव होगा यह इन सब के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।


