
लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज ने भक्ति की अपनी अलग धारा के साथ जनचेतना को जागरूक करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को प्रतिष्ठापित करने का संकल्प लिया। आज से 452 वर्ष पूर्व भारत के मध्यकाल में विदेशी आक्रान्ताओं की बर्बरता तथा सनातन धर्म पर छा रहे अन्धकार के युग में प्रयागराज की धरती पर श्री कड़ा धाम में जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज का प्रकटीकरण एक दिव्य ज्योतिपुंज के रूप में हुआ। उन्होंने ब्रज भूमि जाकर वैष्णव परम्परा की अलख जगाने का दायित्व अपने हाथों में लिया।
मुख्यमंत्री वृन्दावन, जनपद मथुरा में श्रीमद् जगद्गुरु द्वाराचार्य श्री मलूकदास जी महाराज के 452वें जयन्ती महोत्सव में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने पूज्य संतों का सम्मान किया। इससे पूर्व, मुख्यमंत्री जी ने श्री मलूक पीठ आश्रम (समाधि स्थल) का दर्शन किया। उन्होंने श्री मलूकेश्वर महादेव मन्दिर में पूजा-अर्चना की। इसके उपरान्त मुख्यमंत्री जी श्री मलूक पीठ गौशाला में गायों को गुड़ व केला खिलाया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज के प्रकटीकरण तथा दिव्य समाधि लेने की तिथि एक ही ‘वैशाख कृष्ण पंचमी’ है। वैशाख पंचमी के दिन आज उन्हें जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज की समाधि के दर्शन तथा उनकी दिव्य साधना का प्रभाव देखने का सौभाग्य मिला है। आज से 451 वर्ष पहले जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज एक दिव्य ज्योति के रूप में प्रयागराज की धरती पर प्रकट हुए। उन्होंने अपनी ज्योति से सम्पूर्ण भारत को आलोकित किया। उनका सौभाग्य है कि आज उन्हें भारत भूमि के ऐसे दिव्य सन्त की स्मृतियों को जीवन्त बनाये रखने के लिए उनके पावन प्रकटोत्सव और तिरोधान दिवस वैशाख कृष्ण पंचमी के अवसर पर उनकी समाधि के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। आज सप्त दिवसीय कार्यक्रम की पूर्णाहुति है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रयागराज एक पावन तीर्थस्थल है। महाकुम्भ के अवसर पर प्रयागराज की धरती पर दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक व सांस्कृतिक जनसैलाब का आयोजन होता है। प्रयागराज की धरती का सौभाग्य है कि यह जगद्गुरु रामानन्दाचार्य की भी पावन जन्मभूमि है। यहाँ माँ गंगा, माँ यमुना तथा माँ सरस्वती की त्रिवेणी का दर्शन करने और आस्था की डुबकी लगाने के लिए सनातन धर्मावलम्बी माघ मेला, कुम्भ मेला तथा महाकुम्भ मेला की प्रतीक्षा करता है। यह सौभाग्य विरलों को ही प्राप्त होता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पूज्य सन्त जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज ने भारत के वैष्णव परम्परा के रामानन्द सम्प्रदाय में दीक्षा ली। उन्होंने मध्यकाल में मानवता का अशुभ दूर करने, गोरक्षा करने तथा भूखे को अन्न देने को अपने जीवन का मिशन बनाया। उन्होंने उस समय जो उपदेश दिये, वह अत्यन्त दिव्य हैं। उन्होंने कहा कि ‘अपना सा दुख सबका जाने, दास मलूका ताको माने’ अर्थात् जो व्यक्ति दूसरे के दुख को अपना समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘सबहिन के हम, सभी हमारे, जीव जन्तु मोंहे लागे पियारे’। यही भारत के दिव्य सन्तों की परम्परा है, जो जीव मात्र के प्रति करूणा का भाव रखती है।
जगद्गुरु मलूकदास महाराज ने अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब-04 मुगल बादशाहों का कार्यकाल देखा। उन्होंने उस समय की क्रूरता को भी देखा। भारत के सन्तों की एक दिव्य परम्परा है, जिसने अपने मूल्यों और आदर्शों से विचलित हुए बिना विधर्मियों के अत्याचार का सामना करते हुए जनचेतना को जागरूक किया। आज का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भारत इसी जनचेतना पर आधारित है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी को उस समय के शासकों ने लोभ और लालच दिया। तुलसीदास जी को मुगल बादशाहों के दरबार में लाने का काफी प्रयास किया गया। तब तुलसीदास जी ने कहा कि वह किसी बादशाह को नहीं जानते और