क्या ब्राह्मणों को ही है कथा वाचन का अधिकार!

- ईश्वर एक है, मानस की जात एक फिर ये अंतर क्यों!
- राष्ट्र धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है और संविधान सबसे बड़ा शास्त्र
- कथा वाचन और पूजा पाठ का संवैधानिक अधिकार हर नागरिक को है
कमल सेखरी
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के दांदरपुर गांव में आयोजित की गई एक भजन कथा के दौरान एक बड़ा बवंडर बन गया जो कुछ ही क्षणों बाद देश की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनकर चर्चा में आ गया। हुआ यूं कि दांदरपुर गांव जो ब्राह्मण बहुल्य क्षेत्र है वहां आयोजित एक कथा और भजनों के आयोजन के दौरान वहां कथा सुन रहे लोगों को यह पता चला कि कथा वाचक जो संख्या में दो थे यादव जाति के हैं और उनके साथ ढोलक पर जो संगत दे रहा था वो जाटव जाति से संबंधित था। यह जानकारी मिलते ही गांव के ब्राह्मण नेता यकायक भड़क उठे और उन्होंने कथा वाचकों व ढोलक बजाने वाले तीनों ही लोगों को बुरी तरह से मारा पीटा। इतना ही नहीं उनके सिर मुंडवाकर उनसे वहां उपस्थित लोगों के पैरों में नाक रगड़वाई गई और कहा जाता है कि उनके मुंह पर ब्राह्मणों के पेशाब से छिड़काव किया गया। पिटे पिटाये ये कथा वाचक जिनके वाद यंत्र भी छीन लिये गये थे उन्हें उल्टे पांव गांव से निकाल दिया गया। आरोप यह भी है कि उनकी जेब में जितना भी पैसा था वो भी छीन लिया गया। दांदरपुर से निकले ये कथा वाचक सीधा समाजवादी पार्टी के कार्यालय पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। सपा नेताओं ने वहां इनका सम्मान किया और 50 हजार की धनराशि भी उपहार में दी। ये सपा नेता इन पीड़ित कथा वाचकों को लेकर संबंधित पुलिस थाने पर पहुंचे और एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने अगले दिन काफी शोर शराबा मचने के बाद दांदरपुर गांव के कुछ आरोपियों को गिरफ्तार भी किया। इससे एक दिन पहले ही उड़ीसा में दलित समाज के दो युवकों को गो तस्करी का आरोप लगाते हुए कुछ तथाकथित गोर रक्षकों ने पकड़ लिया, उन्हें बुरी तरह से मारा पीटा, उन्हें जबरन नाले का गंदा पानी पिलाया और उनके मुंह में कीचड़ डालकर उन्हें सड़क पर लिटाकर रेंगने पर मजबूर किया। यह कोई नया मामला नहीं है कि इटावा और उड़ीसा जैसी घटनाएं घटित हो रही हैं। एक सर्वे के अनुसार देश में औसतन 40 से 50 घटनाएं लगभग रोज ही हो रही हैं जिनमें दलित, जाटव, पिछड़े वर्ग के लोगों को कोई ना कोई आरोप लगाकर उत्पीड़ित ना किया जा रहा हो। अब अगर हम कल बीती इटावा की घटना को ही लें तो इससे यही निकलकर सामने आता है कि पूजा पाठ या कथा वाचन और भजन आयोजनों को करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों का ही है। वो मनुवादी विचारधारा जिसमें अलग-अलग कार्य करने के लिए वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी उसे हम सदियों पहले दफना चुके हैं। आज हम अपने रोजगार, व्यवसाये और अन्य कार्यों के अनुसार अपने-अपने कामों को अंजाम देते हैं चाहे हम किसी भी धर्म और जाति के क्यों ना हों। इटावा में कथा वाचकों को यादव मानकर जो बेरहमी से पीड़ित किया गया उस पर अगर