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घर से भीगी आंखें लेकर निकला था, प्यासे पंछी झील समझ कर बैठ गए : शाहिद अंजुम

  • आज गाओ कि पन्द्रह अगस्त है, जश्न-ए-खुशी मनाओ कि पन्द्रह अगस्त है: माला कपूर
  • सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आजादी के अमृत महोत्सव में खूब बढ़ी तिरंगे की शान
  • बारादरी अदब की रवायतों का नया संस्करण है : डॉ. बाजपेई
  • नई पीढ़ी गजल को जानती है तो जगजीत सिंह की वजह से
  • काव्य की हमारी कई विधाएं खत्म होती जा रही हैं
    गाजियाबाद।
    हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार, लेखक, कवि व समीक्षक डॉ. लक्ष्मी शंकर बाजपई ने ‘बारादरी’ को अदब की रवायतों का नया संस्करण बताया। ‘महफिल ए बारादरी’ में बतौर अध्यक्ष बोलते हुए उन्होंने कहा कि मंचों से कविता जहां दूर होती जा रही है वहीं बारादरी के मंच पर कविता दिनों दिन समृद्ध हो रही है। कविता, गीत, गजल की यह पाठशाला निसंदेह अदब की गरिमा के क्षरण को रोकने का काम करेगी। अपने गीत, छंद, माहिया, शेर और दोहों पर उन्होंने भरपूर दाद बटोरी। आजादी के अमृत महोत्सव को लक्षित कर उन्होंने फरमाया ”पतिव्रता पत्नी भी साथ चली, पति ने तिरंगा फहराने को कदम जो निकाला था, फहराते ही तिरंगा ब्रिटिश सिपाहियों ने पति का शरीर गोलियों से भून डाला था, पति की लहुलुहान देह लड़खड़ाई जब, हाथ से तिरंगा बस गिरने ही वाला था। देशभक्ति कितनी महान थी पतिव्रता की, पति से भी पहले तिरंगे को संभाला था।
    सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. बाजपेई ने कहा कि नई पीढ़ी गजल को जानती है तो जगजीत सिंह की वजह से और गीत को सिनेमा की वजह से जानती है। काव्य की हमारी कई विधाएं खत्म होती जा रही हैं। जिनका संरक्षण निहायत आवश्यक है। डॉ. बाजपेई ने अपने दोहों में मौजूदा वक्त की सच्चाई बयान करते हुए कहा हर ग्रह पर इंसान को खोज रहा विज्ञान, मैं अपने ही शहर में खोज रहा इंसान। नये मन के विश्वास हैं या हैं मन के रोग, क्या-क्या भ्रम पाले हुए उम्र गंवाते लोग। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शाहिद अंजुम ने भी अपने शेरों पर भरपूर दाद बटोरी। उन्होंने फरमाया छत पर दो मासूम कबूतर बैठ गए, तेरे गम पलकों पर आकर बैठ गए। घर से भीगी आंखें लेकर निकला था, प्यासे पंछी झील समझ कर बैठ गए। जब में आधी रात को अपने घर लौटा, भूखे बच्चे नींद से उठ कर बैठ गए। एक अन्य गजल के शेरों वक्त के साथ बदलना भी नहीं सीखे हैं, ठोकरें खा के संभलना भी नहीं सीखे हैं, मेरे मालिक मेरी सांसों की हिफाजत करना, मेरे बच्चे अभी चलना भी नहीं सीखे हैं।
    संस्था की संरक्षिका डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने आजादी पर पढ़ी रचना पुरजोर आज गाओ कि पन्द्रह अगस्त है, जश्न-ए-खुशी मनाओ कि पन्द्रह अगस्त है। आजादी-ए-वतन को पछत्तर बरस हुए, दुनिया को ये बताओ कि पन्द्रह अगस्त है। अमृत महोत्सव हम मना रहे हैं शान से। घर द्वार सब सजाओ कि पन्द्रह अगस्त है। दुनिया में इक पहचान तिरंगे ने दी हमें, घर घर इसे फहराओ कि पन्द्रह अगस्त है। गौहर बनाओ माला तिरंगे की सांस में, कर्तव्य ये निभाओ कि पन्द्रह अगस्त है से पूरे सदन की सराहना बटोरी। उन्होंने अपने शेर चेहरे पे नूर, धूप-सा चेहरा किए हुए, ये कौन आ रहा है उजाला किये हुए। जाओ उदासिओं कहीं जाओ यहां से दूर पर भी दाद बटोरी। संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने कहा बाद हर सुब्ह के इक शाम जरूरी है बहुत, कोई आगाज हो अब अंजाम जरूरी है बहुत। इसलिए मौत के बिस्तर पे बिछाया है बदन, हो सफर कोई भी आराम जरूरी है बहुत। ममता किरण के शेर वो एक झूठ की तहरीर से लिखा कागज, हुआ जो पेश तो शमिंर्दा ही हुआ कागज। सफर कहां से कहां तक का करता रहता है कभी लिफाफा कभी नाव बन गया कागज। जो कह सकी ना किसी और से कहा तुमसे, हर एक बात को बस तुमने ही सुना कागज भी खूब सराहे गए। कार्यक्रम का संचालन कीर्ति ‘रतन’ ने किया। इस अवसर पर सुरेंद्र सिंघल, डॉ. रमा सिंह, मासूम गाजिÞयाबादी, सुभाष चंदर, डॉ. सुधीर त्यागी, डॉ. तारा गुप्ता, नेहा वैद, आलोक यात्री, सीमा सिकंदर, मनु लक्ष्मी मिश्रा, अनिल शर्मा, दिनेश चंद्र श्रीवास्तव, सोनम यादव, मंजु मन, देवेंद्र शर्मा ‘देव’, जय प्रकाश रावत, कामिनी मिश्रा, उषा श्रीवास्तव, तुलिका सेठ, इंद्रजीत सुकुमार, सुरेन्द्र शर्मा, संजीव शर्मा, सीमा शर्मा आदि की रचनाएं भी सराही गईं। इस अवसर पर राजेश श्रीवास्तव, वागीश शर्मा, शकील अहमद शैफ, सुभाष अखिल, अभिषेक सिंघल, विनीत गोयल, आशीष मित्तल, निशांत शर्मा, अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव, प्रेम श्रीवास्तव, प्रवेश चंद्र गुप्ता, आशीष ओसवाल, विनोद कुमार मिश्रा, शशिकांत भारद्वाज, मंजू मित्तल, अजय मित्तल और रवि शंकर पांडे सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।

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