पहचानते। आज हम ‘बोलो राजा रामचन्द्र की जय’ नारा लगाते हैं, यह नारा सन्त तुलसीदास जी ने मुगल कालखण्ड में दिया था। तुलसीदास जी का कहना था कि भारत का राजा कोई विधर्मी नहीं हो सकता। भारत का केवल एक ही राजा है और वह सनातन राजा प्रभु श्रीराम हैं। श्रीराम के अलावा और कोई राजा नहीं है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि यह भारत की दिव्य चेतना और आध्यात्मिक प्रभाव है कि जब पूज्य सन्तों द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण कथा, श्रीराम कथा या शिवपुराण कथा कही जाती है, तो उसमें हजारों-लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी को पता होता है कि आगे प्रसंग में क्या घटनाक्रम होने वाला है, लेकिन वह पूरे भक्तिभाव से कथा का श्रवण करते हैं, उसे अंगीकार करते हैं तथा अपने जीवन-पथ को आलोकित करते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि रामलीला की शुरुआत मध्य काल में सन्त तुलसीदास ने ही की थी। अक्टूबर से दिसम्बर तक उत्तर भारत के प्रत्येक गाँव में सायंकाल से देर रात्रि तक रामलीला के आयोजन होते हैं। गाँव के लोग चन्दा इकट्ठा करते हैं। इन रामलीलाओं के पात्र भी गाँव के ही लोग होते हैं। इस आयोजन में पूरा गाँव एकजुट होकर रामलीला का मंचन करता है। रामलीला के संवादों के माध्यम से लोग प्रभु श्रीराम से अपना तारतम्य स्थापित करते हैं। इसमें जाति, मत, सम्प्रदाय सहित कोई भेद नहीं होता है। बच्चे-बुजुर्ग, महिला-पुरुष सभी लोग एकजुट होकर इस मंचन से जुड़ते हैं और रामलीला के संवादों से नई प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सन्त रामानन्द ने अलग-अलग जाति से जुड़े महापुरूषों को अपना शिष्य बनाया। सन्त रविदास व सन्त कबीर उन्हीं के शिष्य थे। सन्त रामानन्द जी की परम्परा में ही आगे चलकर जगद्गुरू मलूकदास जी महाराज का आविर्भाव हुआ। यह हमारी वह सन्त परम्परा है, जिसने अपने पन्थ या सम्प्रदाय के बारे में नहीं, बल्कि सदैव भारत और सनातन धर्म के उत्थान के विषय में सोचा। इन सन्तों के कारण ही भारत अनेक झंझावातों से मुक्त हो पाया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब सभी पूज्य सन्त एक मंच पर आते हैं, एक स्वर में बोलते हैं, तो अयोध्या में 500 वर्षों का कलंक मिटता है और भव्य प्रभु श्रीराम मन्दिर का मार्ग प्रशस्त होता है। यह एकता की ताकत है। मध्य काल में इस एकता की ताकत की अलख जगाने का कार्य जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी ने प्रारम्भ किया था। वहीं से यह परम्परा प्रारम्भ हुई है कि ‘जात-पात पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ब्रजभूमि भगवान श्रीकृष्ण कन्हैया एवं राधा रानी के दिव्य तेज से आलोकित है। हर सनातन धर्मावलम्बी यहाँ के रज-रज में भगवान श्रीकृष्ण एवं राधा रानी के दर्शन करता है। यहाँ आने पर हम सभी को नई प्रेरणा तथा नया ओज प्राप्त होता है। मथुरा, वृन्दावन, बल्देव, बरसाना, गोवर्धन, गोकुल एवं नन्दगाँव यहाँ के दिव्य तीर्थ है। यह तीर्थ स्थल हम सभी के लिए प्रेरणा का केन्द्र हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि डबल इंजन सरकार उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद का गठन कर पूज्य सन्तों के मार्गदर्शन में यहाँ की परम्परा एवं विरासत का संरक्षण तथा उन्नयन करने का प्रयास कर रही है। विकास तभी सार्थक है, जब विरासत का संरक्षण भी हो। इस दृष्टि से प्रदेश सरकार द्वारा विकास और विरासत का संरक्षण किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 1916 में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। गाँधी जी जब काशी में बाबा विश्वनाथ धाम का दर्शन करने गए, तो उन्होंने वहां की गलियों में गन्दगी देखी। गाँधी जी ने कहा कि अगर किसी अन्य लोक का कोई जीव यहाँ गिर जाए, तो उसे लगेगा कि वह नर्क में आ गया है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 2017 में उन्हें श्री काशी विश्वनाथ धाम का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस समय वहाँ की सकरी गलियां में एक साथ 50 लोग भी नहीं जा सकते थे। