सुप्रीम कोर्ट को तो सुप्रीम रहने दो!

जिंदगी बेचते हुए रोका ना गया था जिसको।
उसने जाती हुई अर्थी का कफन बेच दिया।।
कमल सेखरी
दिवंगत कवि मैसी निशांत की कविता की उपरोक्त ये दो पंक्तियां आज के सियासी नेताओं और सियासी माहौल पर एकदम सटीक महसूस होती हैं। हमारी व्यवस्था हमारे देश के राजनेताओं को कुछ भी कहने और कुछ भी करने से रोक नहीं पा रही हैं। जिसका जो मन आ रहा है वो अश्लील भाषा में निम्न स्तर के अपशब्द बोलकर किसी की भी मानहानि करने में कोई गुरेज नहीं करते और जब जी में आए किसी की भी पगड़ी उछालकर अपनी राजनीतिक जिज्ञासाएं पूरी करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ते। ऐसे इन सियासी नेताओं ने भी देश के सुप्रीम कोर्ट को भी अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है और सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा का जो ओरा हमारे दिल और दिमाग में दशकों से बना हुआ है उस पर भी घातक हमले करने आरंभ कर दिए हैं। बीते दिन भरी अदालत में सुनवाई के दौरान एक वकील साहब ने अपने पैर से जूता निकालकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की तरफ उछाला यह बोलते हुए सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। ऐसा शायद इन वकील साहब ने इसलिए किया कि उन्हें यह लग रहा था कि दो दिन पहले ही मुख्य न्यायाधीश ने कुछ ऐसी टिप्पणी की जो उत्तर प्रदेश सरकार और हिन्दुत्व के सम्मान का संभवत: ठेस पहुंचा रही हो। यह उन वकील साहब की अपनी धारणा थी जिस पर उन्होंने भरी अदालत में इस तरह की प्रतिक्रिया की जो भारत के इतिहास में पहली बार माननीय सुप्रीम कोर्ट और माननीय देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी अपमानजनक और अराजक हरकत करने की किसी ने जुर्रत की। सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ इस तरह की हरकत करने की हिमाकत शायद इसलिए ही हो पाई क्योंकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपमानजनक भाषा में टिप्पणियां करने वाले सियासी नेताओं को किसी ने रोका नहीं। इससे पहले भाजपा के एक वरिष्ठ सांसद निशीकांत दूबे ने भी अपने एक सार्वजनिक बयान में माननीय सुप्रीम कोर्ट को देश में धार्मिक उन्माद फैलाने का केन्द्र बताते हुए माननीय पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड को उनकी सेवाकाल के दौरान आतंकवादी तक कह दिया। इसी तरह सत्ता के नशे में चूर एक और सांसद ने चीफ जस्टिस चन्द्रचूड के द्वारा वक्फ बोर्ड के मामले में दिए गए अस्थाई स्थगन आदेश पर प्रतिक्रिया करते हुए अपमानजनक शब्दों में तलख टिप्पणी की। इन सियासी नेताओं में से किसी एक के खिलाफ भी हमारी सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की जिससे सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ आवाज उठाने वालों के हौसले और बुलंद हुए और नौबत यहां तक आ पहुंची कि बीते दिन एक वकील साहब ने भरी अदालत में माननीय चीफ जस्टिस के ऊपर जूता तक उछाल दिया। यह तो अच्छा रहा कि इस अराजक हमले में चीफ जस्टिस साहब को कोई चोट नहीं आई लेकिन इस अशोभनीय और अपमानजनक हरकत ने देश के मान सम्मान में एक ऐसा काला धब्बा लगा दिया जो आने वाले दशकों में भी हमें पीड़ा पहुंचाता रहेगा। इससे पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने मिलकर एक प्रेसवार्ता करके खुले शब्दों में यह आरोप लगाया कि अब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपने फैसले लेने में स्वतंत्रता का माहौल नजर नहीं आ रहा है। अब इस तरह की बातें अगर सुप्रीम कोर्ट को लेकर भी होने लग जाएं तो देश में रह क्या जाएगा। सुप्रीम कोर्ट अगर सुप्रीम नहीं बना रहा तो देश के बड़े फैसले होंगे कैसे और अवाम को देश की न्याय व्यवस्था में विश्वास कैसे कायम रह पाएगा। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है तो उसे सुप्रीम बनाए रखने में देश की सत्ता व्यवस्था को उसे हर हाल में सुप्रीम ही बनाकर रखना चाहिए वरना देश अराजकता की स्थिति में आ भी सकता है।