विचार करें तो भगवान श्रीकृष्ण भी यदुवंशी थे और आज हम ब्राह्मणों सहित सभी जातियों में उन्हें ईश्वर मानकर ही उनकी पूजा करते हैं तो फिर ऐसे में उनके वंशजों को हम केवल इसलिए प्रताड़ित कर सकते हैं कि वो ब्राह्मण नहीं हैं और कथा वाचन का कार्य कर रहे हैं। ऐसे ही रामायण के रचियता महर्षि बाल्मीकि को पूर्ण आदर सम्मान देते हुए हम उनके द्वारा रचियत रामायाण का अनुसरण करते हैं तो ऐसे में दलित, जाटव, अति दलित, पिछड़े, अति पिछड़े और बाल्मीकि भाइयों के साथ हम किसी भी तरह का दुर्व्यवहार कैसे कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण पर असंख्य कविताएं लिखने वाले महाकवि रसखान थे और समाज को 400 वर्ष पहले भी एक नई दिशा देने वाले संत कबीर जुलाहे थे तो ऐसे में हम क्या माने कि मुस्लिम और जुलाहों के साथ हम कैसा व्यवहार करें।
वास्तविक स्थिति तो यह है कि कथा वाचन और भजन गायिकी का काम ब्रा्हम्णों से अलग अन्य कई जााति के लोग पहले से ही कर रहे हैं। दशकों पहले स्वामी विवेकानंद जी ने हिन्दू धर्म को एक नई धारा के साथ जोड़ा और हिन्दुओं को आर्यवीर और आर्यसमाजी बनाकर एक ऐसी सोच पैदा की जिसमें जातीय मतभेद का कोई स्थान नहीं रखा गया। देश में आर्य समाज के कई मंदिर और पाठशालाएं खोलकर आर्य समाजी सोच को आगे बढ़ाया गया। आर्य समाज के मंदिरों में पूजा पाठ हवन और यहां तक कि शादियों को आर्य सामाजिक विधि से संपन्न कराने का काम बड़े स्तर पर आरंभ हुआ, आज यह सभी काम बिना जातीय आधार के किसी भी जाति के लोग संपन्न करा रहे हैं और आर्य समाजियों का सनातन धर्म से अलग हटकर एक नई विधि और सोच पूरे देश में पैदा हो गई है। धार्मिक रूप से भी अगर हम विचार करें तो हमारे सभी धार्मिक शास्त्र चाहे वो गीता हो कुरान हो बाइबल हो या गुरु ग्रंथ साहब हो सभी में एक यही आधार माना जाता है कि ईश्वर एक है और हम सब परमपिता परमेश्वर की संतान हैं जिसके आधार पर यही माना जाता है कि मानस की जात एक है। जब मानस की जात एक है तो क्या ब्राह्मण, क्या कायस्थ, क्या वैश्य, क्या दलित, क्या जाटव और क्या अति पिछड़ा, इन सबकी समाज में और सामाजिक सोच में जगह ही कहां है। हम ये भी मानते हैं कि राष्ट्र धर्म सबसे बड़ा धर्म है, यदि ऐसा है और ऐसा होना भी चाहिए तो फिर देश को संचालित करने वाला व्यवस्था को चलाने वाला देश का संविधान ही सबसे बड़ा शास्त्र है। और यह संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार देता है। अत: कथा वाचन या भजन गायिकी का अधिकार देश के हर नागरिक को है। चाहे वो किसी भी धर्म और जाति में पैदा हुआ हो। वास्तविकता तो यह है कि देश का संविधान देश में रहने वाले हर व्यक्ति को समान नागरिक मानता है और उन्हें बराबर के नागरिक अधिकार देता है। हमें गंभीरता से सोचना होगा कि कुछ जाति विशेष जो किसी कार्यक्षेत्र को अपना एकमात्र अधिकार बताकर उस पर कब्जा करना चाहती है वह पूर्णत: गैरकानूनी है और ऐसा करने वाले दंड के भागेदार होने ही चाहिए, अत: कथा वाचन, गायिकी और पूजा-पाठ का अधिकार केवल ब्राह्मणों को नहीं है, देश का हर नागरिक इस कार्य को अपना संवैधानिक अधिकार मानकर करने के लिए स्वतंत्र है।