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में काशी में दिव्य एवं भव्य श्री काशी विश्वनाथ धाम का निर्माण हो गया है। आज बाबा विश्वनाथ धाम में 50 हजार श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकते हैं। 50 श्रद्धालुओं से 50 हजार श्रद्धालुओं के दर्शन करने की यात्रा ही डबल इंजन सरकार की गति है। यही गति जब प्रगति में बदलती है, तो वह उत्थान की ओर जाती है। यही सनातन धर्म है। हम इसे प्रगति की तरफ ले जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 500 वर्ष पूर्व सन् 1528 में भगवान श्रीरामलला के मन्दिर को बाबर के सेनापति मीर बाकी ने तोड़ा था। 500 वर्ष पूर्ण होने से पहले ही हमने भगवान श्रीरामलला का भव्य मन्दिर पुनः बनाया है। यह भारत के लिए गौरव का विषय है। यह कार्य तभी हुए हैं, जब पूज्य सन्तों का आशीर्वाद तथा सक्षम नेतृत्व हमें मिला है। कई पीढ़ियाँ अयोध्या में श्रीराम मन्दिर का दर्शन नहीं कर पायीं। हमारी पीढ़ी सौभाग्यशाली है कि हमने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन होते हुए भी देखा और श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त होते हुए भी देखा है। हम भगवान श्रीराम मन्दिर निर्माण और भगवान श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साक्षी रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 2017 से पूर्व अयोध्या में मात्र 03 घण्टे विद्युत आपूर्ति होती थी। यहां की गलियां सकरी थीं और आवागमन के साधन सीमित थे। आज अयोध्या त्रेता युग की याद ताजा कर देती है। यह पूज्य सन्तों की साधना और उनके संघर्षों का प्रताप है कि सभी सन्त एक मंच पर आए और 500 वर्षों के इन्तजार के बाद अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण हो गया। जब सन्तों की एकता में इतनी ताकत है, तो यदि पूरा सनातन धर्मावलम्बी एकजुट होकर अपनी ताकत का एहसास कराना प्रारम्भ कर दे, तो कोई भी विधर्मी भारत का बाल भी बाँका नहीं कर पाएगा।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि हमें इस यात्रा को रुकने नहीं देना है। बिना रुके, बिना डिगे, बिना झुके तथा बिना थके, इस यात्रा को चरैवेति-चरैवेति के संकल्प के साथ निरन्तर आगे बढ़ाना होगा। सनातन धर्म और भारत राष्ट्र के मार्ग में हमारा व्यक्तिगत स्वार्थ बाधा नहीं बनना चाहिए। स्वयं का हित देश व सनातन धर्म के हित से बड़ा नहीं हो सकता। जब पूज्य सन्तों ने अपने व्यक्तिगत हित तथा अपने आश्रम और अपनी सम्पदा के हित को एक ओर रखकर सनातन धर्म के बारे में सोचा, तब यह व्यापक जागृति देखने को मिली।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सन् 1526 में जनपद सम्भल में हरिहर मन्दिर को बाबर द्वारा तुड़वाया गया था। वहाँ 67 तीर्थ और 19 कूपों सहित सभी कुछ मिट गया था। वर्ष 1976 और वर्ष 1978 में सम्भल में दंगे हुए, जिसमें सैकड़ों हिन्दुओं को मारा गया। वर्ष 1995-96 में तत्कालीन सरकार द्वारा सभी आरोपियों के मुकदमें वापस ले लिए गए। पीड़ित परिवार के सदस्यों की सम्पत्ति को पूरी तरह से लूट लिया गया। वह परिवार भागकर दिल्ली में रह रहे हैं। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि हमने सम्भल के 84 कोसी परिक्रमा मार्ग के विकास के लिए धनराशि दे दी है। वहाँ 2-लेन सड़कें और अनेक स्थानों पर सराय व धर्मशाला बनाने तथा 84 कोसी परिक्रमा को प्रारम्भ करने के निर्देश दिए गए हैं। सभी 67 तीर्थ पुनर्जीवित किए गए हैं और 19 कूपों को कब्जा मुक्त करा दिया गया है।
इस अवसर पर चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी, सांसद घनश्याम तिवारी सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण मलूक पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य जी महाराज, पूज्य श्री बलराम दास देवाचार्य महाराज, पूज्य श्री फूलडोल बिहारी जी महाराज, पूज्य श्री रामरिछपाल दास जी महाराज, पूज्य श्री किशोर देवदास देवजू जी महाराज, पूज्य श्री रसिक माधव दास जी महाराज, पूज्य श्री मदनमोहन दास जी महाराज, पूज्य श्री रसिया बाबा, पूज्य श्री लाडली शरण जी महाराज एवं अन्य संतगण व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।



