उत्तर प्रदेशगाजियाबाद

आलोक शुक्ला के नये नाटक अजीब दास्तां का शानदार मंचन

  • मुंबई महानगर के दो तलाकशुदा दंपतियों पर था नाटक
  • 75 मिनट के नाटक में दर्शक कुछ इस तरह जुड़ गए कि नाटक खत्म होने का अहसास ही नहीं हुआ

गाजियाबाद। लोहियानगर स्थित हिंदी भवन में 20 जुलाई की शाम हिंदी भवन समिति, गाजिÞयाबाद के सहयोग से ड्रामाटर्जी आर्ट एंड कल्चर सोसायटी तथा प्रासंगिक की ओर से आलोक शुक्ला के नाटक अजीब दास्तान (एक अनकहा सच) की शानदार प्रस्तुति हुई। इस नाटक को लिखने के साथ आलोक शुक्ला ने ही निर्देशित किया था। गौरतलब है कि वे जीबीएस पेशेंट हैं और पूरी तरह ठीक न होने के बावजूद लगातार थिएटर कर रहे हैं । करीब 4 दशकों से रंगमंच कर रहे आलोक शुक्ला का ये नाटक मुंबई महानगर के दो तलाकशुदा दम्पतियों पर आधारित था जिसमें इनके आपसी सबंधों की अजीब दास्तां में टीन एज बच्चा सफर करता हुआ ड्रग्स की लगा बैठता है और फिर क्या होता है इसे देखते हुए करीब 75 मिनिट लम्बे नाटक में दर्शक कुछ इस तरह जुड़ गए कि नाटक खत्म होने का एहसास भी दर्शकों को नहीं हुआ।
नाटक में मॉर्डर्न लड़की सुरभि की भूमिका में नतेशा, उसके एक्स हस्बेंड मिस्टर प्रणय गुप्ता के किरदार में मृदुल कुमार, प्रणय की वर्तमान पत्नी मोनाली की भूमिका में कविता, प्रणय की पहली पत्नी के टीन एज लड़के अप्पू/आदित्य की भूमिका में निखिल कुमार, मोनाली के एक्स हस्बेंड प्रदीप और सुरभि के लिविंग पार्टनर अनुराग की भूमिका में टेकचंद, दोनों ही घरों में काम वाली बाई जानकी की रोचक भूमिका में निकिता, ऐसे ही अटेंडेट की छोटी भूमिका में अभ्यूदय मिश्रा और सुरभि के पिता की छोटी सी भूमिका में आलोक शुक्ला ने अपने-अपने सधे हुए अभिनय से दर्शकों पर अपनी खास छाप छोड़ी।
नाटक में पांच गाने थे जिनका खूबसूरत गायन और वादन अभ्यूदय मिश्रा ने किया, इन्होंने ही नाटक का जबरदस्त बैक ग्राउंड म्यूजिक दिया।
नाटक की मंच सज्जा टेकचंद की थी जहाँ एक साथ दो घरों का सेट बड़ा ही अच्छा बन पड़ा जिसे प्रकाश व्यवस्था संभाल रहे सुनील चौहान ने बखूबी उभारा । दोनों घरों में बारी- बारी से एक के बाद एक सीन और किरदारों के संवाद और उस पर लगातार स्पॉट आॅन /आॅफ करना बेहद जटिल और मैजिकल था और इस मैजिक को दर्शकों ने पूरे नाटक में बांध कर रखा। ये एक लिहाज से मुश्किल था क्योंकि नाटक के गंभीर और गहराई लिए हुए संवाद थे लेकिन निर्देशक की परिकल्पना अद्भुत थी जिसे नाटक के प्रकाश ने बखूबी मंच पर उतारा । नाटक के अंत में नाटक की गंभीर विषय वस्तु, अभिनय और उसकी अद्भुत प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा। यहाँ तक कि हिंदी भवन समिति के सचिव सुभाष गर्ग ने लेखक/ निर्देशक आलोक शुक्ला को कहा कि जब भी वे मंचन करना चाहें हिंदी भवन का सभागार उनके लिए सदा खुला रहेगा । नाटक में सहयोगी निर्देशन साक्षी चौहान, परिधान और रूप सज्जा में नीतू शुक्ला और विजय लक्ष्मी,निर्माण समन्वयक प्रताप सिंह और वागीश शर्मा थे तो प्रचार में विनय शर्मा तथा निखिल थे।

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