चर्चा-ए-आमस्लाइडर

मजबूत भारत अकेला भी चले तो भी काफी है

  • भारत को यह भरोसा क्यों नहीं कि विश्च हमारे साथ नहीं है
  • हमें झगड़ालु प्रतिनिधिमंडल भेजने की जरूरत ही क्या थी!
  • हम क्यों चिंता करें कौन साथ है कौन नहीं!

कमल सेखरी
भारत अलग-अलग देशों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों की मिलीजुली टीम बनाकर इस उद्देश्य से भेज रहा है कि विभिन्न सांसदों का यह दल उन देशों में जाकर उन्हें यह समझाये कि पाकिस्तान ने हमारी कश्मीर घाटी के पहलगाम में सैलानियों पर नरसंहार कर बड़ी ही दुर्दांता से महिलाओं और बच्चों के सामने उनके पति और पिताओं की निर्मम हत्या की। भारत इन सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से यह संदेश भी देना चाहता है कि जिन आतंकवादियों ने यह नरंसहार किया वो पाकिस्तान से सीमा पार करके भारत आए थे और उन्होंने यह हैवानियत करते समय लोगों के धर्म पूछे और फिर उन्हें गोलियों से उड़ा दिया। इसमें पाकिस्तान का यह उददेश्य रहा कि भारत में किसी तरह धार्मिक सौहार्द खराब हो और पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम के बीच हिंसक उन्माद पैदा हो जाए। यह प्रतिनिधिमंडल उन सभी देशों को यह भी समझाने की कोशिश करेगा कि हमने पाकिस्तान पर जो भी हमला किया वो पहलगाम में हुई घटना पर हमारा जवाबी हमला था। अब जब सांसदों के सात अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग देशों में भेजे जा रहे हैं वो यहां से आरंभ होने से पूर्व ही आपसी सियासी रंजिश के शिकार होते नजर आ रहे हैं और रवानगी से पहले एक दूसरे पर ऐसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं जिससे लगता ही नहीं कि ये सब मिलकर कोई सार्थक संदेश लेकर अलग-अलग देशों की ओर रवाना हो रहे हैं। अभी तो ऐसा लग रहा है जैसे किसी आईपीएल क्रिकेट प्रतियोगिता की सात टीमें अलग-अलग जगह से खिलाड़ियों को जोड़कर मैदान में उतारी जा रही हैं जिनका उददेश्य एक दूसरे के खिलाफ धुआंधार गेंदबाजी करना और उन गेंदबाजों को धड़ाधड़ चारों तरफ बेट घुमाकर चौके-छक्के उड़ाने जैसा है। हमें फिलहाल तो यही कामना करनी चाहिए कि हमारे सांसदों के ये सभी प्रतिनिधिमंडल आपसी आरोप-प्रत्यारोप से घायल हुए बिना स्वदेश लौट आएं। हमें सियासी नजर से ना सोचकर इन प्रतिनिधिमंडलों में विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और बुद्धिजीवियों को ही शामिल करके भेजना चाहिए था। वैसे भी हमें ऐसा सबकुछ करने की आवश्यकता क्या है। पहलगाम में जो भी दरिंदगी बरती गई वो हमारे मीडिया और दुनिया के अन्य मीडिया के माध्यम से पूरे विश्व ने देखा है। वो नरसंहार आतंकी पाकिस्तान से आए थे तो इस सच्चाई में हमें अपनी सफाई देने की जरूरत ही क्या है। हमने उस नरसंहार दरिंदगी का बदला लिया जो हमें लेना भी चाहिए था तो इसमें भी हमने क्या गुनाह कर दिया। हमने तो 15 दिनों तक यह कहकर पाकिस्तान को चेताया कि वो ऐसी कायराना हरकत से बाज आए और पहलगाम में जो कुछ हुआ उसके लिए माफी मांगे और जो आतंकी वहां पोषित किए जा रहे हैं उनके आकाओं को हमारे हवाले कर दें। अब हम इतने मजबूत होते हुए भी स्वयं से खुद को इतना कमजोर क्यों मान रहे हैं कि हम दुनियाभर के देशों में जा जाकर इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करें, हमें खुद पर इतना भरोसा होना ही चाहिए कि दुनिया आपरेशन सिंदूर को लेकर हम पर अविश्वास तो कभी नहीं करेगी। आज के समय में यह एक सामान्य सियासी चलन बन चुका है कि दुनियाभर के सियासी नेता अगर आपके पक्ष में खड़े नजर नहीं आ रहे तो हमें यह नहीं मानना चाहिए कि वो हमारे विरोध में खड़े हैं। यह भी एक सत्य है कि जब कोई व्यक्ति या देश मजबूत स्थिति में खड़ा होना शुरू हो जाता है तो आसपास के कमजोर देश ईर्ष्या भाव से भी उसके साथ खड़े नजर नहीं आते। चीन और तुर्की की मजबूरी है कि उन्होंने पाकिस्तान को हथियार बेचने हैं, यह हथियार यदि उधार भी बेच दिये जाएंगे तो पाकिस्तान से किसी न किसी शक्ल में ये मुल्क मुआवजा उठा ही लेंगे। अमेरिका भले ही हमारा दिखावे का दोस्त बनता हो लेकिन दोस्त है नहीं। अफगानिस्तान में तालिबान आने के बाद अमेरिका को जो अपना आधार वहां से छोड़ना पड़ा वैसा आधार अब वो दक्षिण ऐशिया क्षेत्र में पाकिस्तान के अंदर बनाना चाहता होगा क्योंकि यहां से वो रूस, तालिबान के अफगानिस्तान, चीन और ईरान से कभी भी दो-दो हाथ कर सकता है। अपने इस उददेश्य की पूर्ति के लिए वो एफ-16 लड़ाकू जहाजों से अलग जाकर भी अपने और शस्त्र पाकिस्तान को नजराने में दे सकता है। भारत एक मजबूत राष्टÑ बन रहा है और प्रगतिशील राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है तो ऐसे में उसे यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि पड़ोसी देश उसके साथ खड़े हैं या नहीं खड़े हैं या फिर दुनिया के कौन से देश मुसीबत की घड़ी में उसके साथ आते हैं या नहीं आते हैं। भारत को अपना अलग रास्ता यह मानकर चुनना होगा एकला चलो…एकला चलो…एकला चलो रे।

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