चर्चा-ए-आमलेटेस्टस्लाइडर

होली-जुमे की सियासी जंग में हार गई नफरत

Hatred lost in the political battle between Holi and Friday

कमल सेखरी

होली तो होली। ना कहीं रंग में भंग पड़ी और ना ही संवेदनशील माने जा रहे उत्तर प्रदेश और बिहार में कहीं भी कोई अप्रिय छुटपुट घटना हुई। पिछले दस दिनों से हमारे राजनेताओं ने पूरा जोर लगाकर यह कोशिश की कि किसी तरह माहौल बिगड़ जाए और उन्हें अपनी राजनीति चमकाने का और मौका मिल जाए। आवाम को उकसाने, भड़काने और नफरत पैदा करने के सभी राजनीतिक प्रयास विफल हो गए। क्योंकि ऐसा कुछ था ही नहीं जो बताया और जताया जा रहा था। होली के रंग खेलने और उसके साथ ही जुमे की नमाज पढ़ने के सभी काम बड़े प्रेम, प्यार, स्नेह और सौहार्द के माहौल में वैसे ही पूरे हो गए जैसा कि पिछले कई सालों से होता हुआ आ रहा है। होली का पर्व और जुमे की नमाज ऐसा नहीं कि पहली बार ही एक साथ आए हों, पहले भी कई मौके ऐसे रहे कि होली और जुमा एक ही दिन पड़े और बड़े ही प्यार और उल्लाहास के साथ होली का पर्व भी मना और शांति के साथ जुमे की नमाज अदा की गई। लेकिन इस बार कुछ राजनीतिक स्वार्थों को अपने समर्थन में सिद्ध करने के लिए इतना नफरती जहर उगला गया कि लोग सुन सुनकर उकता गए और नफरत फैलाने वाले राजनेताओं के खिलाफ दबी जुबान में भला बुरा भी कहने लगे। हमें अच्छी तरह याद है कि पिछले दो दशकों को छोड़कर उससे पहले के 5 दशक तक रमजान के दौरान देश में आपसी सौहार्द बना रहता था और इस दौरान आने वाली होली और ईद को हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग बड़े प्यार और भाईचारे के साथ मिलकर मनाते थे। देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जब पहली बार गाजियाबाद के सांसद बने उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। राजनाथ सिंह अपने संसदीय क्षेत्र में कम से बीस दिन और अधिक दिन भी रमजान के दौरान इफ्तारी के लिए आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेने जाते थे। इसी तरह भाजपा के मेयर जो दस साल तक यहां मेयर पद पर रहे वो भी नियमित रूप से इफ्तार की पार्टियों में उपस्थित रहते थे। गाजियाबाद के कई व्यापार मंडल, कई सामाजिक संस्थाएं और पत्रकार संघ भी मुस्लिम भाइयों के लिए इफ्तारी का आयोजन करते थे। गाजियाबाद के ही मुस्लिम बहुल्य क्षेत्र कैला भट्ठा
के दो मशहूर गायक चाचा काको और भतीजा बब्बन जो वैसे तो गजल और कव्वालियां गाते थे लेकिन मंदिरों में आयोजित होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी प्रभु राम, श्री कृष्ण और शिव भोले के भजन बड़े दिल से गाते थे। बब्बन मियां तो मां दुर्गा के नवरात्रों और जागरणों में नियमित माता वैष्णो के भजन गाकर उपस्थित भक्तों को भाव विभोर कर देते थे। ऐसी एक नहीं सैकड़ों मिसाले हैं जो हमारी गंगा जमुनी तहजीब को बड़ी मजबूती से वो पहचान देते हैं जिनमें हिन्दू-मुस्लिम मिलकर भाईचारे, प्यार और सौहार्द के साथ कई आयोजनों में एक साथ शामिल रहते थे। अब ऐसा हो क्यों रहा है कि हम सदियों से चली आ रही अपनी इस पुरानी तहजीब से अलग हटकर ऐसे माहौल की गिरफ्त में आना शुरू हो गए हैं जिनमें नफरत और जहर परोसा जा रहा है। इस बार खेली गई होली और अदा की गई जुमे की नमाज को अगर हमने मिलकर स्नेह और भाईचारे के साथ विपरीत परिस्थतियों में भी सार्थकता के साथ मना लिया है तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि आने वाले समय में हम अपने इसी आचरण का परिचय देते हुए अपने उत्तर प्रदेश और भारत देश को उस रास्ते पर चलने से बचा लें जिस खतरनाक रास्ते पर हमें हमारे राजनेता जबरन ले जाना चाहते हैं। हम अगर अपनी गर्दनें खुद बचाना सीख जाएं तो ये नफरती आरियां खुद ही निराश होकर वापस लौटती रहेंगी।

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