बिक रहा है लोकतंत्र, बोलो खरीदोगे…

कमल सेखरी
बिक रहा है लोकतंत्र सियासत के बाजार में, बोलो खरीदोगे। जी हां हमारे सियासी नेताओं ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र जिसके आम चुनाव में 98 करोड़ मतदाता अपना मत डालते हैं उसका ऐसा मजाक बनाकर रख दिया कि लगता ही नहीं कि देश में कहीं निजी विचार वाला आम आदमी का लोकतंत्र जिंदा रह गया है। पिछले आधा दर्जन चुनावों में हमें यह देखने को मिला है कि जिस सत्ताधारी पार्टी ने अपनी सत्ता का दुरुपयोग कर मतदाताओं को रिझाने के लिए जिस तरह से दुनियाभर के प्रलोभन देकर रेवड़ियां बांटी हैं और चुनावी परिणाम उसी आधार पर अपने पक्ष में लिये हैं उससे तो लगता है कि अब देश में विकास और जनहित का कोई मुददा चुनावी आधार बन ही नहीं रहा है सारे चुनावी परिणाम रेवड़ियां बांटकर बटोरे जा रहे हैं। मतदाताओं को दिए जा रहे तरह-तरह के प्रलोभन में नकदी देने का जो नया चलन शुरू किया है वो एक नई परिपाठी बनकर नोट लो वोट दो, हमारी सियासत का मुख्य आधार बन गया है, यह देश के लिए सबसे अधिक चिंताजनक है और घातक भी है। मध्यप्रदेश के चुनाव में लाडली बहना की योजना नकदी देकर पार उतारी गई उसी तरह झारखंड में मैया सम्मान योजना में नकदी के वितरण ने अपना करिश्मा दिखाया और महाराष्ट्र के चुनाव में तो लाडली बहन योजना में दी गई नकदी का ऐसा जादू चला कि विरोधी दल चारों खाने चित हुए और उनका सूपड़ा ही साफ हो गया। अब दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भी देश में चलाया जा रहा यह सियासी चलन अपना रंग दिखा रहा है। सत्ता दल आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पहले महिलाओं को सरकारी योजना बनाकर नकदी देने की घोषणा क्या की कि विरोधी दल भाजपा में खलबली मच गई। पिछले तीस साल से दिल्ली की सत्ता से बाहर रहते हुए इस बार सत्ता पाने का सबसे सुगम रास्ता भाजपा ने भी अपने उसी पुराने नकदी वितरण के फार्मूले को अपनाकर अपने प्रत्याशियों को नकदी की वही राशि चुनाव से पहले ही नकद बांटने की राय दे दी जो अब तक पूर्व के चुनाव में उसने जीत का मुख्य हथियार बनाकर अपनाया था। नई दिल्ली की सीट जहां दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल चुनाव लड़ रहे हैं उनके सामने खड़े किए गए भाजपा प्रत्याशी प्रवेश वर्मा ने अपने क्षेत्र की महिलाओं को बिना किसी योजना के अपनी निजी जेब से 11 सौ रुपए प्रति महिला देना शुरू कर दिया। पिछले दो दिनों से बांटी जा रही यह नगद धनराशि मीडिया और दिल्ली की आम जनता के बीच चर्चा का एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। लेकिन नगदी बांटने वाले सरेआम घोषणा कर रहे हैं कि हम नकदी बांट रहे हैं और आने वाले महीनों में भी इन महिलाओं को हर महीने ऐसे ही नकदी दिया करेंगे। नकदी जिस लिफाफे में डालकर महिलाओं को दी जा रही है उस लिफाफे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल का फूल भी अंकित है। इस नकदी बंटवारे को यह कहकर दिया जा रहा है कि यह नकदी उन गरीब महिलाओं के पास जा रही है जिनके घर में तंगहाली है और परिवार पालने मुश्किल हो रहे हैं। इन महिलाओं से वोटर आईडी कार्ड रखवाकर नकदी दी जा रही है, यह कहकर चुनाव से दो दिन पूर्व यह वोटिंग कार्ड उन्हें लौटा दिया जाएगा। इस नकदी बंटवारे में मुस्लिम, ईसाई और पंजाबी परिवारों की महिलाओं के नाम शामिल नहीं किए जा रहे हैं, भले ही वो अधिक गरीब हों और उनकी आवश्यकता और उनसे अधिक हो।
भाजपा के नेता प्रवेश वर्मा ने जिस तरह से नकदी बांटकर गरीब महिलाओं को रिझाने का प्रयास किया है यह काम अगर विपक्षी दल का कोई नेता करता तो उसे निसंदेह ऐसा करने पर अब तक जेल भेज दिया जाता। देश की आधी आबादी महिलाओं को अलग-अलग प्रलोभन देकर रिझाने की जो कोशिशें विभिन्न दलों के सियासी नेता कर रहे हैं उससे निसंदेह लोकतंत्र को एक गहरी चोट पहुंच रही है। ये नेतागण आम जनता के पैसे से जो सरकारी कोष देश के अन्य विकास और जनहित के कार्यों में लगना चाहिए उसे अपने स्वार्थों के लिए मत खरीदने का एक चलन चलाकर देश को मुफ्तखोरों का देश बनाना चाहते हैं। सरकारी कोष से इन मासूम गरीब लोगों को तरह-तरह के लालच देकर अपने जाल में फंसाने वाले ये सियासी नेता ये भी नहीं समझ पा रहे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन सब बातों को लेकर भारत की छवि कैसे बनेगी। जिस देश में 5 किलो मुफ्त अनाज पाने की होड़ में गरीबों की जो दौड़ में जो लंबी-लंबी कतारें लगती हैं वो पूरे विश्च में यह संदेश जरूर दे रही हैं कि भारत जैसा दावा करता है कि वो और अगले कुछ सालों में विकसित राष्ट्र बन जाएगा यह कैसे संभव है? हम गरीबों के जज्बातों और सपनों से खेल रहे हैं और उन्हें छोटे-छोटे लालच देकर उन्हें बेरोजगारी और निरंतर बढ़ती महंगाई का शिकार बना रहे हैं।